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सच्चाई बयां की है सेना प्रमुख ने

सीडीएस जनरल बिपिन रावत

दिल्ली में पिछले सप्ताह एक संगोष्ठी के दौरान सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत ने देश के उत्तर पूर्व क्षेत्र में अवैध अप्रवासियों के प्रभाव के बारे में उल्लेख किया। उन्होंने एक वर्चस्व वाली मुस्लिम पार्टी, एआईयूडीएफ (अखिल भारतीय संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा) के बेहद तेज गति से बढ़ने पर टिपण्णी की। उन्होंने इस पार्टी की अस्सी के दशक के जनसंघ से भी तुलना कर डाली। उनके इस बयान की राजनीतिक दलों, खासकर, विपक्षी पार्टियों ने घोर आलोचना की। सेना प्रमुख ने धार्मिक एजेंडे के साथ बढ़ने वाले केवल दो राजनीतिक दलों की बेहद तेज बढ़ोतरी की आपस में तुलना की थी, जिसमें एक वर्तमान में तेजी से बढ़ रही थी, जबकि दूसरी पार्टी अस्सी के दशक में स्थिर सी हो गई थी। मूल रूप से इसका उल्लेख इनसे सबक ग्रहण करने के संदर्भ में किया गया था।





अवैध अप्रवासी की समस्या बहुत लंबे समय से, मुख्य रूप से पूर्वी पाकिस्तान, जो वर्तमान में बांग्लादेश है, से अवैध तरीके से भारत, खासकर, असम में आने वाले लोगों से संबंधित समस्या रही है और यही एआईडीयूएफ को बढ़े हुए राजनीतिक समर्थन का कारण भी है। जमीन की कमी एवं तेजी से बढ़ती आबादी ने बांग्लादेश के निवासियों को उत्प्रवास के लिए विवश किया। असम को इसका सबसे बड़ा खामियाजा उठाना पड़ा जिसका असर उसके नौ जिलों में पड़ा जिनकी जनसांख्यिकी संरचना प्रभावित हुई।

जनरल के बयान की आलोचना मुख्य रूप से कांग्रेस एवं एआईएमआईएम ने की क्योंकि इन दोनों पार्टियों के हित इन उत्प्रवासियों को समर्थन देने से जुड़े हुए थे। कांग्रेस ने ही असम में अपने शासन काल के दौरान लगातार अप्रवासियों को समर्थन दिया था क्योंकि वह इसे अपना वोट बैंक मानती थी। उसने 1983 में अवैध प्रवासी (ट्रिब्यूनल द्वारा निर्धारण) अधिनियम को भी लागू कर दिया जिसने असम में किसी भी सरकार द्वारा अवैध अप्रवासियों को निर्वासित किए जाने पर प्रतिबंध लगा दिया। इस प्रकार, यह दशकों तक सत्ता पर काबिज रही। एआईएमआईएम एवं एआईडीयूएफ दोनों ही राजनीतिक-धार्मिक संगठन हैं इसलिए उनका गठजोड़ बना हुआ है और बदलती जनसंख्या संरचना भी उनको रास आ रही है।

इन राजनीतिक दलों ने उस बर्बादी को नजरअंदाज किया है जो अवैध उत्प्रवास की वजह से हुई है। इस राज्य में अराजक समूह आरंभ में इस जनसांख्यिकी बदलाव की वजह से पैदा हुए और अब असम के मूल निवासी अपने ही राज्य में अल्पसंख्यक बन कर रह गए हैं। इन अवैध अप्रवासियों ने हजारों की जानें ले लीं, बेशुमार संपत्ति को नुकसान पहुंचाया लेकिन राज्य सरकारें अपने वोट बैंक को बचाने की खातिर उनके खिलाफ कार्रवाई करने से परहेज करती रही हैं। यह सिलसिला आज भी जारी है और आज भी असम Armed Forces Special Powers Act (AFSPA) के तहत बना हुआ है। सेना प्रमुख ने इसी संदर्भ में टिपण्णी की थी।

जनरल ऑफिसर कमांडिंग (जीओसी) 3 कॉर्प्स के बतौर, वह इस जनसांख्यिकीय बदलाव से वाकिफ थे। उन्हें यह भी पता था कि ऐसे उत्प्रवास को भारतीय हितों के विरोधी देशों से मदद मिलती है। दशकों से भारत को पता था कि असम की अराजकता को बांग्लादेश के रास्ते पाकिस्तान के आईएसआई से मदद मिलती है। इस आंदोलन के नेताओं ने चटगांव की पहाडि़यों में डेरा डाल रखा था और उन्हें आईएसआई के माध्यम से हथियार मिल रहे थे। उत्तर पूर्व क्षेत्र के शेष हिस्सों में फैली अराजकता को चीन का समर्थन प्राप्त था। जाहिराना तौर पर, अगर जम्मू एवं कश्मीर के समान उत्तर पूर्व क्षेत्र में भी अराजकता फैल जाए तो इसका सबसे अधिक फायदा पाकिस्तान और चीन को ही होगा। इसलिए, जब सेना प्रमुख ने अवैध अप्रवासियों को चीन और पाक से मदद मिलने की बात की तो वह बिल्कुल सही कह रहे थे।

भारतीय राजनीतिज्ञ अभी तक केवल ऐसे सेना प्रमुखों को ही देखने के आदी रहे हैं जो उस वक्त भी खामोश रहे हैं जब राजनीतिक पार्टियां वोट बैंक और सत्ता सुख के लालच में राष्ट्रीय सुरक्षा को नजरअंदाज करती रही हैं। रोजाना हमारे जवानों की मौत इसलिए हो रही है क्योंकि सरकारों ने समय रहते बढ़ रहे असंतोष का समाधान नहीं किया। सरकार की अक्षम कार्रवाई का सबसे बड़ा उदाहरण जम्मू एवं कश्मीर है। वहां पत्थर फेंकने वालों को तो माफ कर दिया जाता है जबकि आत्म रक्षा में गोली चलाने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाती है। सैनिकों पर मानवाधिकार उल्लंघन के मामले बनाये जाते हैं जबकि जो उन पर हमले करते हैं, उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाती।

अब हमारे सामने एक ऐसा सेना प्रमुख है जो लाखों सैनिकों वाली हमारी सेना की चिंताओं को साझा करने, देश को उन भयंकर राजनीतिक भूलों को याद दिलाने का इच्छुक है, वह अपने लिए कोई राजनीतिक पद नहीं चाहता और सेवानिवृत्त होते ही नेपथ्य में गुम हो जाएगा, लेकिन उससे हमारे राजनेताओं को चिंता होने लगी है। वे सेना प्रमुखों के बयानों का उल्लेख कर रहे हैं और उनकी आलोचना कर रहे हैं। राजनेताओं को भय है कि सेना प्रमुख को देश का सम्मान हासिल होगा और जिन दागदार रहस्यों को उन्होंने सावधानी से छुपाए रखा है, वे देश के सामने उजागर हो जाएंगे।

सेना प्रमुख ने वही कहा है जो कहने से हमारे राजनेता डरेंगे। उनके शब्द ‘हमें क्षेत्र के लोगों के साथ रहना है, चाहे वे किसी भी जाति, धर्म, लिंग या वर्ण के हों। अगर हम यह समझ गए तो हम लोग एकजुट होकर खुशी के साथ रह सकते हैं।’ ऐसी बातें राजनेताओं को कहनी चाहिए थीं लेकिन वे यह कहने से हिचकिचाते हैं। सेना प्रमुख ने लोगों को विभाजित करने की नहीं, उन्हें एकजुट करने की कोशिश की है, फिर भी उनकी आलोचना की जा रही है।

एक अरसे के बाद हमें एक ऐसा सेना प्रमुख मिला है जो देश के साथ सेना की चिंताओं को साझा करने का इच्छुक है। हमें उनका समर्थन करना चाहिए, उनकी आवाज को दबाने का प्रयास नहीं करना चाहिए। वह सेना का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, जो एकमात्र ऐसी संस्था है जो देश के सामने आने वाली किसी भी समस्या की स्थिति में या आवश्यकता पड़ने पर सबसे पहले सामने आती है, जो अराजनीतिक है और बेहद सम्मानित है।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है।

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