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समर नीति: ट्रम्प ने भू-राजनीति को बदला

अमेरिकी चुनाव में प्रवासी भारतीय

निवर्तमान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्र्म्प ने चीन की दादागिरी के खिलाफ जिस तरह आवाज बुलंद की उतना अमेरिका का कोई भी राष्ट्रपति हिम्मत नहीं कर सका। डोनाल्ड ट्रम्प के विचारों और नीतियों से भले ही हम सहमत नहीं हों लेकिन उनकी इन्हीं नीतियों की वजह से उन्हें 6.6 करोड़ अमेरिकी मतदाताओं ने अपना वोट दिया जो 2016 के मुकाबले दस प्रतिशत अधिक है। इस बार रिकार्ड संख्या में डेमोक्रेट समर्थक मतदाताओं ने वोट दिया जिससे भावी राष्ट्रपति जो बाइडन को सात करोड़ वोट मिले और वह जीत के पूरे हकदार बने हैं।





चीन ने अमेरिका के कारपोरेट जगत को जिस तरह अपने मोहपाश में ले लिया था उससे पिछले अमेरिकी प्रशासन अछूता नहीं रह सके। चीन में अमेरिकी कारपोरेट जगत के हित इतने बंध गए थे कि चीन को लेकर अमेरिकी प्रशासन की नीतियों को प्रभावित करते रहे। इसी वजह से पिछले अमेरिकी प्रशासन दक्षिण चीन सागर में चीन की दादागिरी को नजरअंदाज करते रहे। खुद डोनाल्ड ट्रम्प की चीन में व्यावसायिक गतिविधियां हैं लेकिन इनकी परवाह किये बिना उन्होंने चीन के खिलाफ आग उगलने से गुरेज नहीं किया। बराक ओबामा के प्रशासन में उपराष्टपति जो बाइडन भी चीन के काफी करीबी माने जाते थे और चीन समर्थक रुख अपनाने के लिये वे प्रशासन को प्रेरित करते थे। लेकिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने चार साल के कार्यकाल में चीन का जिस तरह जम कर लोहा लिया और इस इरादे से भूराजनीति में जो बदलाव लाए उसे पलटने की हिम्मत भावी राष्टपति जो बाइडन नहीं कर सकेंगे। यदि वे डोनाल्ड ट्रम्प की नीतियों को लेकर चीन के साथ कुछ नरमी बरतने की कोशिश करेंगे तो दुनिया में अपनी नेतृत्वकारी भूमिका की कीमत पर ही कर सकेंगे।

जो बाइडन को चीन की आक्रामक समर नीति से लोहा लेना है तो उन्हें डोनाल्ड ट्रम्प की नीतियों में कुछ बदलाव लाने होंगे। वास्तव में डोनाल्ड ट्रम्प ने एक तरफ तो चीन से सीधा लोहा लिया लेकिन दूसरी तरफ उन्होंने चीन के लिये सामरिक जगह खाली की। इन इलाकों को अपनी गिरफ्त में लेने के लिये चीन ने देरी नहीं की। जैसे ईरान के साथ छह देशों के परमाणु समझौते को तोड़कर उन्होंने चीन को मौका दिया कि वह ईरान को गोद ले ले। इस वजह से पश्चिम एशिया से लेकर दक्षिण और मध्य एशिया में चीन को अपना असर फैलाने और वहां उन इलाकों में अपना स्थायी गढ़ बनाने का मौका मिलेगा। इस वजह से दीर्घकाल तक के लिये अमेरिका इन क्षेत्रों के देशों के साथ अपने रिश्ते गहरे कर सामरिक तौर पर उन्हें अपने पर निर्भर नहीं बना सकेगा।

भावी अमेरिकी प्रशासन को यदि दुनिया में अपनी नेतृत्वकारी भूमिका निभानी है तो चीन के खिलाफ डोनाल्ड ट्रम्प की उग्र तेवर वाली नीति को जारी रखना होगा। यह भारत के हित में होगा कि दुनिया पर चीन के प्रभुत्व के बदले अमेरिका हावी रहे। भावी अमेरिकी प्रशासन ने यदि अमेरिका के घरेलू आर्थिक हितों के मद्देनजर चीन के प्रति नरमी बरती तो दीर्घकालिक नजरिये से अमेरिका के लिये नुकसानदेह ही साबित होगा क्योंकि एक बार दुनिया पर अपना प्रभुत्व जमाने के बाद वह अमेरिका या किसी भी प्रतिद्वंद्वी देश को नहीं बख्शेगा।

डोनाल्ड ट्रम्प ने जिस तरह हिंद प्रशांत नीति को धार प्रदान की है वह दक्षिण चीन सागर से लेकर हिंद महासागर तक अमेरिकी सामरिक प्रभुत्व जमाने के लिये जरुरी था । चूंकि इस इलाके में अमेरिका के हित भारत से मेल खा रहे थे इसलिये भारत और अमेरिका दोनों इस इलाके में साथ हो गए। अमेरिका अब इतना मजबूत नहीं रहा या यूं कहें कि चीन इतना ताकतवर हो गया है कि अमेरिका उससे अकेले मुकाबला नहीं कर सकता है इसलिये भारत और अमेरिका के साझा हित में था कि दोनों न केवल साथ आएं बल्कि समान विचार और साझा हित वाले दो अन्य देशों आस्ट्रेलिया और जापान को भी साथ ले लें । चीन के खिलाफ गिरोहबंदी को देख कर दक्षिणपूर्व एशिया के दूसरे देश इंडोनेशिया, वियतनाम, दक्षिण कोरिया आदि भी साथ आने की हिम्मत कर रहे हैं।

भावी राष्टपति जो बाइडन को देखना होगा कि अमेरिका के हित अल्पकालिक कारोपोरेट हितों की रक्षा के नजरिये से बेहतर सुरक्षित होते हैं या फिर हिंद प्रशांत इलाकों पर चार देशों को साथ लेकर चलने से बेहतर सुरक्षित होंगे।

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