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समर नीति: अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के दौरे के मायने

पीएम मोदी और ट्रंप

24 और 25 फरवरी को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का भारत दौरा भारत के नजरिये से  कोई  सकारात्मक ठोस नतीजा देने  वाला नहीं कहा जा सकता लेकिन   इससे भारत अमेरिका रिश्तों की  अहमियत कम नहीं हो जाती।  अमेरिकी राष्ट्रपति के भारत दौरे से ही अमेरिकी प्रशासन भारत के साथ रिश्तों को गम्भीरता से आगे बढाने को प्रेरित हो जाता है।  पिछले दो दशकों में भारत अमेरिका रिश्तों का ग्राफ निरंतर ऊपर ही होता गया है हालांकि हाल के अमेरिकी रुख से भारत के लिये चिंताजनक बातें भी हुई हैं। सन 2000 में अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन  के भारत दौरे के  बाद आतंकवाद के क्षेत्र में  अमेरिका ने सही मायने में भारत को   मदद दी और पाकिस्तान को आडे हाथों लेते हुए उसे भारत के समक्ष झुकने को भी मजबूर किया। इसके बाद 2006 में तत्कालीन राष्ट्रपति जार्ज बुश ने भारत का दौरा किया और इसके बाद दुनिया की परमाणु मुख्यधारा में भारत का प्रवेश मुमकिन हो सका। इसके बाद राष्ट्रपति बराक ओबामा ने दो बार भारत का दौरा कर पाकिस्तान पर दबाव बनाए रखा और अफगानिस्तान के मसले पर अमेरिका ने भारत की भूमिका को सराहा और भारत के सामरिक हितों को नजरअंदाज नहीं होने दिया। लेकिन डोनाल्ड ट्रम्प जब अमेरिका के राष्ट्रपति बने तो उन्होंने घरेलू राजनीतिक हितों के मद्देनजर फैसले लेने शुरु किये जिससे भारत की सामिरक  चिंताएं बढने लगीं। खासकर अफगानिस्तान के मसले पर अमेरिका ने जब पाकिस्तान के साथ रिश्तों को तरजीह देनी  शुरू कर दी।





 वास्तव में अमेरिकी राष्ट्रपति  डोनाल्ड ट्रम्प ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ रिश्तों को प्राथमिकता दी और उनके फैसलों से भारत के सामरिक हितों पर चोट पहुंचने लगी।  हालांकि अमेरिका ने अपने हथियार उद्योग को जीवंत रखने के लिये भारत के साथ रक्षा क्षेत्र में कई तरह के साझा युद्धाभ्यास और सहयोग समझौते किये  जिससे भारतीय सेनाओ को अपनी ताकत बढ़ाने का असाधारण मौका मिला  है।  पिछले डेढ़ दशक के दौरान अमेरिका ने भारत को 20 अरब डालर से भी अधिक के रक्षा साज सामान बेचे हैं औऱ आगे भी उसकी भारत के डेढ़ सौ अरब  डालर के रक्षा बाजार पर पैनी निगाह लगी हुई है। यदि यह कहा जाए कि भारत के साथ सामरिक साझेदारी के रिश्तों को गहरा करने के पीछे अमेरिका के मंसूबे अपने हथियार उद्योग को चमकाना भी  है तो गलत नहीं होगा।

साफ है कि भारत अमेरिका सामरिक साझेदारी का रिश्ता  एकपक्षीय लाभदायक नहीं कहा जा सकता। भारत के साथ  सामरिक रिश्तों की अहमियत को देखते हुए ही अमेरिका ने भारत के साथ रिश्तों का स्तर ऊंचा कर समग्र वैश्विक सामरिक साझेदारी का कर दिया है। दोनो  देश हिंद प्रशांत इलाके में चीन की चुनौती का मुकाबला करने के लिये आपसी सहयोग को औऱ गहरा करेंगे और इसके साथ ही रिश्तों में एक नया आयाम यह जुड़ने वाला है कि चीन की बेल्ट एंड रोड परियोजना के मुकाबले अमेरिकी अगुवाई में ब्लू डाट  प्रोजेक्ट शुरु करने की पहल का भारत ने स्वागत किया है औऱ इसमें भारत ने शामिल होने के संकेत दिये हैं।

 भारत अमेरिका समग्र वैश्विक सामरिक साझेदारी के रिश्तों की अहमियत चीन की बढती प्रभुत्वकारी नीतियों के मद्देनजर औऱ भी बढ़ जाती है। इसलिये जरुरी है कि अमेरिका भारत को एक सामरिक ताकत के तौर पर ख़डा होने के लिये ये शर्तें नहीं डाले कि  भारत रूस के साथ रक्षा रिश्ते नहीं रखे। इसके लिये अमेरिका ने कैटसा कानून लाया है जिससे भारत को रूस के साथ अपने सामान्य रक्षा और सामरिक रिश्तों को विकसित होने  से रोकने में दिक्कतें पैदा हो रही हैं। भारत अमेरिका के सामरिक रिश्तों में बाधा पैदा करने वाली कोई नीति अमेरिका नहीं लाए। यह भारत को सुनिश्चित करना होगा।

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