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समर नीति: चीन के खिलाफ एकजुट होना होगा

भारत-जापान नौसेना के बीच युद्धाभ्यास
प्रतीकात्मक फोटो

पिछले छह अक्टूबर को तोक्यो में चार देशों भारत, अमेरिका, जापान और आस्ट्रेलिया की चतुर्पक्षीय बैठक के आयोजन के एक महीने बाद इन्हीं 04 देशों के साझा नौसैनिक अभ्यास के आयोजन की तैयारी इन दिनों चल रही है जिस पर दुनिया के सामरिक पर्यवेक्षकों की निगाहें टिकी हैं। मालाबार नाम का यह साझा नौसैनिक अभ्यास बंगाल की खाड़ी में नवम्बर के शुरू में होगा। इस अभ्यास में चौथा देश आस्ट्रेलिया को भी शामिल करने का ऐलान भारतीय विदेश मंत्रालय ने जब किया तो दुनिया में एक नये सैनिक गठजोड़ के उभरने की अटकलें सामरिक हलकों में लगाई जाने लगी।





रोचक बात यह है कि मालाबार नाम का यह बहुपक्षीय साझा अभ्यास साल 2007 में भी आयोजित हुआ था जिसमें चार देशों भारत, आस्ट्रेलिया, जापान और अमेरिका के अलावा सिंगापुर को भी आमंत्रित किया गया था। तब भी बंगाल की खाड़ी में आयोजित पांच देशों का साझा अभ्यास सामरिक हलकों में चर्चा का विषय इसलिये बना था कि चीन द्वारा एतराज दिखाने के बाद मालाबार के साझेदार देशों ने इसे दो देशों अमेरिका और भारत तक ही सीमित रखने का फैसला किया। लेकिन प्रशांत से ले कर हिंद महासागर तक के इलाके में चीन की दादागिरी जब बढने लगी तो जापान को भी इसमें शामिल करने का फैसला साल 2015 में किया गया। अब पांच साल बाद मालाबार का विस्तार करने का फैसला दुनिया के सामरिक पर्यवेक्षकों का फिर ध्यान आकर्षित कर रहा है।

सभी का मानना है कि साल 2007 में मालाबार के साझेदार देशों ने चीन की संवेदनशीलता का ध्यान रखते हुए इसे भविष्य में दिवपक्षीय स्तर तक ही सीमित रखने का फैसला किया लेकिन इस बार ऐसा नहीं होगा। चीन ने दक्षिण चीन सागर, ताइवान, हांगकांग और भारत चीन सीमांत इलाकों में जिस तरह अपनी दादागिरी दिखाई है उससे पूरी दुनिया हैरान है और चीन पर दबाव डालने के लिये एकजुट होकर मुकाबला करने का फैसला किया है। इसके लिये जरूरी था कि जनतात्रिक मूल्यों में विश्वास रखने वाली बडी ताकते एकजुट हों और चीन को संदेश दें कि पूरी दुनिया उसकी दादागिरी से त्रस्त है और उसकी विस्तारवादी नीतियों पर बंदिशें लगाने की जरुरत है। चीन ने जिस तरह दक्षिण चीन सागर के अधिकांश इलाके पर अपना आधिपत्य जताया है वह विश्व समुदाय को कतई स्वीकार नहीं हो सकता। इसके पहले कि चीन इस सागरीय इलाके पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिये और भी बडे कदम उठाए , बडी ताकतों को चीन के मंसूबों पर पानी फेरना जरुरी होगा।

यह सुनिश्चित करने के लिये बडी जनतांत्रिक ताकतों को केवल दिखावटी और सांकेतिक कदम उठाने से ही काम नहीं चलेगा। हालांकि चीन के विदेश मंत्री वांग ई ने अपनी चिंताजनक टिप्पणी चर्तुपक्षीय बैठक के बाद करते हुए चार देशों के एक मंच पर इकट्ठा होने पर एशियन नाटो की संज्ञा दी थी । लेकिन यदि चीन की चुनौती का मुकाबला करना है तो चारों देशो को एशियन नाटो जैसा ही कोई सैन्य गठजोड बनाने के लिये गम्भीरता से सोचना होगा। चीन ने जिस तरह दक्षिण चीन सागर में अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिये कृत्रिम द्वीपों का निर्माण कर अपने सागरीय इलाके के विस्तार की रणनीति पर चल रहा है उस पर वक्त रहते लगाम लगाने की जरुरत है। चीन ने इन कृत्रिम द्वीपों पर अपनी मिसाइलें तैनात की हैं जहां से वह दक्षिण चीन सागर के इलाकों पर अपने दावों की रक्षा कर सकता है। चीन की इन हरकतों पर रोक लगाने के लिये क्वाड यानी चर्तुपक्षीय गुट के साझेदार देशों को अपनी साझा सेना तैनात करनी होगी। चीन के आंगन में ही जाकर उससे मुकाबला करने के लिये चारों देशों को तैयार रहना होगा अन्यथा दक्षिण चीन सागर के बाद वह पूर्वी चीन सागर के इलाकों पर भी अपना दावा जताने लगे तो कोई हैरानी वाली बात नहीं होगी।

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