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समर नीति: चीन के चंगुल में पड़ोसी देश नेपाल

नेपाल के पीएम और शी जिनपिंग
फाइल फोटो

यह हैरत की बात है कि नेपाल के राजनेता अपनी घरेलू राजनीति में चीन को खुला हस्तक्षेप करने की इजाजत देने लगे हैं। हाल में प्रधानमंत्री की कुर्सी बचाने वाले नेपाली कम्युनिस्ट नेता के पी शर्मा ओली अब पूरी तरह चीन की गोद में खेलते हुए दिख रहे हैं। भारत और नेपाल के बीच सदियों से चले आ रहे रोटी-बेटी के रिश्ते में बहुत बडी दरार पैदा करने में चीन पूरी तरह कामयाब हो गया लगता है। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ के इलाके में पडने वाले लिपुलेख दर्रा से होकर भारत ने जब तिब्बत सीमा के भीतर कैलाश मानसरोवर जाने के लिये 80 किलोमीटर लम्बी सड़क का उद्घाटन किया तो चीन सहम गया क्योंकि इस सडक मार्ग से होकर तिब्बत के भीतर भारतीय सैन्य आवाजाही करने में आसानी होगी।





ऐसे दौर में जब भारत और नेपाल के रिश्तों में पहले ही शक की दीवार खडी हो चुकी है और नेपाली नेता चीन की खुशामद करने को मजबूर होने लगे हैं चीनी राजदूत ने नेपाल की राजनीति में अपनी घुसपैठ का असली परिचय दो सप्ताह पहले दिया था जब उन्होंने काठमांडू में नेपाली राजनेताओं को एक विशेष बैठक में बुलाकर कहा कि प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली के खिलाफ विद्रोह नहीं करें। चीनी राजदूत की बैठक में पूर्व प्रधानमंत्री प्रचंड जैसे अन्य राष्ट्रीय नेता शामिल थे जिन्हें भी अपने अस्तित्व का संकट झेलना पड रहा है इसलिये उन्होंने भी नेपाली राजदूत की बात मान ली। साफ है कि चीन का नेपाली राजनेताओं पर दबदबा इतना बढ गया है कि वे नेपाली राजनीतिज्ञों को निर्देश दे सकते हैं कि सरकार कैसे और किसकी अगुवाई में चलानी है।

इसी का नतीजा है कि नेपाली प्रधानमंत्री ने लिपुलेख दर्रा के इलाके को अपना इलाका बताने और किसी भी तरीके से इसे भारत से छीन लेने का संकल्प नेपाली विधान सभा को सम्बोधित करते हुए लिया है। नेपाल सरकार ने नेपाल का नया मानचित्र भी जारी किया जिसमें कालापानी, लिम्पियाधुरा – लिपुलेख के इलाके को नेपाल का हिस्सा दर्शाया गया है। भारत का दावा है कि लिपुलेख इलाका शुरु से ही भारत के अधीन रहा है और इस बारे में नेपाल का दावा गलतफहमी की वजह से है।

कुछ दिनों पहले भारतीय थलसेना प्रमुख जनरल मुकुंद नरवाणे ने एक बैठक को सम्बोधित करते हुए ठीक ही कहा कि नेपाल किसी के इशारे पर भारत के साथ विवाद खडा कर रहा है। जनरल नरवाणे ने किसी देश का नाम नही लिया लेकिन उनका इशारा साफ था कि नेपाल चीन के भडकाने पर भारत के साथ विवादों को तुल दे रहा है। इसका एक नतीजा यह होगा कि भारत औऱ नेपाल के रिश्तों में भारी दरार पैदा होगी और भारत का डर दिखाकर चीन अब नेपाल को पूरी तरह अपनी मुट्ठी में दबोच लेगा। ठीक वैसे ही जैसे उसने पाकिस्तान को अपने चंगुल में ले लिया है। पाकिस्तान की तरह नेपाल भी एक दिन यही कहने लगेगा कि वह चीन का सदाबहार दोस्त है और दोनों देशों के बीच सदियों पुराने रिश्ते रहे हैं।

चीन की वजह से भारत के अन्य पडोसी देशों जैसे श्रीलंका के साथ भी भारत के रिश्तों में खटास पैदा हो गई है। चीन की यह सोची समझी चाल है कि वह भारत के पडोसी देशों में ढांचागत विकास जैसे क्षेत्रों में निवेश कर उसे अपने चंगुल में ले ले। पाकिस्तान में चीन- पाक आर्थिक गलियारा ( CPEC) के विकास का काम हाथ में लेकर चीन ने पाकिस्तान पर् अपनी पकड पहले ही मजबूत कर ली है। अब वह नेपाल को भी इसी तरह के लुभावने प्रस्ताव दे कर उसे भारत के साथ रिश्तों में दूरी पैदा करने की चाल चल रहा है।

चीन ने बांग्लादेश को भी रक्षा के संवेदनशील क्षेत्रों में मदद कर उसे चीन पर निर्भर बनाने की चाल चली है। इसके पहले उसने मालदीव को अपनी गिऱफ्त में करने की नाकाम चाल चली थी जिसे वहां की जनता ने विफल कर दिया है। नेपाल की जनता को भी चीन की चाल को समझना होगा।

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