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इसलिए उमड़ता है शहीदों की चिताओं पर लोगों का हुजूम

शहीद

कश्मीर के गुरेज में हाल ही में एक मुठभेड़ में शहीद हुए सेना के चार बहादुर जवानों-मेजर कौस्तुभ राणे, राइफल मैन हमीर सिंह और मनदीप सिंह तथा गनर विक्रमजीत सिंह की भावभीनी अंत्येष्टि सेना और उसके बलिदान के प्रति राष्ट्र के समर्थन की एक बड़ी निशानी थी। उनके पार्थिव शरीर जब वाहनों से ले जाये जा रहे थे तो उसे देखने के लिए पूरा शहर ठहर गया, गलियों में हुजूम उमड़ पड़ा और लोग वाहनों पर फूल और मालाएं बरसाने लगे।





मुंबई में जिन गलियों में उनके अपने मेजर कौस्तुभ राणे का पार्थिव शरीर लाया जा रहा था, उन गलियों को लोगों ने उनके सम्मान के प्रतीक के रूप में फूलों से पाट दिया। उनके लिए दुख और समर्थन के उमड़ते सागर ने इस तथ्य को साबित किया कि भारत का आम नागरिक सशस्त्र बलों के साथ मजबूती से खड़ा है।

पूरे देश भर में यही सवाल पूछा जा रहा है कि क्या किसी देश के लिए इतने सारे युवाओं की कुर्बानी देना सही है जो किसी वजह से अपने पीछे अपने परिवार को छोड़ जाते हैं और यह वजह है जिसका समाधान सरकार को वर्षों पहले बातचीत के जरिये ढूंढ लेना चाहिए था। विविध सरकारों द्वारा राष्ट्रीय राजनीति में विफलता सर्वविदित है, लेकिन प्रत्येक सरकार द्वारा अपनाया जा रहा सतही तरीका सुरक्षा बलों पर दबाव को और बढ़ा ही देता है।

कुछ सरकारों ने वार्ताकारों की नियुक्ति की, कुछ ने गोल मेज सम्मेलनों का आयोजन किया, लेकिन परिणाम शून्य ही रहा। हालात न तो बदले, न सुधरे और न ही कोई समाधान दिख रहा है। तैयार दस्तावेज पड़े पड़े आलमारियों में सड़ गए, कभी सामने नहीं लाए गए और सियासी पार्टियां एक दूसरे पर ठीकरा फोड़ती रहीं। घाटी में पैसा पानी की तरह बहा दिया गया, लेकिन उनका कोई नतीजा नहीं निकला और ‘आजादी‘ की मांगे बदस्तूर जारी रहीं।

ऐसे कई अवसर आए जब सुरक्षा बलों ने तालमेल बना कर काम किया और कश्मीर में हालात को वे काफी हद तक काबू में ले आए जिससे राजनीतिक प्रक्रिया का माहौल बना लेकिन सरकार द्वारा कदम आगे न बढ़ाए जाने से स्थिति फिर से पहले के स्तर पर वापस आ गई। अंतरराष्ट्रीय दबाव समेत बातचीत के बावजूद पाकिस्तान अपनी घृणित साजिशों से बाज नहीं आया। सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर सरकार ने बड़े-बड़े दावे किए लेकिन उसका बहुत सीमित प्रभाव देखने में आया। राष्ट्र विरोधी हुर्रियत नेतृत्व को राज्य के भीतर रहने देने, युवाओं को भड़काने की इजाजत स्थानीय निवासियों और सुरक्षा बलों दोनों के हताहत होने की संख्या में केवल इजाफा ही कर रही है।

जहां सुरक्षा बल की कार्रवाइयां और ऑपरेशन निर्बाध रूप से जारी हैं, सत्ता पर काबिज होने वाली एक के बाद दूसरी सरकारें वर्तमान माहौल के लिए लगातार अपनी पूर्ववर्ती सरकारों पर इल्जाम लगाती रही हैं। अविश्वास का माहौल, घाटी में नेतृत्व की कमी एवं पाकिस्तान का कभी न बदलने वाला रवैया आतंकियों को उकसाता रहा है जिससे अनमोल जिंदगियां लगातार जा रही हैं। ऐसा कहा जा रहा है कि कुछ भी नहीं बदलेगा और भारत हमेशा पाकिस्तान के हाथों की कठपुतली बना रहेगा।

सरकार को अपने रुख में परिवर्तन करना चाहिए, घाटी के लिए अपनी रणनीति का मूल्यांकन करना चाहिए एवं एक अनुकूल दृष्टिकोण का निर्धारण करना चाहिए। उसे इस समस्या को लेकर कुछ विशेष सोचने की जरुरत है, हिंसा भड़काने वालों, उसके फाइनेंसरों को क्षेत्र से बाहर करने एवं पाकिस्तान को वापस पीछे धकेलने पर विचार करने की आवश्यकता है। भारत बढ़ती हिंसा का मूक दर्शक बन कर नहीं रह सकता।

जो भी जवान इस क्षेत्र में तैनात हैं, वे चाहे सेना के हों या दूसरे सुरक्षा बलों के या फिर जम्मू कश्मीर पुलिस के हों उनकी जान पर बहुत बड़ा खतरा है लेकिन वे इस विश्वास और भरोसे पर अपना फर्ज निभा रहे हैं कि सरकार उनके संकटों के निदान के बारे में सोच रही है।

देश के नागरिकों ने यह दिखा दिया है कि वह अपने योद्धाओं की फिक्र करती है और वह महसूस करते हैं कि इन जवानों ने अपना जीवन राष्ट्र का बेहतर भविष्य सुनिश्चित करने के लिए कुर्बान कर दिया है। सरकार को अनिवार्य रूप से घाटी के लिए एक सार्थक समाधान ढूंढने के जरिए उनके भरोसे को कायम रखना चाहिए न कि केवल पाकिस्तान और दिग्भ्रमित युवाओं की आलोचना करने संबंधी बयान भर देना चाहिए।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है।

ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

 

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