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समर नीति:  भारत की K- 4 समुद्री मिसाइल

K- 4 समुद्री मिसाइल
फाइल फोटो

गणतंत्र दिवस





भारत अपनी त्रिआयामी परमाणु क्षमता को लगातार मजबूत करता जा रहा है। न्युक्लियर ट्रायड यानी त्रिआयामी परमाणु क्षमता हासिल करने का लक्ष्य साल 1998 में पोकरण परमाणु परीक्षणों के बाद तय किया गया था और अब दो दशक बाद भारत का वह सपना पूरा हो चुका है। दुश्मन के परमाणु हमले की बंदरघुडकियों का जवाब देने के लिये हालांकि भारत के पास सेकंड स्ट्राइक कैपैबिलीटी यानी जवाबी परमाणु हमला की क्षमता  वैसे तो जमीनी और वैमानिकी संसाधनों से पहले ही हासिल हो चुकी है और केवल समुद्र के भीतर से परमाणु मिसाइल छोडने की क्षमता हासिल करना शेष रह गया था।

त्रिआयामी परमाणु क्षमता हासिल करने की अहमियत इसी में है कि भारत जल-थल और आसमान कहीं से भी दुश्मन पर परमाणु हथियार गिराने की क्षमता हासिल कर ले। इसके  पीछे सोच यह है कि यदि दुश्मन अपने परमाणु हमले से भारत के जमीनी परमाणु संसाधनों को नष्ट करने के साथ ही भारत के राजनीतिक नेतृत्व को ही नष्ट कर दे तो  समुद्री पनडुब्बियो में छिपाकर तैनात की गई परमाणु मिसाइलें स्वतः ही सक्रिय हो जाएं और दुश्मन पर मुंहतोड हमला कर दें।

जमीनी क्षमता के लिये भारत ने कुछ साल पहले ही पांच हजार किलोमीटर तक मार करने वाली परमाणु बैलिस्टिक मिसाइलों का विकास कर तैनात कर दिया है और हवाई क्षमता के लिये सुखोई-30 एमकेआई और मिराज- 2000 लडाकू विमानों से परमाणु बम गिराने की सुविधा हासिल हो चुकी है।  अब केवल समुद्री लांच क्षमता हासिल करना शेष रह गया था। भारतीय मिसाइल वैज्ञानिकों ने गत 19 जनवरी को  विशाखापतनम के नौसैनिक अड्डे के  समुद्री इलाके  में के-4 मिसाइल का परीक्षण किया तो यह तीसरा आयाम भी हासिल कर लिया गया।

 पनडुब्बी के अंदर से कोई बैलिस्टिक मिसाइल छोडने की क्षमता हासिल करने की कोशिशें पिछले दो दशक से चल रही हैं। इसके तहत पहली बार 2011 में के-15 नाम की पनडुब्बी से छोडे जाने वाली बैलिस्टिक मिसाइल का विकास पहले चरण के तहत किया गया लेकिन चूंकि इसकी मारक दूरी महज 750 किलोमीटर ही थी इसलिये इसकी सामरिक अहमियत कुछ कम थी। अब जबकि के-4 मिसाइल की मारक दूरी  35 सौ किलोमीटर होगी इसलिये इस मिसाइल की बदौलत भारतीय नौसेना दुश्मन के समुद्री इलाके से काफी दूर परमाणु पनडुब्बी में छिपा कर रख सकती है।

 भारत ने अऱिहंत परमाणु पनडुब्बी को दो साल पहले ही अपने नौसैनिक बेड़े में तैनात कर दिया है।  इस पनडुब्बी से के-15 और के-4 मिसाइलों को छोडा जा सकता है।  परमाणु पनडुब्बी की खासियत यह है कि यह महीनों तक समुद्र के भीतर छुपी रह सकती है। यदि यह पनडुब्बी दुश्मन के समुद्री इलाके से कुछ दूर बैठी हो तो दुश्मन को इसका पता भी नहीं चलेगा। इसलिये इस पनडुब्बी को स्वदेशी विकास कर भारत ने दुनिया को यह संदेश दिया है कि भारत किसी भी देश पर पहला परमाणु हमला करने वाला देश नहीं होगा लेकिन भारत पर यदि परमाणु हमला होता है तो  वह दुश्मन के इलाके पर उसी वक्त जवाबी हमला करने के लिये हमेशा तैयार रहेगा।  परमाणु हथियार हासिल करने के पीछे दुश्मन को तहस नहस करना नहीं बल्कि दुश्मन को आगाह करना है कि यदि भारत पर परमाणु हमला हुआ तो भारत बिना सोच विचार के जवाबी हमला दुश्मन देश पर कर देगा। दुश्मन में परमाणु खौफ पैदा करने के लिये इस तरह की क्षमता इसलिये हासिल करना जरुरी है कि   परमाणु हथियारों की कटौती के लिये अंतरराष्ट्रीय संधियां टूटती जा रही हैं और अमेरिका,चीन और रुस के बीच परमाणु हथियारों को जमा करने की नई होड़ शुरु हो चुकी है। भारत इस होड में पीछे नहीं रह सकता। इसलिये भारत के परमाणु बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम की अहमियत बढ़ जाती है।

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