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सशस्त्र बल के जवानों पर काम का बोझ चिंता का विषय

सीआरपीएफ कोबरा कमांडोज
फाइल फोटो

देश के अर्ध सैनिक बलों के जवानों के कामकाजी घंटों, पेयजल की उपलब्धता आदि पर संयुक्त संसदीय समिति ने जो टिप्पणियां संसद में पेश रिपोर्ट में की हैं, वह ना केवल हैरान करने वाली हैं बल्कि चिंता का विषय हैं। कमेटी ने केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल(CRPF) के जवानों के लगातार कामकाजी घंटों पर कहा है कि काम के बोझ से वह छुट्टी तथा साप्ताहिक अवकाश भी नहीं ले पाते हैं। समिति ने यह भी कहा कि उसे यह बताते हुए अफसोस हो रहा है कि CRPF कर्मी दिन में 12- 14 घंटे काम करते हैं। CRPF के 80 प्रतिशत कर्मी छुट्टियां व रविवार तक का साप्ताहिक अवकाश नहीं ले पाते हैं। समिति ने अपनी रिपोर्ट में इस बात का भी खुलासा किया है कि राज्य सरकारें अर्ध सैनिक बलों को निवास की जो सुविधा उपलब्ध कराती हैं वह कभी कभी अस्वास्थ्यकर, असुरक्षित और खराब होती हैं। निश्चय ही यह चिंता का विषय है। इसी तरह भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) के जवानों को उपलब्ध करवाए जाने वाले पेयजल पर समिति की टिप्पणी हैरानी पैदा करती है। समिति ने कहा है कि हिमालय सीमा पर तैनात जवानों की 80 प्रतिशत चौकियों में पीने का पानी नदियों तथा झरनों से प्राप्त होता है, जो प्रदूषित है।





हकीकत में संसदीय समिति की इन टिप्पणियों पर गौर कर गंभीरता से काम करने की जरूरत है। मौजूदा दौर की बदली हुई परिस्थितियों में जिस तरह अर्ध सैनिक बल शिद्दत व मुस्तैदी से अपना कर्तव्य कर रहे हैं, वह अनुकरणीय है। हिमालय सीमा से लेकर जम्मू-कश्मीर में अलगाववाद व देश के भीतर नक्सलवाद से अर्ध सैनिक बलों के जवान लंबे समय से सामना कर रहे हैं। ऐसे में यदि लगातार काम का बोझ रहेगा तो उसका असर जवानों के मन व शरीर पर पड़ेगा। ऐसा समिति ने भी कहा है। लंबे समय से काम का बोझ किसी को भी परेशान कर सकता है फिर चाहे वह सशस्त्र बल का प्रशिक्षित जवान ही क्यों ना हो। जवानों को जब समय पर छुट्टियां नहीं मिल पातीं, अपने घर-परिवार से नहीं मिल पाते और एक ही हालात में कर्तव्य का पालन लंबे समय से करते हैं तो उसका असर मन व शरीर पर पड़ता है। इस बात को अर्ध सैनिक बल के प्रमुखों, केंद्रीय गृह मंत्री, सरकार के नीति-नियंताओं को बखूबी ना केवल समझना होगा बल्कि उसपर योजनाबद्ध ढंग से काम करना होगा। बात तभी बनेगी। लंबे समय तक सरहद के आसपास, नक्सली क्षेत्र में तैनाती बल के किसी भी कर्मी के मन को तनाव ग्रस्त बना सकती है और यह स्थिति कर्तव्य पालन में बाधा बनती है।

संयुक्त संसदीय समिति की राज्य सरकारों की व्यवस्था पर की गई टिप्पणी भी गौर करने लायक है। समिति ने कहा है कि राज्य सरकारें निवास संबंधी जो सुविधा अर्ध सैनिक बलों को देती हैं वह कभी-कभी सेहत को खराब करने वाली, असुरक्षित व ठीक नहीं होतीं। इससे जवानों की गरिमा, मनोबल तथा प्रेरणा पर प्रभाव पड़ता है। हमें यह बात भलीभांति सोचनी और समझनी होगी कि देश की रक्षा में तैनात जवान के लिए अस्त्र-शस्त्र, मशीन व उपकरण दूसरे पायदान पर होते हैं। जवान का मनोबल सबसे पहले होता है। किसी जवान के पास हथियार क्षण भर के लिए यदि ना भी हों तो पहला सामना वह निहत्थे अपने मनोबल से ही करता है। लिहाजा उन्हें उपलब्ध कराए जा रहे आवास उनकी गरिमा के अनुकूल तथा सुरक्षित होने चाहिए। पिछले कुछ सालों में अर्ध सैनिक बलों के शिविरों पर हुए हमलों से सीख लेने जरूरत है। ऐसे में जरूरी है कि समिति की टिप्पणियों पर केंद्र व राज्य सरकारें विधिवत गौर करें और जवानों के हितों पर तत्काल ध्यान दें।

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