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सम्मान की पात्र इसलिए है भारतीय सेना

सीबीआई की विशेष अदालत में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख के खिलाफ आये फैसले के बाद पंचकुला और सिरसा की हिंसक घटनाओं में पुलिस की नाकामी और सेना का इन घटनाओं पर पैनी नज़र के बाद चंद घंटो में हालात पर काबू पा लेना यह दर्शाता है कि सेना की कर्तव्य परायणता, निष्ठा और ईमानदारी के आगे हरियाणा पुलिस बौनी साबित हुई। सेना की इस त्वरित कार्रवाई ने पंचकुला शहर के तमाम इलाकों को हिंसक आग में जलने से बचा लिया। शहरवासियों की जान-माल की सुरक्षा और सलामती का जो काम पुलिस तंत्र को करना चाहिए था वह भारतीय सेना ने किया। इसलिए सेना सम्मान के योग्य है, सम्मान की पात्र है, हकदार है।





सवाल यह भी है जब कोर्ट ने 17 अगस्त को डेरा प्रमुख के मामले में 25 अगस्त को फैसला सुनाने की तिथि घोषित कर दी थी तो हरियाणा सरकार यानी हरियाणा प्रशासन यानी हरियाणा पुलिस के पास 8 दिन का पूरा वक़्त था। पुलिस अपनी नेकनीयती और बिना राजनीतिक दबाव में आए चाक-चौबंद इंतजाम कर सकती थी। लेकिन कोर्ट की फटकार और सख्ती के बाद भी उसने किया नहीं। धारा 144 लागू होने के बावजूद डेरा समर्थक औज़ार, हथियार, लाठी-डंडों के साथ योजनाबद्ध तरीके से आते रहे और अंततः 25 अगस्त को तीन-चार घंटो की दिल दहलाने वाली हिंसा हुई, जानें गई, संपत्ति का नुकसान हुआ, लोग दहशत और भय के साथ घरों में दुबक गए थे और पुलिस गुंडों के आगे भागती नज़र आई। क्या सूबे की जनता को पुलिस से ऐसे नाकारापन की उम्मीद थी? सूबे की जनता के टैक्स से ही पुलिस को वेतन मिलता है और पुलिस का पहला और अंतिम काम लोगों की सुरक्षा और संरक्षण है। गौरतलब है कि आईपीएस और आईएएस अफसरों को सेना में कार्य करनेवाले अधिकारियों से अधिक वेतन मिलता है। जबकि दोनों ही संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा पास कर सेना, पुलिस, प्रशासन की नौकरी में आते है। पर इस हिंसक घटना के बाद जो काम पुलिस को करना चाहिए था वो सेना ने किया। सेना तो ऐसी संगीन घटनाओं में सामने आती है और यथास्थिति बहाल कर चुपचाप अपनी छावनियों और बैरकों में चली जाती है। लेकिन पुलिस के अधिकारी बयानबाज़ी, प्रेस कांफ्रेंस कर अप्रत्यक्ष रूप से अपनी पीठ थपथपाते रहते हैं और पंचकुला-हिसार जैसी घटनाओं को रोकने में नाकाम रहते हैं। क्या यह तर्क संगत है, उचित है?

हरियाणा पुलिस को अब बेहद गंभीर होने की ज़रुरत है। वह बार-बार फेल होती है। दंगे होते हैं और नुकसान होता है। साल 2016 के जाट आन्दोलन का कटु अनुभव उसके पास है। कानून के शासन की रक्षा का काम पुलिस का है। रक्षा सेनाओं का नहीं। राज्य के मुखिया और राज्य के पुलिस प्रमुख अपने गिरेबां में झांकेंगे तो समाधान स्वयं ही मिल जायेगा। सड़कों पर सेना को बार-बार उतारना उचित नहीं। आपात काल में तो वह हमारी साथ है ही बिना किसी दिखावे या बयानबाज़ी के। इसलिए सेना सम्मान की हकदार है यह गंभीर बात हम सभी को समझनी होगी।

 

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