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समर नीति: भारत और चीन विवाद में अमेरिका

पीएम मोदी और ट्रंप
फाइल फोटो

भारत-चीन विवाद में अमेरिका विशेष रुचि ले रहा लगता है। पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत औऱ चीन के बीच बीचबचाव की पेशकश करने वाला ट्वीट जारी किया और फिर कहा कि उनकी इस मसले पर भारतीय प्रधानमंत्री से बात हुई है। इसके एक दिन बाद ही अमेरीकी रक्षा मंत्री मार्क एस्पर ने शुक्रवार शाम को भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से फोन पर बात की।





भारत-चीन मामले में अमेरिका पहले भी इसी तरह की रुचि लेता रहा है लेकिन सार्वजनिक तौर पर कभी इसका खुलासा नहीं किया। जून, 2017 में जब भूटान के डोकलाम इलाके में चीनी सेना की घुसपैठ को निरस्त करने के लिये चीनी सेना को भारत ने मुंहतोड़ जवाब दिया था तब चीनी सेना को पीछे हटने को मजबूर होना पड़ा था। इस दौरान अमेरिका ने भारत को कई किस्म की खुफिया जानकारी मुहैया करा कर भारत की मदद की थी।

इसलिये भारत चीन के बीच पूर्वी लद्दाख के इलाके में चल रहे ताजा प्रकरण में अमेरिका के बड़बोले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने खुल कर बोल दिया जो उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिये था। राजनयिक वार्तालाप गोपनीयता के आवरण में ढंके ही रहने चाहिये। लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति कभी इसका सम्मान नहीं करते औऱ इलेक्ट्रानिक मीडिया की ब्रेकिंग न्यूज की तरह वे अपने ट्वीट के जरिये समाचार जारी करने में विशेष उत्साह दिखाते हैं। इस बार भी डोनाल्ड ट्रम्प ने ऐसा ही किया। जब उन्होंने कहा कि वह भारत चीन सीमा तनाव को दूर करने के लिये बीचबचाव करने के लिये दोनों देशों को सूचित कर चुके हैं। चीन और अमेरिका के बीच रिश्तों के ताजा हाल के मद्देनजर कोई भी यह नहीं सोच सकता कि चीन कभी इस मध्यस्थता को स्वीकार करेगा। भारत भी पड़ोसी देशों के साथ अपने विवादों को अपने स्तर पर दिवपक्षीय बातचीत के जरिये सुलझाने में सक्षम है। लेकिन यदि पर्दे के पीछे से कोई देश मदद करना चाहता है तो उसे स्वीकार करने में भी कोई हर्ज नहीं है।

हैरानी की बात तो यही है कि राष्ट्पति ट्रम्प ने पहले तो यह ट्वीट किया कि उन्होंने भारत और चीन के बीच मध्यस्थता का प्रस्ताव भेजा है और फिर दो दिनों बाद 29 मई को यह कह दिया कि इस मसले पर उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से फोन पर बात की है। उन्होंने यह भी कहा कि चीन के साथ चल रहे विवाद की वजह से वह काफी दुखी नजर आ रहे थे। किसी राष्ट्रप्रमुख को दूसरे देश के राष्ट्र प्रमुख से हुई बातचीत का इस तरह खुलासा भी नहीं करना चाहिये। राष्ट्रपति ट्रम्प शायद राजनय के कच्चे खिलाडी ही कहे जाएंगे। वह एक व्यापारी और उद्यमी रहे हैं और शायद इसीलिये उनकी भाषा और बोली में राजनय नहीं देखा जाता । वह हमेशा दो टूक बोलते हैं और इस वजह से वह अक्सर विवादों में और चर्चा में रहते हैं।

जो भी हो भारत चीन के विवादों में खुलेआम टांग अड़ाकर अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत का भला ही किया है। इससे चीन विश्व समुदाय के बीच शर्मिंदा होगा और उस पर राजनयिक दबाव बढ़ेगा। चीन की यह छवि मजबूत होगी कि वह नाहक ही दक्षिण चीन सागर से लेकर भारतीय सीमाओं तक पड़ोसी देशों के साथ तनाव उलझा रहा है। खासकर ऐसे वक्त जब पूरी दुनिया चीन से फैली कोरोना महामारी की वजह से जूझ रही है चीन को अपनी विस्तारवादी और आक्रामक नीतियों को जमीन पर उतारने की कोशिश नहीं करनी चाहिये थी। ऐसे वक्त जब दुनिया की सरकारें कोरोना महामारी से जूझ रही हैं और उनका सारा ध्यान इनसे निपटने पर लगा है। ऐसा लगता है कि चीन इन हालात का फायदा उठा कर अपने सामरिक मंसूबे पूरा करना चाहता है। चीन के इन कुत्सित इरादों को नाकाम करना होगा। इसके लिये भारत सहित विश्व समुदाय को एकजुट आवाज में बोलना होगा और चीन को बताना होगा कि वह इस पृथ्वी पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने की कोशिश करने वाली नीतियों से बाज आए। अन्यथा चीन को इसके बुरे नतीजे भुगतने होंगे।

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