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समर नीति: द्वीप देशों से मोहक हवा

पीएम मोदी मालदीव दौरे पर
मालदीव के राष्ट्रपति सोलेह के साथ पीएम मोदी

नई दिल्ली। हिंद महासागर में द्वीप देशों की  सामरिक अहमियत बढ़ती जा रही है और यही वजह है कि चीन की इन द्वीपों पर गिद्ध नजरें गड़ी हैं। चीन हिंद महासागर पर अपना दबदबा स्थापित करना चाहता है और इसलिये वह इन देशों की सरकारों को कई तरह के लालच देकर अपने प्रभाव में लाने की रणनीति पर चलता रहा है। हिंद महासागर में ये द्वीप देश हैं- मालदीव, सेशल्स, श्रीलंका, मारीशस  और  मैडगास्कर। ये द्वीप देश भारत के नजदीकी समुद्री इलाके में हैं इसलिये इनके साथ विशेष दोस्ती बनाने की  भारत की कोशिश को स्वाभाविक कहा जा सकता है लेकिन चीन यदि हजारों किलोमीटर दूर से आ कर इन द्वीप देशों पर अपनी सैनिक मौजूदगी बनाने की कोशिश करे तो इसके पीछे छुपे  सामरिक मंसूबों से इनकार नहीं किया जा सकता है।





हिंद महासागर भारत का आंगन कहा जाता है औऱ भारत अपने आंगन में चौकसी के लिये इन द्वीप देशों के साथ सामरिक रिश्ते स्थापित करे तो इस पर किसी को एतराज नहीं होना चाहिये। इस महासागर में भारत के अधीन 20 लाख वर्ग किलोमीटर का विशेष आर्थिक क्षेत्र है जिसकी चौकसी के लिये भारत को अपने आसपास के देशों के साथ सहयोग का रिश्ता बनाना होगा लेकिन चीन की कोशिश रही है कि वह इन द्वीपों से भारत को बेदखल कर अपनी मौजूदगी बना ले। लेकिन हमने देखा है कि कम से कम दो द्वीपों पर चीन के इन मंसूबों पर  जनता की ताकत ने पानी फेर दिया है।  हाल में मालदीव में जनतांत्रिक चुनावों के बाद हमने देखा कि किस तरह मालदीव की जनता ने चीन समर्थक राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन को सत्ता से बाहर कर दिया। श्रीलंका में  भी राष्ट्रपति सिरीसेना ने  प्रधानमंत्री विक्रमसिंघे को अचानक पद से बर्खास्त कर चीन समर्थक महीन्दा राजपक्षे को प्रधानमंत्री बना दिया। पर सदन में बहुमत विक्रमसिंघे के पास था औऱ वह इस आधार पर श्रीलंका सुप्रीम कोर्ट से अपना पक्ष मजबूती से रख कर अनुकुल फैसला ले सके। श्रीलंका में चीन ने हमबनटोटा बंदरगाह बनाने के लिये आठ अरब डालर का कर्ज दिया और जब श्रीलंका सरकार इसे चुकाने में असमर्थता जाहिर की तो चीन ने हमबनटोटा बंदरगाह के अलावा इसके आसपास का एक बड़ा इलाका लीज पर ले लिया। इस तरह श्रीलंका के एक भूभाग पर चीन का लम्बे अर्से तक कब्जा रहेगा और यहां से वह अपनी सैन्य गतिविधियों को संचालित कर सकेगा।

चीन का यही इरादा मालदीव को लेकर भी था। चीन ने वहां कई  ढांचागत परियोजनाएं लागू कीं और इनका कर्ज  मालदीव पर इतना चढ़ गया कि चीन सरकार इनकी वसूली के लिये मालदीव से कुछ द्वीपों की मांग कर सकता है। श्रीलंका भारत समुद्र तट से महज 40 किलोमीटर दूर और मालदीव पांच सौ किलमीटर दुर है। भारत के इतने पास चीन यदि अपने युद्धपोत औऱ पनडुब्ब्रियों को ठहराने लगे तो इससे भारत के लिये भारी चिंता पैदा होगी। लेकिन अब जब कि श्रीलंका और मालदीव दोनों देशों पर भारत समर्थक सरकारें बहाल हो चुकी हैं तो हम यह उम्मीद कर सकते हैं कि चीन इन द्वीप देशों का नाजायज सामरिक इस्तेमाल नहीं कर सकेगा।

जहां तक मारीशस का सवाल है चीन ने इस द्वीप देश पर भी डोरे डालने की कोशिश की है  लेकिन वहां चीन की दाल नहीं गल रही । उसकी कोशिश है कि वह  80 हजार आबादी वाले सेशल्स को अपने प्रभाव में ले ले। सेशल्स ने अपने एजम्शन द्वीप पर भारत को नौसैनिक सुविधाएं खड़ी करने की अनुमति दे दी थी लेकिन बाद में मुकर गया।  भारत को प्रतीक्षा है सेशल्स के शासक भारत के साथ हुए समझौते का आदर करेंगे।

 चूंकि हिंद महासागर में समुद्री डाकुओं का आतंक रहता है औऱ इनसे निबटने में भारत अहम भूमिका निभा रहा है जिनसे द्वीप देश सुरक्षित महसूस करते हैं इसलिये स्वाभाविक है कि इन द्वीप देशों के साथ भारत सामरिक औऱ गहरे  सैन्य रिश्ते भी बनाए। लेकिन द्वीप देशों की सरकारें जब सुदूर देशों के साथ अपने अस्वाभाविक रिश्ते बनाने की कोशिश करने लगें तो इन देशों के लोगों के    कान खड़े होने चाहिये। मालदीव में हमने देखा है कि जनता की ताकत ने एक बाहरी ताकत को किस तरह परास्त किया। श्रीलंका में भी जनतांत्रित ताकतों को विजय मिली है। इसी तरह सेशल्स में भी भारत अपना स्वाभाविक रिश्ता बनाने में कामयाब  होगा।

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