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समर नीति: परोपकारी भूमिका में भारतीय नौसेना

भारतीय नौसेना का युद्धपोत
फाइल फोटो

मानवीय सहायता की अपनी परम्परा निभाने के क्रम में भारतीय नौसेना ने गत 29 जनवरी को अपने नाम एक औऱ परोपकार जोड़ लिया जब दक्षिण हिंद महासागर के द्वीप देश मेडागास्कर में आए भीषण तूफान के बाद राहत व बचाव के लिये मेडागास्कर के आग्रह पर भारत ने अपना एक युद्धपोत वहां रवाना कर दिया। वैसे तो भारतीय नौसेना पिछली सदी से ही हिंद महासागर के तटीय देशों को प्राकृतिक आपदा के दौरान मदद को हमेशा तत्पर रही है लेकिन साल 2004 के दौरान जब भारत सहित कई द्वीप देशों में भीषण समुद्री भूकम्प सूनामी आया और अपने द्वीपीय इलाका अंडमान एवं निकोबार भी इसकी चपेट में आने के बावजूद भारतीय नौसेना ने न केवल अपने अंडमानी नागरिकों को संकट से बचाया बल्कि श्रीलंका, मालदीव से लेकर दक्षिण पूर्व एशिया के देशों को राहत पहुंचा कर दुनिया में एक परोपकारी नौसेना के तौर पर अपना झंडा गाड़ा। आम तौर पर नौसेनाएं केवल अपने सुरक्षा हितों के संवर्द्धऩ में ही समुद्री विचरण करती हैं लेकिन भारतीय नौसेना ने राहत व बचाव कार्यों में दूरदराज के छोटे देशों को मदद पहुंचा कर बाकी दुनिया के लिये एक नई मिसाल कायम की है।





कम संसाधन वाले छोटे द्वीप देशों को मदद पहुंचा कर भारत ने यह दिखाया है कि राष्ट्रीय सुरक्षा हितों के साथ मानवीय संकट के दौरान राहत व मदद पहुंचाना एक बड़ी जिम्मेदारी है जिसे बड़े राष्ट्रों को निभाना चाहिये। मानवीय मदद के अलावा समुद्री डाकुओं से रक्षा करने , मादक द्रव्यों और मानव तस्करी को रोकने , आव्रजन को नियंत्रित करने , आतंकवादी गतिविधियों के खिलाफ कार्रवाई करने आदि के क्षेत्रों में हिंद महासागर के इलाके में भारतीय नौसेना अपनी वांछित भूमिका निभाती रही है। किसी भी सभ्य सोच वाले देश से यही उम्मीद की जाती है कि वह एक समुद्री पुलिस की रचनात्मक भूमिका निभाए ताकि महासागरों में विश्व कानून का शासन हो।

साल 2004 के सूनामी के बाद भारतीय नौसेना ने अफ्रीका के तटीय देशों को अक्सर अपनी राहत नीति से मदद दी है और उनका दिल जीता है लेकिन इसके बावजूद चीन जैसे देश अपनी सैन्य ताकत और चेकबुक कूटनीति के जरिये इन देशों के शासकों को प्रभावित करने में कामयाब हो जाते हैं और मानवीय सहायता करने वाले देश मुंह देखते रह जाते हैं। हिंद महासागर के द्वीप देश सेशल्स के साथ कुछ ऐसा ही हो रहा है। वहां के एजम्शन द्वीप पर भारत ने नौसैनिक पड़ाव की सुविधा हासिल करने की बात की और सहमति होने के बाद भी सेशल्स की सरकार इस द्वीप को भारत को सौंपने से इसलिये हिचकिचा रही है कि वहां के विपक्षी दल चीन के प्रभाव में अधिक बताए जाते हैं जो भारत को एजम्शन द्वीप सौपने का विरोध कर रहे है। 80,000 की आबादी वाले सेशल्स को भारत ने एक देश के तौर पर खडा होने में मदद दी है लेकिन जब चीन की नजर सेशल्स की सामरिक अहमियत पर पड़ी तो चीन सेशल्स के राजनीतिज्ञों पर अपनी छाप छोड़ने में कामयाब हो गया लगता है।

इसी तरह मालदीव साल 2012 के बाद से चीन के प्रभुत्व में इसलिये चला गया कि चीन ने मालदीव के नेताओं को सत्ता में बने रहने के लिये कई तरह की मदद दी। भारत के लिये राहत की बात यह है कि वहां जनतांत्रिक चुनावों के बाद वहां की नई सरकार अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरुप नीतियां अपना रही है जिससे मालदीव व भारत के रिश्ते फिर पटरी पर आ गए हैं। गौरतलब है कि मालदीव के हर मानवीय संकट के वक्त भारत ने उसे मदद पहुंचाई है।

हिंद महासागर में भारत की परोपकारी गतिविधियों के बावजूद चीन इस इलाके के देशों पर हावी हो जाता है। भारत को इससे सबक लेना होगा औऱ अपने परोपकारी कार्यों के साथ वे तरीके भी अपनाने होंगे जिनकी वजह से चीन किसी द्वीप देश पर अपना प्रभुत्व बनाने में कामयाब हो जाता है।

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