vishesh

समर नीति: चीन के अड़ियल रूख के पीछे शी जिनपिंग

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग
फाइल फोटो

भारत और चीन के बीच पूर्वी लद्दाख में गत 05 मई से शुरू सैन्य तनातनी के अब साढ़े तीन महीने से अधिक होने वाले हैं लेकिन चीन के अडियल रुख की वजह से यह तनातनी जारी है। गत 20 अगस्त को भारत और चीन के बीच सीमा मसले को सुलझाने वाली संयुकत प्रक्रिया के तहत विदेश मंत्रालयों के संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारियों की पांचवीं बैठक में चीन ने अपना रुख और कड़ा कर लिया है। चीन की जिद है कि सीमा मसले को सुलझाने के लिये भारत बीच रास्ते पर मिले। यानी पूर्वी लद्दाख के जिन इलाकों में चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा के पार भारतीय क्षेत्रों में घुस आया है वह वहां से कुछ पीछे हटने को तैयार हो सकता है लेकिन पूरी तरह चीनी सेना पीछे नहीं जाएगी। लेकिन भारत ने चीन से तीन बातें कही हैं- चीन अपने सैनिकों को वास्तविक नियंत्रण रेखा पर वापस ले जाए, इस रेखा के पीछे के इलाके में भारी संख्या में सैन्य तैनाती को खत्म करे और तीसरी मांग है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा तक सैनिकों को गश्ती का अधिकार बहाल हो।





लेकिन चीन अपनी जिद पर अड़ा है। उसने गलवान घाटी और हाट स्प्रिंग इलाके से तो अपने सैनिक वास्तविक नियंत्रण रेखा तक वापस बुला लिये हें लेकिन पैंगोंग त्सो झील इलाके पर वह पीछे हटने को तैयार नहीं है। चीन देपसांग के मैदानी इलाकों को भी छोड़ने को तैयार नहीं।

एक तरफ चीन भारत के साथ दोस्ती और प्राचीन सम्बन्धों की बातें करता है लेकिन अपनी शर्तों पर ही वह भारत से दोस्ती का सिलसिला जारी रखने को मजबूर करना चाहता है। लेकिन भारत ने साफ कह दिया है कि दोनों देशों के बीच दोस्ती का रिश्ता और दोस्ताना माहौल तभी जारी रहेगा जब भारत- चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा पर शांति व स्थिरता की स्थिति बनी रहेगी। यह तब तक नहीं बहाल हो सकती जबतक कि चीन पूर्वी लद्दाख के वास्तविक नियंत्रण रेखा के भारतीय इलाके में अपना कब्जा नहीं छोड़ देता है।

गौरतलब है कि साल 2020 को दोनों देशों ने आपसी राजनयिक रिश्तों की स्थापना की 70वीं सालगिरह के तौर पर मनाने का फैसला किया था और गत एक अप्रैल को दोनों देशों के राष्ट्रीय नेताओं ने बधाई और शुभकामनाओं के संदेशों के आदान प्रदान किये थे। हालांकि तबतक चीन से दुनिया भर में कोरोना महामारी का प्रकोप फैल चुका था लेकिन तब भी दोनों देश 70वीं सालगिरह की तैयारी कर रहे थे लेकिन अब मई के पहले सप्ताह से आरम्भ हुई सैन्य तनातनी ने आपसी रिश्तों के भविष्य को खटाई में डाल दिया है। चीन ने इस तरह का आक्रामक रुख न केवल भारत के साथ दिखाया है बल्कि वह दक्षिण चीन सागर में भी कृत्रिम द्वीपों का निर्माण कर अपने सागरीय इलाके का विस्तार कर रहा है। दुनिया के कई हिस्सों में चीन द्वारा दिखाए जा रहे इस आक्रामक रूख के लिये चीनी पर्यवेक्षक भी चीनी राष्ट्रपति शी चिन फिंग को अकेला जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। इनका सपना चीन के सबसे शक्तिशाली सम्राट के तौर पर अपने को स्थापित करना और चीनी सत्ता को विश्व भर में स्थापित करने की चालें चल कर अपनी जनता की वाहवाही लूटना है।

कोरोना महामारी के शुरुआती कुप्रबंध और इस महामारी के फैलने के लिये जिम्मेदार ठहराए जा रहे चीनी राष्ट्रपति अपनी जनता के बीच निंदा के शिकार हो रहे थे जिससे वह ध्यान हटाने के लिये ही अपने प्रादेशिक विस्तार की रणनीति को लागू कर रहे हैं। राष्ट्रपति शी की इन नीतियों का विरोध करने की हिम्मत जिस किसी ने भी दिखाई है उसका सफाया कर दिया जा रहा है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की अग्रणी नेता छाय शिया ने राष्ट्रपति शी की नीतियों पर सवाल उठाए तो उन्हें पार्टी से निलम्बित कर दिया गया। वह भाग्यशाली हैं कि किसी तरह चीन से निकल कर वह अमेरिका पहुंच गई हैं अन्यथा उनका भी हश्र अपने अन्य असंतुष्ट राजनीतिक साथियों की तरह ही होता।

Comments

Most Popular

To Top