vishesh

वाजपेयी ने समर नीति की धारा बदली

अटल बिहारी वाजपेयी
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी (फाइल फोटो)

1998 में दूसरा परमाणु परीक्षण करने का फैसला कर अटल बिहारी वाजपेयी ने भारत की समर नीति की धारा ही बदल दी। सामरिक दुनिया में झिझक और हिचक दिखाने वाले भारत ने जब पांच देशों के परमाणु क्लब का दरवाजा तोड़ कर भीतर घुसने की कोशिश की तो अमेरिका, चीन जैसी ताकतें सदमे में आ गईं। भारत को दरवाजे के भीतर जाने से रोकने की पूरी कोशिश की गई।





1964 में चीन द्वारा पहला परमाणु परीक्षण करने के बाद से ही भारतीय राजनीतिक नेतृत्व पर भारी दबाव पड़ रहा था कि भारत भी परमाणु परीक्षण करे। यदि भारत तब परमाणु परीक्षण कर लेता तो भारत दुनिया के छह देशों वाले विशिष्ट परमाणु क्लब में शामिल होता और भारत का औद्योगिक और वैज्ञानिक विकास दुनिया के लिये एक मिसाल बनता। लेकिन चीन द्वारा परमाणु परीक्षण करने और भारत द्वारा परमाणु परीक्षण करने की सम्भावना के मद्देनजर परमाणु परीक्षण करने वाले परमाणु देशों ने और किसी को इस क्लब में प्रवेश करने से रोकने के लिये परमाणु अप्रसार संधि(NPT) के तहत यह ऐलान किया कि जो देश 1967 तक परमाणु परीक्षण कर चुके हैं उन्हें ही परमाणु तकनीक से लैस और परमाणु शस्त्र क्षमता वाले देश के तौर पर मान्यता दी जाएगी।

भारत ने जब 1974 में पहला परमाणु परीक्षण किया तब तक काफी देर हो चुकी थी। तब अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा 1971 में पाक पर विजय के लिये दुर्गा से सम्बोधित की गई इंदिरा गांधी ने भी काफी  हिचक दिखाते हुए पहले परमाणु परीक्षण को शांतिपूर्ण परमाणु परीक्षण की संज्ञा दी। फिर भी अमेरिकी खेमे वाले देश भारत पर तरह तरह के प्रतिबंध लगाने से बाज नहीं आए। अमेरिका, कनाडा जैसे देशों ने भारत के साथ चल रहे परमाणु सहयोग कार्यक्रमों से हाथ खींच लिया जिससे भारत का राष्ट्रीय विकास काफी हद तक प्रभावित हुआ। फिर भी इंदिरा गांधी ने 1983 में एक बार फिर परमाणु परीक्षण करने की योजना बनाई लेकिन अमेरिका को इसकी भनक लग गई और दूसरा परमाणु परीक्षण करने का इरादा छोड़ दिया।

लेकिन 1998 में दूसरे परमाणु परीक्षण करने की योजना को इतनी गोपनीयता के माहौल में लागू किया गया कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA को भी इसकी भनक नहीं लगी। इस तरह परमाणु दुनिया के द्वार पर खड़े भारत को भीतर प्रवेश करने में 34 साल लगे जिसका दीर्घकालीन नुकसान भारत को हुआ।  1998 के दूसरे पोकरण परमाणु परीक्षणों के बाद तो भारत विशिष्ट परमाणु क्लब का दरवाजा तोड़ कर घुसा तो सही लेकिन वहां अपनी जगह बनाने में भारत को काफी मशक्कत करनी पड़ रही है। इतना जरूर हुआ है कि  भारत अब परमाणु क्लब का पराया समझा जाने वाला देश नहीं रहा।

1974 में इंदिरा गांधी द्वारा किये गए पहले परमाणु परीक्षण के बाद तो भारत को परमाणु परिसर से बाहर कर दिया गया जब भारत पर तरह तरह के प्रतिबंध लगे जिसका असर भारत के राष्ट्रीय विकास पर पड़ा। 1964 में चीन ने जब पहली बार परमाणु परीक्षण हुआ था तब से ही भारतीय राजनीतिक नेतृत्व हिचक रहा था कि भारत परमाणु परीक्षण करे और तब भारत के परमाणु वैज्ञानिक डा. होमी भाभा सरकार को भरोसा दिला रहे थे कि भारत परमाणु परीक्षण करने में सक्षम है। लेकिन 1965 के भारत पाकिस्तान युद्ध और राजनीतिक अस्थिरता की वजह से भारतीय नेतृत्व वक्त पर फैसला नहीं ले पाया। परमाणु द्वार पर खड़ा भारत भीतर कमरे में घुसने में झिझक और हिचक दिखाता रहा।

लेकिन 1998 के परमाणु परीक्षणों का सुफल यह निकला है कि भारत को अंतरराष्ट्रीय परमाणु बिरादरी का साथ मिलने लगा है और भारत को संहारक हथियारों की विभिन्न अप्रसार संधियों (वासेनार अरेंजमेंट, आस्ट्रेलिया ग्रुप, एमटीसीआर) में जगह मिल गई। केवल 48 सदस्यों वाले न्युक्लियर सप्लायर ग्रुप (एनएसजी) में भारत प्रवेश नहीं पा सका लेकिन इसका कोई व्यावहारिक प्रभाव भारत पर नहीं पड़ रहा क्योंकि चीन को छोड़कर सभी परमाणु ताकतों ने भारत के साथ परमाणु सहयोग समझौते कर लिये हैं। सबसे अहम बात यह है कि भारत के परमाणु कार्यक्रम पर बुरी निगाह रखने वाला अमेरिका अब भारत का सामरिक साझेदार बन गया है।

 

Comments

Most Popular

To Top