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समर नीति: युद्ध के बादल और सैन्य तकनीक क्रांति

रंजीत-कुमार (वरिष्ठ पत्रकार)

रंजीत कुमार (वरिष्ठ पत्रकार)

सैन्य तैयारी एक सतत प्रक्रिया है और रातों रात इसमें इजाफा नहीं किया जा सकता है। तेजी से बदलती तकनीक और तकनीक क्रांति के आधुनिक युग में सैन्य तैयारी इसलिये निरंतर जारी रखी जाती है। कोई नहीं जानता कि युद्ध के बादल कब छाने लगेंगे और युद्ध छिड़ जाएगा। 1971 के भारत-पाक युद्ध को छोड़कर भारत पर अब तक जितने युद्ध थोपे गए हैं उनका माहौल अचानक बना है और भारतीय सेनाएं उंघते हुए पाई गई है। 1999 के करगिल युद्ध के दौरान ऐसा ही हुआ जब करगिल की पहाड़ियों पर जेहादियों के भेष में पाकिस्तानी सेना के जवानों ने  चुप चाप चढ़ाई कर दी थी और भारतीय सेना के आला जनरल यही कहते रहे कि मुट्ठी भर जेहादी करगिल की चोटियों पर चढ़ बैठे हैं जिन्हें खदेड़ भगाया जाएगा। लेकिन उन जेहादियों को खदेड़ भगाने के लिये भारतीय सेना को दो महीने तक एड़ी चोटी एक करनी पड़ी। उस वक्त भारतीय सेना कोई बड़ा युद्ध लड़ने की हालत में कतई नहीं थी क्योंकि नब्बे के दशक में आथिर्क बदहाली की वजह से भारतीय सेनाओं के आधुनिकीकरण की प्रक्रिया बुरी तरह प्रभावित हुई थी।





करगिल की पहाडियों के पार से दुश्मन सेना भारतीय सैन्य ठिकानों पर तोपों से निरंतर गोले बरसा रही थी और भारतीय सेना के पास दुश्मन की तोपों का सटीक पता लगाने वाले वेपंस लोकेटिंग रेडार नहीं थे। जब कि पाकिस्तानी सेना इससे सुसज्जित थी और वे आसानी से भारतीय बोफोर्स तोपों को ही निशाना बना कर उन्हें बेकार कर दे रहे थे। करगिल की चोटियों पर बैठे जेहादियों के ठिकानों को तहस नहस करने के लिये मिराज-2000 लड़ाकू विमानों में लेजर पाड इस्राइल से मंगा कर लगाए गए थे तभी करगिल में दुश्मन के ठिकानो पर सटीक निशाने वाले बम गिराए जा सके। पाकिस्तानी सेना से लड़ने के लिये आनन-फानन में विदेशों से गोलाबारूद और हथियार मंगाने पड़े थे।

करगिल की लड़ाई खत्म हुई और फिर हम सोचने लगे कि अब कोई युद्ध नहीं होगा। हमारे राजनीतिक नेतृत्व ने एक बार फिर सैन्य तैयारी में कोताही बरतनी शुरू की और आज हमारी सेनाओं की हालत एक बार फिर खस्ता है। आज फिर हमारी चीन से लगी  सीमाओं पर युद्ध के बादल मंडराने लगे हैं और हम ताबड़तोड़ कई तरह के हथियारों और अन्य शस्त्र प्रणालियों की खरीद में जुट गए हैं। लेकिन इन्हें भारतीय सेनाओं में शामिल करने में कुछ साल लग जाएंगे। हमारे माथे पर युद्ध आज सवार है और हमें आज मौजूद हथियारों से ही लड़ना होगा। करगिल के युद्ध के पहले तब के सेना प्रमुख जनरल वी पी मलिक ने निराशा भरे स्वर में कहा था कि हमारे पास जो भी हथियार हैं हम उन्हीं से लड़ेंगे।

आज जब हमारी दोनों सीमाओं पर तनाव बढ़ता जा रहा है आज भी कमोबेश हमारी सेनाओं की वही हालत है। हमारी वायुसेना के स्क्वाड्रनों  की संख्या घट कर 32 पर रह गई है जिनमें करीब आधे से अधिक पुरानी तकनीक और क्षमता वाले रूसी मिग वर्ग के लड़ाकू विमान हैं। जब कि वायुसेना के बेड़े में कम से कम 45 स्क्वाड्रन विमान होने चाहिये। इसी तरह नौसेना के पास पनडुब्बियों की संख्या घट कर 13 रह गई है जिससे विशाल हिंद महासागर की चौकसी और रक्षा नहीं की जा सकती।  इसी तरह थलसेना की आक्रमण और हवाई रक्षा प्रणाली का भी बुरा हाल है।  अज की तारीख में यदि भारत को युद्ध लड़ना पडे तो भारतीय सेना को काफी भारी पड़ेगा।

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