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समर नीति: मालदीव में भारत की वापसी होगी ?

Maldives

सितम्बर के तीसरे सप्ताह में मालदीव में सम्पन्न ससदीय चुनाव के नतीजे चौंकाने वाले  हैं और भारतीय सामरिक हलकों में राहत ले कर आए हैं।  मालदीव से भारत के पांव लगभग उख़ड चुके थे लेकिन अब यह मान कर चलना कि वहां भारत की  प्रभावी वापसी होगी जल्दबाजी होगी। छह साल तक निरंकुश  शासन करने के बाद मालदीव के तानाशाह राष्ट्रपति  अब्दुल्ला यामीन ने चुनावों के पहले जिस हद तक राजनीतिक लोगों और मीडिया के अलावा न्यायपालिका पर शिकंजा कस लिया था उससे किसी को यह भरोसा नहीं था कि मालदीव के लोगों की आवाज दुनिया सुन सकेगी।  भारत हताश हो चुका था क्योंकि वह 1988  में आपरेशन कैक्टस  की तरह मालदीव के वैध शासकों ( राष्टपति गयूम ) की मदद के लिये कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता था और भारत की नजरों के सामने मालदीव चीन को अपना सबकुछ सौंपने लगा था। वास्तव में भारत के अंगने में चीन की तांकझांक इतनी बढ़ गई थी कि मालदीव के शासक अपनी सम्प्रभुता  को ताख  पर रख कर सभी कुछ गिरवी रखते जा रहे  थे। मालदीव के शासक  अपनी  राष्ट्रीय अस्मिता से खिलवाड़ करने लगे थे।





लेकिन मालदीव के लोग सब कुछ देखते हुए  लाचार थे। आखिर राष्ट्रपति यामीन ने न केवल पूर्वराष्ट्रपति नशीद, पूर्व राष्ट्रपति और अपने  सौतेले भाई मौमून गयूम ,  न्यायधीशों और अन्य हस्तियों को जेल में कैद या देश निर्वासन दे रखा था बल्कि मालदीव  के आम लोगों पर  जर्बदस्त पुलिस आतंक कायम कर दिया था। लेकिन जिस तरह भारी बहुमत से मालदीव के लोगों ने राष्ट्रपति यामीन को नकार दिया उससे साफ है कि उनके मन में यामीन के प्रति कितना गुस्सा पैदा हो गया था।

राष्ट्रपति यामीन चाहते तो चुनाव नहीं भी करवा सकते थे और सत्ता में बने रह सकते थे इसलिये उन्हें अब अपने फैसले पर पछतावा हो रहा होगा।

छह साल के अपने तानाशाही शासन में मालदीव के राष्ट्रपति यामीन ने एक एक कर बड़े ढांचागत प्रोजेक्ट चीन को देने शुरु किये जिससे मालदीव के कुल विदेशी कर्ज का 70 प्रतिशत से अधिक चीनी बैंकों पर चढ़ गया।  अब मालदीव की नई सरकार के लिये इस कर्ज की भरपाई इतनी मुश्किल होगी कि वह चीन के शिकंजे से आसानी से नहीं निकल सकेगा। इसलिये मालदीव के शासक चाह कर भी चीन से जल्द छुटकारा नहीं पा सकते। यही वजह है कि मालदीव की पूर्व विदेश मंत्री दुनिया मौमून ने टिप्पणी की है कि मालदीव को भारत और चीन में संतुलन पैदा करना होगा।

भारत के समुद्री इलाके में केरल के समुद्र तट से महज पांच सौ किलोमीटर दूर मालदीव द्वीप समहू भारत का समुद्री पड़ोसी है जिसके लोगों के कल्याण के लिये भारत दशकों से दिल खोल कर मदद करता रहा है।   लेकिन मालदीव की सामरिक अहमियत को देखते हुए चीन मालदीव के तानाशाह शासक को अपने धनबल से प्रभावित करने के लिये कोई कसर बाकी नहीं छोड़ रहा था।   इसलिये स्वाभाविक था कि मालदीव के शासक सत्ता पर अपनी पकड़़ मजबूत बनाने के लिये  चीन से सांठगांठ करते और अपनी कुर्सी बचाने के लिये चीन के आगे अपने देश का सबकुछ न्योछावर करने लगते।

मालदीव के लोगों  और वहां की नई सरकार के लिये अब यह सुनहरा मौका है कि  भारत की मदद ले कर धीरे धीरे चीन के असर को कम करते जाए । भारत को भी मालदीव में अपने पत्ते चालाकी से खेलने होंगे।  सउदी अरब और पाकिस्तान  की  वजह से मालदीव पर चूंकि इस्लामी प्रभाव  काफी बढ़ चुका है इसलिये वहां के लोग  भारत को अब शक की नजरों से देखने लगे हैं। ऐसे में  भारत को मालदीव में अपने कदम फूंक फूंक कर रखने होंगे।

 

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