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समर नीति: चीन की धौंस का दुनिया जवाब दे

चीन का 70वां स्थापना दिवस
फाइल फोटो

कोविड महामारी फैलाने के बाद चीन ने जिस तरह भारत सहित कई अन्य देशों पर अपना  सैन्य दबाव बढाया है उसे विश्व समुदाय को  नोटिस में लेना चाहिये और  एकजुट हो कर चीन की इस धौंस का जवाब देना चाहिये।  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शुक्रवार को जिस तरह लेह में भारतीय सैनिकों को सम्बोधित करते हुए चीनी विस्तारवाद को चुनौती दी है उसे बाकी दुनिया को भी  नोटिस में लेकर चीन पर समुचित दवाब बनाना चाहिये। चीन को यदि भारत के खिलाफ सफलता मिलती है तो उसका मनोबल इतना बढ जाएगा कि वह पूरी दुनिया पर धौंस दिखाने लगेगा। चीन के लोगों और सत्ता प्रतिष्ठान में यह गलतफहमी है कि अपने चीनी नाम चुंग क्वो के अनुरुप  अपने राष्ट्रीय सामरिक हितों को देखे। चुंग क्वो का   मतलब होता है कि मध्य साम्राज्य । चीनी समरनीतिकार सोचते हैं कि उनका साम्राज्य पृथ्वी के बीचोंबीच स्थित है जहां  से पूरी दुनिया पर राज करने  उनका पैतृक अधिकार है। इसी सोच के अनुरुप चीन ने तिब्बत से लेकर मंगोलिया के बडे भूभाग जिसे इनर मंगोलिया कहते हैं और शिन्च्यांग पर अपना कब्जा जमाया। यदि ये इलाके आज चीन के कब्जे में नहीं होते तो आज का चीन मौजुदा भूभाग का एक तिहाई ही होता। ये मिसालें दर्शाती हैं कि चीन प्राचीन काल से ही विस्तारवादी रणनीति पर चलता रहा है।





 इसी सोच के अनुरुप चीन ने दक्षिण चीन सागर के इलाके पर अपना अधिकार जमाया है। इस सागर के तटीय देशों के कई द्वीपों पर चीन यह कह कर अपना अधिकार जमाता है कि प्राचीन काल में कभी उसके मछुवारे वहां मछली पकडने जाते रहे हैं। पूरी दुनिया पर अपना साम्राज्य फैलाने के इरादे से ही चीन ने बेल्ट एंड रोड इनीशियेटिव यानी बी आऱ आई की महत्वाकांक्षी योजना को लागू करना शुरु किया है ताकि दुनिया के सारी सडकें चीन तक  जाएं,  जहां से चीनी माल दुनिया के बाजार पर छाने में  आसानी हो।   वन बेल्ट वन रोड यानी ओबोर के जरिये चीन बाकी दुनिया पर अपना आर्थिक औऱ सामरिक प्रभुत्व जमाने की गहन कोशिश  कर रहा है।

 वैश्वीकरण के बहाने चीन ने पूरी दुनिया को सप्लाई चेन बनने में कामयाबी हासिल कर ली है। इस वजह से दुनिया  के दूसरे इलाके में स्थानीय  छोटे और बडे उद्योंग धंधें चौपट हो चुके हैं।  ये इलाके चीन के माल का  महज व्यापार करने वाले देश के तोर पर तब्दील हो चुके है। चीन इन छोटे और यहां तक कि इटली जैसी ताकतवर अर्थव्यवस्था को भी जिस तरह अपनी चपेट में लेने में कामयाब हो चुका है वह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि चीन का आर्थिक और सैन्य  विस्तारवाद किस तरह कामयाब हो चुका है।

 आज के चीन को लग रहा है कि जिस तरह प्राचीन काल में उसने अपनी सैन्य ताकत के बल पर अपने साम्राज्य का विस्तार किया है  उसके लिये एक बार फिर सुनहरा मौका आ गया है कि वह नये सिरे से  अपने साम्राज्य का विस्तार करने का अभियान शुरु करे। लेकिन चीन की यह चाल भारत पर कामयाब नहीं होगी। प्रधानमंत्री मोदी ने चीन को साफ शब्दों में आगाह किया है कि  अपने विस्तारवादी मंसूबों को  भूल जाएं अन्यथा इसके बुरे नतीजे चीन को भुगतने होंगे। आखिरकार भारत भी एक प्राचीन ताकत रहा है जिसका साम्राज्य पूरे दक्षिण एशिया और इसके कहीं आगे तक फैला रहा था।

लेकिन चीन को लग रहा है कि एक बडी आर्थिक ताकत बनने के बाद वह एक बडी सामरिक ताकत बनने का अधिकारी हो गया है और इसका इस्तेमाल कर वह पृथ्वी पर मध्य  साम्राज्य की स्थापना की परिकल्पना  साकार करना चाहता है। आज का विश्व समुदाय यदि चीन की इन हरकतों को नजरअंदाज करता गया तो वह दिन दूर नहीं जब पूरी दुनिया में चीन की तूती बोलेगी और  अमेरिका व यूरोपीय ताकतें उसकी पिछलग्गू बनने को मजबूर होंगी।

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