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समर नीति: राजनयिक अखाड़े में भारत की जीत

संयुक्त राष्ट्र के राजनयिक अखाड़े में भारत ने जिस तरह ब्रिटेन को पटखनी दे कर अंतरराष्ट्रीय अदालत में जगह पाने का दंगल जीत लिया है वह भारत की विश्व रंगमंच पर बढ़ती ताकत और प्रतिष्ठा  का परिचायक है। इसने यह भी दिखा दिया है कि दुनिया का कोई भी ताकतवर देश अब भारत को नजरअंदाज कर अपनी गोटी नहीं खेल सकता। अंतरराष्ट्रीय न्यायिक अदालत (आईसीजे) में जज के निर्वाचन के लिये संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्यों में से 121 ने शुरुआती दौर में भारत के पक्ष में मत दिया था और सुरक्षा परिषद में 15 में से केवल छह सदस्यों ने भारत के पक्ष में वोट दिया लेकिन इस मतदान पर जब गोपनीयता का पर्दा हटा दिया गया तो 193 में से 183 देशों ने भारत के पक्ष में वोट दिया और सुरक्षा परिषद के 15 में से सभी सदस्यों ने भारतीय जज दलबीर भंडारी के पक्ष में अपना वोट दिया। यहां तक कि हर मसले पर भारत को नीचा दिखाने की रणनीति पर चलने वाला चीन भी सुरक्षा परिषद में वोटिंग के दौरान विरोध करता नहीं नजर आया। शुरू में अमेरिका ब्रिटेन के साथ था लेकिन जब यही वोटिंग खुले में करवाने का फैसला लिया गया तब अमेरिका ने भी ब्रिटेन का साथ इसलिये छोड़ दिया कि वह अपने सामरिक साझेदार भारत को नाराज नहीं करना चाहता था। ब्रिटेन ने सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता की आड़ में अपनी ताकत और वीटो पावर का रुतबा दिखाते हुए सदस्य देशों को साथ ले  लिया था लेकिन  अंतत: दुनिया की  सबसे ताकतवर संस्था 15 सदस्यों वाली सुरक्षा परिषद को भी भारत की ताकत के आगे नतमस्तक होना पड़ा।





आखिर क्यों विश्व समुदाय अंतरराष्ट्रीय अदालत में जज की नियुक्ति के मामले में भारत के साथ खड़़ा दिखा?  बात साफ है कि भारत न केवल अब एक क्षेत्रीय सैनिक ताकत बन चुका है बल्कि दो ट्रिलियन डॉलर वाली एक बड़ी आर्थिक ताकत बन चुका है जिसके विशाल उपभोक्ता बाजार से कोई वंचित नहीं होना चाहता है। विश्व मामलों में रचनात्मक भूमिका निभाने के लिये बड़े ताकतवर देश तो भारत की ओर आशावादी निगाहों से तो देख ही रहे हैं छोटे विकासशील देश भी भारत से काफी उम्मीदें लगाए बैठे हैं। उन्हें पता है कि छोटे देशों के लिये भारत का विकास सहायता माडल किस तरह उन्हें आत्मनिर्भर बनने में सक्षम बनाता है जबकि चीन का विकास माडल उस देश को कर्ज के जाल में फंसा देता है।

अंतरराष्ट्रीय न्यायिक अदालत में  अपने नामांकित जज दलवीर भंडारी को निर्वाचित करवाने में मिली अभूतपूर्व सफलता इस बात का भी परिचायक है कि वैश्विक मामलों के संचालन में भारत की अहम भागीदारी को विश्व समुदाय अब स्वीकार करने लगा है। इसके पहले 2008 में परमाणु तकनीक रखने वाले 45 देशों के संगठन न्युक्लियर सप्लायर्स ग्रुप (एनएसजी) द्वारा भारत पर से सभी प्रतिबंध हटवाने के लिये अमेरिका की मदद से भारत को एड़ी-चोटी एक कर जब कामयाबी मिली थी तब एक जिम्मेदार परमाणु ताकत के तौर पर भारत को मान्यता दी गई थी। करीब नौ सालों बाद अंतरराष्ट्रीय राजनयिक हलकों में भारत को लेकर इसलिये इतना बड़ा दंगल हुआ कि भारत की उभरती ताकत से जलने वाले  कई देश भारत को दुनिया के हाई टेबल पर बैठना नहीं देखना चाहते हैं। लेकिन इस टेबल पर बैठना पाकिस्तान और चीन को नहीं सुहाएगा जो विश्व रंगमंच पर भारत के उदय में लंगड़ी मारने में कोई कसर नहीं छोड़ते।

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