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समर नीति: हथियारों की दुनिया में भारत

इजराइली एंटी टैंक मिसाइल
फाइल फोटो

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि कोई भी  देश अपनी सेनाओं की जरुरतों को पूरा करने के लिये शतप्रतिशत अपने घरेलू उद्योग पर निर्भर नहीं रह सकता लेकिन हम इतना लक्ष्य अपने देश के लिये जरुर तय कर सकते हैं कि रक्षा साज सामान के मामलों में हमारा देश अधिकतम स्तर तक दूसरे देशों का मोहताज नहीं रहे।  यह अधिकतम स्तर कितना हो उस देश की तकनीकी और औद्योगिक क्षमता पर निर्भर करता है। निस्संदेह भारत के पास यह क्षमता है। लेकिन हमारी अबतक की नीतियां इसे हासिल करने में अडंगा बन रही थीं। यदि सही माहौल दिया जाए तो हथियारो की दुनिया में भारत लम्बी छलांग लगा सकता है।





मौजूदा सरकार की कोशिश है कि इन अडचनों को दूर किया जाए और इसी इरादे से रक्षा मंत्रालय ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आत्मनिर्भर भारत के मिशन में अपना योगदान करने के लिये भारतीय सेनाओं के लिये यह जरूरी कर दिया है  कि कुछ खास किस्म के हथियारों को वे स्वदेशी रक्षा कम्पनियों से ही हासिल कर सकेंगी।  इसके साथ ही स्वदेशी हथियार कम्पनियों के लिये कई नये नीतिगत बदलाव किये हैं जिससे उनके लिये हथियारों का उत्पादन कर उन्हें भारतीय सेनाओं की जरुरतों का पूरा करना सुविधाजनक होगा।

गत 09 अगस्त को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एक विशेष घोषणा में ऐसे 101 हथियारों की सूची पेश की जिनका आयात एक खास अवधि के बाद नहीं किया जा सकेगा। यानी मजबूरन भारतीय सेनाओं को उन्हें स्वदेशी कम्पनियों से ही हासिल करना होगा। रक्षा मंत्री ने अनुमान के आधार पर बताया कि   अगले पांच से सात सालों के भीतर भारतीय सेनाएं चार लाख करोड़ रुपये के साजसामान का आर्डर स्वदेशी कम्पनियों को ही दे सकेंगी।  स्वाभाविक है कि इतनी भारी लागत के सैनिक साज सामान जब देश में  ही उत्पादित होंगे तो इससे भारतीय अर्थव्यवस्था का विस्तार होगा और देश में रोजगार के नये अवसर पैदा होंगे।

जिन 101 हथियारों की सूची पेश की गई है उनमें न केवल हथियारों के सामान्य कलपुर्जे हैं बल्कि तोपें,एसाल्ट राइफलें, कार्वेट ,सोनार सिस्टम्स , परिवहन विमान,  लाइट कम्बैट एयरक्राफ्ट , लाइट कम्बैट हेलीकाप्टर , रेडार जैसी कई उच्च तकनीक वाली शस्त्र प्रणालियां शामिल हैं। इस सूची में पहिये वाले बख्तरबंद लडाकू वाहन  भी शामिल है जिसे थलसेना करीब  पांच हजार करोड़ रुपये की लागत से आर्डर दे सकती है। इसके अलावा नौसेना देश में ही छह  पनडुब्बियां बनाने का आर्डर देने जा  रही है जिन पर करीब 42 हजार करोड रुपये निवेश कर सकती है।
आयात पर रोक के आदेश 2020 से 2024 के बीच लागू किये जाएगे तब तक भारतीय रक्षा उद्योग इनकी सप्लाई  करने की स्थिति में आ जाएं और भारतीय सेनाओं की समाघात जरुरतों से कोई समझौता भी नहीं हो। इसके लिये रक्षा मंत्रालय ने व्यवसाय करना आसान बनाने  के नये नियम जारी किये हैं और आगे भी जरुरत के मुताबिक जारी होते रहेंगे।  इसके अलावा रक्षा मंत्रालय में नवगठित सैन्य मामलों का विभाग और भी हथियारों की सुची देशी उद्योगों की क्षमता के अनुरुप जारी करता रहेगा।  साफ है कि रक्षा मंत्रालय इस बात के लिये प्रतिबद्ध है कि वह भारतीय सेनाओं को देश में बने सैनिक साज सामान हासिल करने के लिये बाध्य करता रहेगा ताकि भारत का रक्षा उद्योग  न केवल भारतीय सेनाओं को जरूरी सैनिक साज सामान की सप्लाई करने में सक्षम हो बल्कि बाकी देशों को निर्यात का एक गढ़ भी बन सके।

भारतीय रक्षा उद्योग  में अब तक केवल सरकारी कम्पनियों की भागीदारी रही है औऱ प्राइवेट उद्योगों को रक्षा मंत्रालय के गलियारों में फटकने नहीं दिया जाता  रहा है लेकिन अब पिछले कुछ सालों से यह माहौल बदला है और प्राइवेट उद्योगों को भी सेनाओं को विभिन्न किस्म की शस्त्र प्रणालियों की सप्लाई का समान अवसर देने की नीति  घोषित हो चुकी है। उम्मीद की जाती है कि रक्षा मंत्रालय  द्वारा   प्राइवेट उद्योगों को बढावा देने की नई नीति से भारत के स्वदेशी रक्षा उद्योग  में चार चांद लगेगा।

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