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समर नीति: चीन की शैली में ही देना होगा जवाब

गलवान घाटी
फाइल फोटो

पचास के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने चीन के साथ सभ्यतागत  रिश्तों की दुहाई देते हुए सम्बन्धों में गर्मी लाने की कोशिश की और  चीनियों ने भी भारतीयों को गले लगाने का नाटक कर हिंदी चीनी भाई-भाई का नारा बुलंद किया।  लेकिन पर्दे के पीछे  चीन भारतीय इलाका हड़पने की चालें चल रहा था। भारत के साथ कोई सीमा विवाद नहीं होने की बात करते हुए जवाहर लाल नेहरू और चीनी प्रधानमंत्री चओ अन लाए ने 1954 की  ऐतिहासिक पंचशील संधि पर हस्ताक्षर किये और कहा कि भारत और चीन के रिश्ते दुनिया के लिये मिसाल बनेंगे। लेकिन उसी दौर में चीन  ने  जम्मू-कश्मीर के अक्साई चिन इलाके  पर अपना कब्जा बना कर कराकोरम  राजमार्ग का निर्माण कर  लिया।





 आज के दौर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी चीन को गले लगाने की कोशिश की ताकि सौहार्दपूर्ण माहौल में  चीन के साथ सीमा मसले का हल निकले  और दोनों देश रिश्तों के एक नये युग में प्रवेश करें। लेकिन चीन ने एक बार फिर भारत को धोखे में रख कर  भारत के साथ सीमा विवाद को नया रंग दे दिया।   दोनों देशों के बीच 3488 किलोमीटर लम्बी वास्तविक नियंत्रण रेखा है जिसका स्पष्ट निर्धारण नहीं होने की आड में चीन  एक एक कदम भारतीय माने जाने वाले इलाकों में अपनी बढत बनाता गया। चीन ने इसी तरह पूर्वी लद्दाख के सीमांत इलाकों में गलवान घाटी से लेकर पैंगोंग त्सो झील इलाके तक अपने सैनिकों को भारतीय इलाके में घुसपैठ करवा दिया और अब वहां से नहीं हटने की जिद पर अड़ गया है।

 चीन का यह विस्तारवादी रवैया भारत तक ही सीमित नहीं है। उसने दक्षिण पूर्व सागर के विशाल इलाके पर अपना अधिकार जताया है और इस सागर के तटीय देशों के भूभागीय इलाकों पर अपना कब्जा जताने लगा है। सैनिक रुप से कमजोर वियतनाम, इंडोनेशिया, फिलीपींस  और अन्य तटीय देश चीन की धौंस सहने को मजबूर हैं क्योंकि चीन ने इन देशों को अपने आर्थिक और सैनिक प्रभाव में ले  लिया है।

 सवाल यह है  कि चीन के इस विस्तारवादी रवैये से जब कई देश परेशान हैं तो क्या वे  सभी देश चीन के खिलाफ लामबंद हो सकते हैं  ?   वक्त आ गया है कि चीन की दादागिरी के खिलाफ छोटे और बडे देश एकजुट हों औऱ उसकी प्रभुत्वकारी नीतियों को चुनौती दें। चीन की दादागिरी को चुनौती देने के  लिये चार बडे देशों अमेरिका, भारत , आस्ट्रेलिया और जापान ने एक चर्तुपक्षीय गठजोड बनाया तो है लेकिन इस गुट ने अब तक .यही संदेश देने की कोशिश की है कि यह गठजोड चीन के खिलाफ नहीं है।  वक्त आ गया है कि हिंद प्रशांत इलाके में विकसित यह गठजोड़ अपनी एकजुट ताकत का प्रदर्शन करे और चीन को बाध्य करे कि अपनी विस्तारवादी नीतियों का त्याग करे और क्षेत्र के देशों के साथ पंचशील के शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के सिद्धांतों का पालन करते हुए सभी देशों के साथ संयुक्त राष्ट्र के नियमों का पालन करते हुए शांति से रहे। लेकिन चीन ऐसी नीति अपनाने को तैयार नहीं लगता। चीन के राष्ट्रपति शी चिन फिंग ने चीन के लिये एक सपना देखा है कि वह चीन को 2047 तक सबसे शक्तिशाली देश बनाएंगे। लेकिन लगता है कि  उनका यह लक्ष्य हासिल करने का तरीका वैश्विक नियमों का सम्मान नहीं करता।

 यही वजह  है कि वह अंतरराष्ट्रीय और दिवपक्षीय संधियो का कभी सम्मान करता हुआ नजर नहीं आता। मिसाल के तौर पर उसने भारत के साथ लगी सीमाओं पर परस्पर विश्वास और सौहार्दूपूर्ण माहौल  बनाने के लिये 1993, 1996 , 2003 और 2013 में जो समझौते किये थे उनकी वह परवाह नहीं कर रहा।  इन समझौतों की वजह से ही भारत में यह गलतफहमी पैदा हुई कि वह भारत को धोखे में रख कर वास्तविक नियंत्रण रेखा पर कभी एकपक्षीय कार्रवाई नहीं  करेगा।  1962 की तरह हम आज एक बार फिर अपनी भूल समझने लगे हैं लेकिन अब इसका एक ही उपाय है कि चीन की बंदरघुडकियों का जवाब चीन की शैली  में ही दिया जाए।

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