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समर नीति: कोरिया का एक होना भारत के लिए लाभकारी होगा

उत्तर कोरिया के शासक किम जोंग उन और दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून जे-इन
फाइल फोटो

शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद जिस तरह पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी के एकीकरण से यूरोपीय इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ गया उसी तरह कोरियाई प्रायद्वीप में इतिहास का नया अध्याय लिखे जाने की प्रतीक्षा की जा रही है। हालांकि शीतयुद्ध के काल में ही उत्तर और दक्षिणी वियतनाम का एकीकरण हुआ क्योंकि वहां वियतनामी योद्धाओं और क्रांतिकारियों का अमेरिकी सेना मुकाबला नहीं कर सकी लेकिन कोरियाई प्रायद्वीप के जमीनी हालात भिन्न हैं। दक्षिण कोरिया की राजधानी सोल में कोरियाई पत्रकार संघ द्वारा आयोजित एक विश्व सम्मेलन वर्ल्ड जर्नलिस्ट्स कांफ्रेंस में भाग ले रहे सभी प्रतिभागियों ने दोनों कोरियाईयों के बीच जल्द से जल्द विलय होने की कामना जाहिर की। इस विषय पर कोरियाई राजनीति के प्रेक्षक गत तीन दशकों से, जब से जर्मनी एकीकरण हुआ, दोनों कोरिया के बीच एकीकरण की सम्भावनाओं पर चर्चा कर रहे हैं। इसके विभिन्न पहलुओं औऱ लाभ हानि पर सामरिक विशेषज्ञ गहन मंथन कर रहे हैं औऱ इस इरादे से दोनों कोरियाई देशों के राजनेताओं के बीच बातचीत करवाने की पहल भी की गई है। लेकिन सबसे अहम मसला है उत्तर कोरिया में आततायी कम्युनिस्ट तानाशाही के रहते हुए विलय कैसे हो। उत्तर कोरिया के तानाशाह राष्ट्पति किम जोंग उन कतई ऐसा नहीं चाहेंगे कि दोनों कोरियाई देश एक राजनीतिक व्यवस्था में रहें। तब उन्हें जनतांत्रिक शासन स्वीकार करना होगा औऱ उन्हें सत्ता का त्याग करना होगा।





दूसरी ओर उत्तर कोरिया के तानाशाह शासक की पीठ पर चीन का हाथ है जो उत्तर कोरिया को अमेरिका और जापान के खिलाफ एक हथकंडा के तौर पर इस्तेमाल करने की रणनीति पर चलते रहना चाहता है। चीनी कम्युनिस्ट कतई नहीं चाहेंगे कि उत्तर कोरिया में चीन का कठपुतली शासक सत्ता से बाहर हो जाए और उत्त्तर कोरिया का दक्षिण कोरिया में विलय हो जाए। इस तरह एकीकृत कोरियाई गणराज्य एक जनतांत्रिक देश के तौर पर उभरेगा औऱ एक बडी आर्थिक ताकत के तौर पर पूर्व एशिया में उसकी तूती बोलेगी, जो चीन के आर्थिक और सामरिक प्रतिद्वंद्वी के तौर पर ही देखा जाएगा। दक्षिण कोरिया पहले ही दुनिया में 11वीं बड़ी अर्थव्यवस्था के तौर पर उभर चुका है और जब उत्तर कोरिया भी दक्षिण कोरिया में मिल जाएगा तो शुरुआती कठिन राहों के बावजुद एकीकृत कोरियाई गणराज्य चीन के एक प्रतिद्वंद्वी पडोसी के तौर पर ही पेश किया जाएगा। चीन नहीं चाहेगा कि उसके द्वार पर एक प्रतिद्वंद्वी ताकत उभरे।

कोरियाई एकीकरण का भारत के लिये विशेष सामरिक महत्व है। दोनों कोरिया के एक हो जाने से पूर्व एशिया में सामरिक संतुलन हिंद प्रशांत के 4 देशों के गठजोड़ अमेरिका, भारत, जापान और आस्ट्रेलिया के पक्ष में काफी झुक जाएगा। दक्षिण कोरिया ने पहले ही इस चर्तुपक्षीय गठजोड के साथ सलाह मशविरा बैठक में भाग लेने के सेंकेत दिये हैं। दक्षिण कोरिया को अमेरिकी परमाणु संरक्षण मिला हुआ है और एकीकरण के बाद उसे चीन के खिलाफ अमेरिकी संरक्षण की और जरूरत होगी। इसलिये माना जा रहा है कि एकीकृत कोरिया प्रशांत सागर में चीन की सत्ता को चुनौती देने वाला साबित होगा।

प्रशांत सागर और हिंद महासागर को मिलाकर अमेरिका द्वारा पेश नये सामरिक सागरीय ढांचे हिंद प्रशांत में यदि कोरिया भी शामिल हुआ तो इससे दक्षिण चीन सागर में भारत की समर नीति को भारी ताकत मिलेगी। भारत औऱ कोरिया के बीच दो हजार साल पुराने ऐतिहासिक रिश्ते रहे हैं। दो हजार साल पहले अयोध्या की राजकुमारी ने कोरिया जा कर कोरियाई राजकुमार से विवाह किया था। कोरियाई लोग भारत के साथ इस प्राचीन रिश्ते को काफी भावनात्मक तरीके से याद करते हैं। हाल के सालों में भारत ने भी कोरिया के साथ सामरिक साझेदार के रिश्तो को काफी गहरा करने की कोशिश की है। दोनों ओर से हाल के सालों में कई शिखर मुलाकातें हुई हैं। भारत और कोरिया के बीच रक्षा और आर्थिक सम्बन्ध काफी गहरे हुए हैं और दोनों देश इसे नई गहराई देने के लिये तत्पर हैं। इसलिये माना जा रहा है कि जब दोनों कोरिया एक होकर और ताकतवर बन कर उभरेंगे तब कोरिया के साथ भारत की सामरिक साझेदारी के बल पर चीन को संतुलित करने में भारत को और कामयाबी मिलेगी।

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