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सर्जिकल स्ट्राइक का जश्न क्यों मनाएं!

सर्जिकल स्ट्राइक

सरकार ने 2016 में किए गए सर्जिकल स्ट्राइक की दूसरी सालगिरह मनाने के लिए देश भर में तीन दिवसीय समारोह आयोजित करने की घोषणा की है। आधिकारिक रूप से यह समारोह सेना की बहादुरी, क्षमताओं और प्रकृति को प्रदर्शित करने के लिए मनाया जा रहा है, पर हकीकत में वजह कुछ और भी हो सकती है।





दिल्ली में आयोजित मुख्य समारोह में सरकार की योजना आम लोगों को सेना के हथियारों को दिखाने, जवानों से परस्पर मिलने और बातचीत करने तथा सर्जिकल स्ट्राइक का वास्तविक वीडियो क्लिप दिखाने की है जिसे लंबे समय से गुप्त रखा गया है। सेना के हथियारों का प्रदर्शन एवं जवानों के साथ परस्पर बातचीत का आयोजन प्रत्येक वर्ष कई अवसरों पर किया जाता है जिसमें ‘अपनी सेना को जानें‘ मेला शामिल है। इसलिए वर्तमान समारोह कोई खास या बहुत दर्शनीय नहीं माना जा सकता। इस समारोह में शामिल कुछ नई विशिष्टताओं में एक सेल्फी वॉल के साथ-साथ स्ट्राइक के क्लिप दिखाता एक वीडियो वॉल जरूर है जो संभवतः लोगों को काफी दिलचस्प लग सकता है।

सर्जिकल स्ट्राइक की वास्तविक कार्रवाई से अधिक महत्वपूर्ण देश को यह बताना है कि आखिर स्ट्राइक की जरूरत क्यों आन पड़ी और इसका क्या प्रभाव पड़ा? 18 सितंबर, 2016 को सेना की वर्दी में चार आतंकवादियों ने उड़ी में सैन्य शिविर पर हमला किया जिसमें 19 अनमोल जानें गईं। यह सर्जिकल स्ट्राइक पठानकोट में वायुसेना के बेस पर हुए हमलों के लगभग 9 महीने बाद हुआ था। देश उन हमलों का जवाब मांग रहा था और हर तरफ ठोस संदेश भेजा लाना निहायत लाजिमी था।

मुंबई हमलों के बाद भारतीय कूटनीति पाकिस्तान को दुनिया भर में आतंकवाद के प्रायोजक देश के रूप में उजागर करने में कामयाब रही। जिसकी वजह से नागरिकों को बड़े पैमाने पर निशाना बनाये जाने की घटनाओं में कमी आई। इस प्रकार हमले मुख्य रूप से जम्मू एवं कश्मीर में सैन्य ठिकानों पर ही आधारित थे। चूंकि दोनों ही देश नाभिकीय हथियाओं से लैस हैं, इसलिए पूरा युद्ध छेड़ा जाना संभवतः बुद्धिमानी नहीं होती। पाकिस्तान का उद्देश्य सीमा के करीब सामरिक परमाणु हथियार तैनात कर भारत को मिलने वाले पारंपरिक लाभ को संतुलित करना था।

फिर भी यह संदेश देने के लिए कि भारत इसका मुंहतोड़ जवाब देगा और इसके लिए जगह और वक्त वह खुद चुनेगा, एक पुरजोर कार्रवाई जरूरी थी। यह कार्रवाई अपने देशवासियों को यह भरोसा दिलाने के लिए जरूरी थी कि भारतीय सेना बिना मुंहतोड़ जवाब दिए चुप नहीं बैठेगी और हताहत हुए जवानों का प्रतिशोध लेगी। सेना और देश के लिए सर्जिकल स्ट्राइक के सफल संचालन की घोषणा इस संदेश को प्रसारित करने का एक माध्यम थी।

पाक ने सर्जिकल स्ट्राइक पर सवाल उठाया और इस तरह उसने यह कबूल किया कि भले ही वह इस घटना से वाकिफ है पर उसमें इसका प्रतिवाद करने की क्षमता नहीं है। इसके अलावा सर्जिकल स्ट्राइक के तुरंत बाद आतंकी हमलों एवं युद्ध विराम उल्लंघन की घटनाओं में इजाफा पाक द्वारा अपनी सेना को, जो सर्जिकल स्ट्राइक से वाकिफ थी, यह बताने की कोशिश थी कि वह भारतीय कार्रवाइयों से नहीं डरेगा। पाक इस घटना से अत्यधिक आहत हुआ था। यही वजह थी कि उसने ताबड़तोड़ अपने कुछ चुने हुए राजनयिकों को भेजा जिससे कि सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर पैदा हुई धारणा को झुठलाया जा सके।

नागरोटा में अपने आखिरी हताश प्रयास के बाद पाक आतंकी हमलों की कोशिशों में कमी आई है। इसके साथ-साथ, भारतीय सेना ने घुसपैठ रोधी ग्रिड और घुसपैठ रोधी प्रणाली में बढ़ोतरी कर दी है जिससे विदेशी आतंकियों की घुसपैठ में कमी आई है।

इस प्रकार, सर्जिकल स्ट्राइक को प्रदर्शित करना पाक को एक बार फिर याद दिलाना है कि भारत एक बार सर्जिकल स्ट्राइक कर चुका है और अगर पाक ने कोई दुस्साहस किया तो वह फिर ऐसा कर सकता है।

बहरहाल हो सकता है सरकार की यही मंशा रही हो और लोग इसे अच्छी तरह समझ भी रहे हैं, फिर भी विपक्षी दल इसका राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश करेंगे कि सरकार सेना का राजनीतिकरण कर रही है। इसी के साथ-साथ सेना में भी हर स्तर पर यही संदेश जाएगा कि सरकार जवानों की मेहनत का श्रेय लेने की तो कोशिश कर रही है  लेकिन सेना की वास्तविक मांगों की अनदेखी कर रही है।

प्रधानमंत्री को इस अवसर का उपयोग राष्ट्र को संबोधित करने, सर्जिकल स्ट्राइक के सफल संचालन के लिए सेना की सराहना करने और जवानों के प्रति सरकार की बेरुखी और उनके प्रति अपमानजनक बर्ताव के कारण वर्तमान एवं सेवानिवृत्त पूरे सैन्य समुदाय के भीतर बढ़ रहे आक्रोश को खत्म करने के लिए कुछ ठोस कदमों की घोषणा करने के रूप में करना चाहिए। इस प्रकार का कदम पाकिस्तान के लिए भी एक संकेत होगा और यह भारतीय जवानों की आकांक्षाओं को भी पूरा करेगा।

सरकार को यह समझना चाहिए कि सेना की बहादुरी, उसकी प्रतिबद्धता, बलिदान की भावना और देश के प्रति उसका प्यार निर्विवाद है। सेना एक शाश्वत संस्था है और यह राजनीतिक दलों एवं नेताओं की तुलना में ज्यादा दिनों तक वजूद में रहेगी। देश की सुरक्षा का इसका दायित्व और भूमिका हमेशा अपरिवर्तित रहेगी। इसलिए यदि सरकार देश के नागरिकों से कुछ हासिल करना चाहती है तो उसे भी देश के उपेक्षित और विस्मृत हो रहे जवानों के कल्याण के प्रति अपना दायित्व निभाना चाहिए।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है।

ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

 

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