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समर नीति: भारत की दुविधा- क्या युद्ध ही विकल्प है

युद्धाभ्यास के दौरान टैंक
फाइल फोटो

तीन महीने से अधिक तक पूर्वी लद्दाख के इलाके में अतिक्रमण कर बैठे रहने के बाद कुछ जगहों से चीन ने अपनी सेना पीछे हटा ली है लेकिन जिस तरह पैंगोंग त्सो झील के इलाके में चीन डटा हुआ है औऱ वहां से पीछे  नहीं हटने पर अडा हुआ है वह अंतरराष्ट्रीय समुदाय को विस्मय में डाल रहा है। चीन के इस विस्तारवादी अडियल रवैये की  अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो औऱ आस्ट्रेलिया के भारत में उच्चायुक्त ने तीखी आलोचना जिस तरह की है उससे साफ होता है कि  अंतरराष्ट्रीय समुदाय चीन  को दूसरों की जमीन कब्जा करने वाले देश के तौर पर देख रहा है।





 अमेरिकी विदेश मंत्री ने भारत के इस रवैये की सराहना की है कि चीन के  आक्रामक रुख के  आगे झुका नहीं है और चीन  की चुनौतियों को स्वीकार कर रहा है । अंतरराष्ट्रीय समुदाय देख रहा है कि यदि आज भारत चीन के रवैये के आगे झुक जाता है तो चीन का मनोबल काफी बढेगा और वह दुनिया में बाकी देशों के साथ भी ऐसा ही करेगा। चीन  ने जब देखा कि दक्षिण चीन सागर के इलाके में निर्जन द्वीपों  पर अपना कब्जा जमा लिया और विश्व की बडी सैन्य ताकतें मुंह ताकते रह गईं तो उसका मनोबल और बढा और उसने दक्षिण चीन सागर के इलाकों में कुछ कृत्रिम द्वीप भी बना लिये जहां  उसने  मिसाइल प्रणालियां तैनात कर दी हैं।  इन कृत्रिम द्वीपों के आधार पर वह दक्षिण चीन सागर में अपने दावे का विस्तार भी कर रहा है। इसी तरह चीन पूर्वी लद्दाख के इलाकों में  घुसपैठ कर बैठ गया और इन इलाकों को लेकर भारत के सामने समझौता  प्रस्ताव रख रहा है कि चार इलाकों गलवान घाटी., गोगरा  हाट स्प्रिंग , देपसांग और पैंगोग त्त्सो झील में से तीन पर अपना कब्जा छोड देगा और पैंगोग त्सो झील के फिंगर-चार से फिंगर-8 तक के आठ किलोमीटर तक के इलाकों को नहीं छोडेगा। चीन लेनदेन की बात कर रहा है और समझौते के तहत बीच का रास्ता अपनाने की बात कर रहा है। उसका तर्क  है कि वह चार में से तीन इलाकों को छोड कर भारत को बडी रियायत दे रहा है।

 चीन के इस अडियल रुख के सामने भारत की दुविधा बढ गई है कि भारत चीन पर किस तरह का दबाव डाले कि वह  वास्तविक नियंत्रण रेखा के पार अतिक्रमण वाले इलाकों को छोड़ दे। भारत ने चीन के खिलाफ आर्थिक और सैन्य  दोनों क्षेत्रों पर दबाव बनाए हैं लेकिन चीन दो कदम आगे एक कदम पीछे चलने की चिरपरिचित रणनीति के अनुरुप भारत के साथ पेश आ रहा है। पैंगोंग त्सो झील की फिंगर-4 से फिंगर-8 तक की चोटियों पर गहरी रणनीतिक सोच के तहत कब्जा जमाया है और यही वजह है कि वहां से पीछे न हटने के  लिये  चीनी सेना ने वहां अपने सैनिकों को तैनात रखने के लिये पक्का ढांचागत सैन्य निर्माण किये हैं। भारत यह संकेत दे रहा है कि चीन की सेना पीछे नहीं हटेगी तो वह सैन्य कार्रवाई कर पीछे तो नहीं धकेलेगा बल्कि फिंगर-4 चोटी के नीचे के इलाकों पर अपने 35 हजार से भी  अधिक सैनिकों को तोपों और टैंकों के साथ  तैनात कर देगा।

लेकिन चीनी सेना के लिये यह स्थिति अनुकूल बनती है। उस   दुर्गम ठंढे पर्वतीय  इलाके में  भारतीय सेना यदि अपने सैनिक तैनात रखता है तो उसके रखरखाव पर भारतीय सेना को भारी खर्च करना होगा। इससे भारतीय सेना परेशानी में पडेगी। चीनी सेना को भारतीय सेना का दर्द देख कर  सुकून महसूस होगा। क्योंकि भारतीय सेना के वहां तैनात रहने से चीन की रणनीतिक स्थिति में कोई फर्क नहीं होगा। चीनी सेना का मानना है कि भारतीय सेना उस दुर्गम इलाके में रहने की दिक्कतों से परेशान हो कर खुद ही पीछे हट जाएगी। लेकिन चीन को ऐसा अहसास नहीं देना होगा। भारतीय सेना को यह संदेश देना होगा कि वह चीन की सैन्य चुनौती का मुकाबला करने को तैयार है।

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