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समर नीति: अफगान में भारत का योगदान व्यर्थ जाएगा ?

अफगान के राष्ट्रपति और पीएम मोदी

दोहा में अफगानिस्तान में चल रही शांति वार्ता के शुरू होने के मौके पर हालांकि भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी अपना सम्बोधन दिया था और अफगानिस्तान के भविष्य को लेकर भारत का चिरपरिचित रूख पेश किया था कि अफगानिस्तान का भविष्य अफगानियों द्वारा ही और अफगानियों अगुवाई में ही तय होना चाहिये। लेकिन दोहा शांति वार्ता में जो दो प्रमुख भागीदार अमेरिका और तालिबान हैं वे इसमें विश्वास नहीं करते। अन्यथा अमेरिका को कहना चाहिये था कि अफगानियों का भाग्य अफगानियों द्वारा तय करने के लिये बंदूक की नोंक पर समझौते पर पहुंचने की कोशिश के बदले जनतांत्रिक तरीके से बहुमत के फैसले से ही होना चाहिये।





अफगानिस्तान में गत डेढ़ दशक से चल रही जनतांत्रिक सरकार के अगुवा अफगानी लोगों द्वारा ही बनाए गए हैं इसलिये इस जनतांत्रिक सरकार को भंग कर सत्ता तानाशाही तरीके से चलाने वाले तालिबान के हाथों सौंप देने की जो कवायद दोहा में चल रही है उससे अफगानी समाज घबराया हुआ है। उसे लग रहा है कि तालिबान भले ही कितना भी भरोसा दिलाने की कोशिश करेकि उसके भावी शासन में महिलाओं का पूरा सम्मान होगा लेकिन इस पर किसी को भरोसा नहीं हो रहा। उन्हें डर सता रहा है कि तालिबान के शासन में अफगानिस्तान को फिर कट्टरपंथी ताकतों के रहमोकरम पर रहना होगा। पिछले डेढ़ दशक के दौरान अफगानिस्तान में महिलाओं ने जिस तरह अफगानी समाज में खुले तौर पर विचरण किया है और अफगानिस्तान के सामाजिक और सरकारी गतिविधियों में खुल कर भाग लेना शुरु किया है उस पर पाबंदी लग जाएगी। अफगानिस्तान में जिस तरह पिछले डेढ़ दशक के दौरान महिलाशिक्षा में क्रांति आई है वह बेमिसाल है और इसके लिये भारत का योगदान कम कर नहीं आंका जा सकता। अफगानिस्तान में स्कूलों को फिर खडा करने में भारत ने असीम योगदान दिया है।

तालिबान के सत्ता में आने के बाद पहला काम तो यही होगा कि वहां के स्कूलों में पाठ्यक्रम फिर तालिबानी विचारों के अनुरुप हो जाएंगे और स्कूलों में लडकियों का पढना बंद हो जाएगा। लडकियों को एक बार फिर घरों की चहारदीवारी में बंद कर दिया जाएगा। अफगानिस्तान के इसी भविष्य को लेकर अफगानिस्तान की मौजूदा जनतांत्रिक सरकार को चिंता है और इन्हीं मसलों पर चर्चा करने अफगानिस्तान के अग्रणी नेता डा. अब्दुल्ला अब्दुल्ला पांच से आठ अक्टूबर तक भारत आए थे और यहां विदेश मंत्री जयशंकर , राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के अलावा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से भी मुलाकात की और आग्रह किया कि दोहा में चल रही शांति वार्ता में सक्र्यि भागीदारी करे।

पर अफसोस की बात यही है कि अफगानिस्तान में सामाजिक क्रांति लाने में योगदान करने वाले भारत की वार्ता टेबल पर अहम भूमिका नहीं है। अमेरिका किसी भी सूरत में अफगानिस्तान से अपनी फौज इस साल क्रिसमस से पहले वापस बुलाने को आतुर है और वह आननफानन में सत्ता की चाभी तालिबान को सौंप कर भागने की कोशिश में है। तालिबान को पता हैकि अमेरिका अपनी फौज को वहां से तुरंत हटाने को इसलिये आतुर है कि वह अपने और सैनिकों के ताबूत नहीं देखना चाहता। पिछले करीब दो दशकों के दोरान अफगानिस्तान में हजारों अमेरिकी सैनिक शहीद हुए हैं और अमेरिका को लग रहा है कि अमेरिका को इससे क्या हासिल हुआ। वास्तव में अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना में हताशा का माहौल भरने में पाकिस्तान की बहुत बडी भूमिका है और इसीलिये आज वह अपनी समर नीति की विजय गाथा लिखने को आतुर है। तालिबान के लडाकों को अपनी जमीन पर शरण और सैनिक साजों सामान दे कर पाकिस्तान ने अफगान सरकार को केवल राजधानी काबुल तक ही सीमित करवा दिया है। आज यदि काबुल और दूसरे शहरों से अमेरिकी फौज हट जाए तो तालिबान को काबुल के किले पर फिर लौटेने में अधिक वक्त नहीं लगेगा। इसके मद्देनजर भारतीय सामरिक हलकों में सवाल यही उठ रहा है कि तीन अरब डालर की राशि से भारत ने अफगानिस्तान के विकास में जो योगदान दिया है वह पानी में बहने के समान होगा ?

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