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समर नीति: तालिबान-अमेरिका की लाचारी

तालिबान
फाइल फोटो

तालिबान और अफगानिस्तान सरकार के बीच समझौता कराने के लिये राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प  काफी आतुर हैं और किसी भी कीमत पर वह अफगानिस्तान से दुम दबाकर भागने के चक्कर में हैं जिसका अहसास तालिबान और उसके आका पाकिस्तान को काफी पहले ही हो चुका है। इसीलिये  पिछले दो सालों से तालिबान अमेरिका के साथ चल रही बातचीत को अपनी शर्तों पर ही चलाना चाहता है। तालिबान की कोशिश है कि अमेरिकी सेनाएं किसी भी तरह अफगानिस्तान छोड़ कर चली जाएं तब उसका अफगानिस्तान पर एक बार फिर निरंकुश शासन करना आसान हो जाएगा।





यही वजह है कि तालिबान ने अमेरिका के साथ एक गोपनीय समझौता करने  के लिये अमेरिका को मना लिया था। अमेरिका और तालिबान इस बात को लेकर एक अंतरिम गोपनीय समझौते पर दस्तखत करने की तैयारी कर रहे थे जिसके लिये अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी को भी कैम्प डेविड बुलाया गया था।  लेकिन ऐन वक्त पर अमेरिकी राष्ट्रपति के अहं को तब चोट लगी जब गत नौ सितम्बर को  काबुल में एक आतंकवादी हमले में करीब 11 अफगानियों सहित एक अमेरिकी सैनिक भी मारा गया। तालिबान के गुर्गों को शायद इसका पता भी नहीं होगा कि वह जहां हमला करने जा रहा है वहां अमेरिकी सैनिक भी चपेट में आ सकते  हैं। तालिबान ने  अनगिनत  बार इससे बड़े हमले काबुल में किये हैं लेकिन तब अमेरिकी राष्ट्रपति के अहं को चोट नहीं पहुंची।

हैरान करने वाली बात तो यह है कि जो कैम्प डेविड गोपनीय शिखर वार्ताओं के लिये जाना जाता है वहां तालिबान जैसे कट्टरपंथी, आतंकवादी गुट के नेताओं को अमेरिका ने बुलाकर  जो इज्जत देने  जा रहा था  वह अमेरिका जैसी महाशक्ति को शोभा नहीं देता।  अमेरिका क्या इतना  लाचार हो गया है कि वह दुनिया की सबसे बड़ी ताकत होते हुए भी तालिबान जैसे आतंकवादी संगठन की चिरौरी करने पर तुला है और तालिबान उसे अपने पीछे- पीछे दौडा रहा है ? वास्तव में अमेरिका के पास राजनीतिक इच्छाशक्ति की भारी कमी उजागर हो रही है। कई अमेरिकी अधिकारियों की तरह राष्ट्रपति डोनाल्ड  ट्रम्प भी यही सोचते हैं कि अमेरिका ने अपनी राष्ट्रीय सीमाओं के लिये  किसी भी आतंकवादी घुसपैठ और हमलों से पूरी तरह सील कर दिया है। पिछले दो दशकों के दौरान निश्चय ही अमेरिकी धरती पर कोई बड़ा आतंकवादी हमला नहीं हुआ लेकिन अमेरिका इस गलतफहमी में है कि वह अब किसी आतंकवादी हमले का शिकार नहीं हो सकता।

अफगानिस्तान में कथित शांति के लिये जो छलावा अमेरिकी अगुवाई में हो रहा है वह काफी डरावने भविष्य की ओऱ इंगित करता है।  अफगान शांति वार्ता से पूरी तरह बाहर कर दिये गए  भारत भी यह कहने को मजबूर है कि  वह अफगानी अगुवाई वाले और अफगानी भागीदारी वाले किसी भी  समझौते को मानेगा जो अफगानिस्तान के संविधान को मानता हो। लेकिन तालिबान की मौलिक सोच तो अफगानी संविधान के प्रतिकुल ही है। वह तो तालिबान अमीरात स्थापित करना चाहता है जो पाकिस्तान और चीन के सामरिक हितों को आगे बढाने  को मजबूर होगा।

 अमेरिका तालिबान से गारंटी मांग रहा है कि  वह अलकायदा और इस्लामिक स्टेट जैसी ताकतों को अपने यहां फलने फूलने और पनपने नहीं देगा। तालिबान जरूर इस बात का भरोसा दिला रहा है कि वह  अपने यहां ऐसे लोगों को शरण नहीं देगा लेकिन इस बात की क्या गारंटी कि तालिबान भविष्य में अपने यहां फिर से अलकायदा को पनपने नहीं देगा। तालिबान के कंधे पर हाथ रख कर पाकिस्तान और चीन अमेरिका से अपनी दुश्मनी निकालने का कोई कसर नहीं छोडेंगे। तालिबान का हाथ पकड़कर पाकिस्तान और चीन अमेरिका को न केवल दक्षिण बल्कि पश्चिम और मध्य एशिया से बाहर करने की पूरी कोशिश करेंगे। साफ  है कि अमेरिका को एशिया के एक बड़े इलाके से खुद को बाहर करना होगा और तब दुनिया पर  दादागिरी अमेरिका की नहीं बल्कि चीन की चलेगी। अमेरिका अपनी सीमाओं तक की सिमट कर रह जाएगा।

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