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समर नीति: पाकिस्तान की मिनी पनडुब्बियां

चीनी पनडुब्बी
प्रतीकात्मक

एक ओर जहां भारत की पनडुब्बी क्षमता गिरती जा रही है वहीं भारत का मुख्य प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान अपनी प़नडुब्बी क्षमता को बढ़ाने की योजना पर गम्भीरता से कदम उठा रहा है जो  हिंद महासागर में भारतीय नौसेना के लिये चिंताजनक है।  पिछले पांच सालों में पाकिस्तान ने तुर्की और चीन से पनडुब्बियां आयात करने के लिये दो बडे सौदे किये हैं लेकिन इसके साथ ही पाकिस्तानी नौसेना द्वारा मिनी पनडुब्बियों को अपने बेडे में जोडने की योजना काफी चिंताजनक है। 150 टन  से कम वजन और करीब 60 फीट लम्बी  ये मिनी पनडुब्बियां मिडगेट पनडुब्बी के नाम से जानी जाती हैं औऱ पाकिस्तानी नौसेना इनके स्वदेशी विकास और उत्पादन की महत्वाकांक्षी योजना पर काम कर रही है।





पाकिस्तानी नौसेना ने 2015 में चीन को हैंगर ( य्वान वर्ग ) नाम की आठ पनडुब्बियों की सप्लाई का आर्डर  दिया था। इसके बाद तुर्की को भी अपने बेडे  में मौजूद अगोस्ता पनडुब्बियों के आधुनिकीकरण का एक सौदा किया था। चीन और तुर्की के साथ पनडुब्बी सौदे पाकिस्तानी नौसेना के लिये खेल का पासा पलटने वाले साबित होंगे । इसलिये कि भारतीय नौसेना को जिन छह नई पनडुब्बियों का आर्डर मिलने की प्रतीक्षा पिछले डेढ़ दशक से है वे कब फलदायक होंगी कहना मुश्किल है। फिलहाल भारतीय नौसेना के लिये छह स्कार्पीन पनडुब्बियों का  निर्माण फ्रांस के सहयोग से मुम्बई में हो रहा है जिसमें से दो की सप्लाई हो चुकी है लेकिन इसके अलावा छह और पनडुब्बियों के स्वदेशी निर्माण की योजना अधर में ही लटकी है। भारत का पनडुब्बी बेडा पुराना पडता जा रहा है। भारतीय नौसेना के पास फिलहाल रूसी किलो वर्ग की दस और चार जर्मन एचडीडब्ल्यू पनडुब्बियां ही हैं। एक स्वदेशी और रूसी परमाणु पनडुब्बी को मिलाकर भारतीय नौसेना की सेवा में कुल  16 पनडुब्बियां ही हैं। रूसी  और जर्मन पनडुब्बियां 25 से 30 साल पुरानी होने वाली हैं जिन्हें बदलने की जरुरत है।

दूसरी ओर पाकिस्तान ने  अपने पनडुब्बी बेडे को मजबूती प्रदान करने के लिये छोटी यानी मिनी पनडुबिब्यां प्रदान करने की सामरिक तौर पर अहम योजना को अंजाम देना शुरु किया है। ये पनडुब्बियां बीच सागर में मौजूद किसी भारतीय पोत या पनडुब्बी के लिये बडा खतरा पैदा कर सकती हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो ये पनडुब्बी समुद्र में  आतंक पैदा करने की क्षमता रखती हैं और पाकिस्तानी सेना में इनकी मौजूदगी भारतीय युद्धपोतों के लिये बडा खतरा साबित होंगी।

हालांकि पाकिस्तान की नौसेना का स्पेशल सर्विस ग्रुप 1990 के दशक  से ही कासमोस एमजी 110 मिनी पनडुब्बियों का इस्तेमाल कर रहा है लेकिन  अब जिन स्वदेशी मिडगेट पनडुब्बियों का उत्पादन पाकिस्तान खुद करेगा वह भारतीय नौसेना के लिये गहरी चिंता का विषय होगा। पाकिस्तान की रणनीति है कि वह भारत की  बडे आकार वाली परमाणु पनडुब्बियों से लोहा तो नहीं ले सकता इसलिये वे इन्हें बीच सागर में चुनौती देने के लिये अपनी मिनी पनडुब्बियों को तैनात रखेगा।

ऐसे दौर में जब चीन की नौसेना अपनी परमाणु पनडुब्बियों को  हिंद महासागर के इलाके में अक्सर विचरण करने भेज कर भारत को उसकी ताकत का संदेश दे रही है पाकिस्तान द्वारा भी अपनी पनडुब्बी क्षमता में लगातार बढोतरी करना विशेष चिंताजनक है। भारतीय नौसेना के लिये छह नई पनडुब्बियों को हासिल करने की प्रक्रिया पिछले साल ही गम्भीरता से शुरु हो गई थी लेकिन पिछले तीन माह से कोविड-19 महामारी की वजह से सरकारी कामकाज पूरी तरह ठप हो चुका है। इस वजह से भारतीय सेनाओं के आधुनिकीकरण पर भारी प्रतिकूल असर  पड रहा है। इसमें  विदेशी सहयोग से छह नई पनडुब्बियों के देश में ही निर्माण करने की योजना में देरी होने का अंदेशा है।  भारतीय रक्षा कर्णधारों को देखना होगा कि कोविड-19 की वजह से कहीं भारत की रक्षा तैयारी पर आंच नहीं आए।

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