vishesh

समर नीति: विलुप्त होती हथियार संधियां

मेरिका औऱ सोवियत संघ के बीच शीतयुद्ध

पचास से अस्सी के दशक के दौरान अमेरिका औऱ सोवियत संघ के बीच शीतयुद्ध जब अपने चरम पर  पहुंचा तब दोनों प्रतिदंवद्वी महाशक्तियों ने  हजारों की संख्या में कई तरह के जनसंहार के हथियार बनाए और एक दूसरे की ओर निशाना कर तैनात करने लगे। पर दोनों महाशक्तियों को इस  बात की चिंता भी सताने लगी कि यदि दोनों में से एक ने गलती से दुसरे की किसी हरकत को यह समझ लिया कि उस पर कोई बड़ा हमला होने वाला है तो वह आत्मरक्षात्मक कदम के तौर पर दुश्मन पर कोई बड़ा हमला कर सकता है। यदि ऐसा हुआ तो दोनों महाशक्तियों एक दूसरे पर ताबडतोड़  मिसाइलों की बौछार करने लग सकती हैं। इस स्थिति से बचने के  लिये दोनों महाशक्तियों ने सद्बुद्धि दिखाते हुए  परस्पर भरोसा पैदा करने वाली संधिया की जिससे शीतयुद्ध के दौरान हथियारों का संतुलन बना रहा।





हथियारों औऱ सैनिकों की तैनाती कम करने के लिये 1988 में सोवियत संघ के तत्कालीन राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचौफ ने न्यूयार्क में  ऐलान किया था कि  उनका देश पूर्वी यूरोप से अपने पांच लाख सैनिकों को वापस बुला लेगा।  सात दिसम्बर, 1988  को किये गए इस ऐलान का दिन ही शीतयुद्ध की समाप्ति की शुरुआत का साल कहा जाने लगा था। शीतयुद्ध के दौरान 1972  में  सोवियत संघ औऱ अमेरिका के बीच  एंटी बैलिस्टिक मिसाइल  ट्रीटी(एबीएम), 1987 में इंटरमीडियट रेंज न्यूक्लियर फोर्सेज ट्रीटी ( आईएनएफ )  और इसी दशक में सामरिक अस्त्र परिसीमन वार्ता संधि ( स्टार्ट ) सम्पन्न हुई।  इन सभी हथियार रोक संधियों का अब अस्तित्व नहीं रहा। क्योंकि सभी देश धड़ल्ले से इसकी भावनाओं का हनन कर रहे हैं।

तब विश्व राजनीति दो ध्रुवों में बंटी हुई थी इसलिये दोनों ताकतें आपस में बातें कर सकती थीं। हालांकि दोनों के बीच अपनी विचारधारा के अनुरूप साथी देशों को अपने गुट में बनाए रखने की जबर्दस्त होड़ रहती  थी। आज जब कि एक महाशक्ति के तौर पर सोवियत संघ की मान्यता समाप्त हो गई है लेकिन चीन उसकी जगह लेने की होड़ कर रहा है। आज दोनों महाशक्तियों के  साथ कई क्षेत्रीय ताकतें उभरने लगी हैं जिनमें चीन सबसे बडी ताकत बनने की रणनीति पर चलने लगा है। उसने दक्षिण चीन सागर के इलाके पर अपना दावा ठोंक कर न केवल अमेरिका बल्कि जापान,  भारत , आस्ट्रेलिया आदि देशों के लिये एक बडी चुनौती पेश की है इसलिये चीन को इस इलाके पर दादागिरी दिखाने से रोकने के लिये भारत, जापान , आस्ट्रेलिया औऱ  अमेरिका चीन के खिलाफ लामबंद होने लगे हैं। इसलिये इसकी जवाबी तैयारी के तौर पर चीन ने दक्षिण चीन सागर के इलाके में अपनी मिसाइलों की तैनाती बढा दी है।

न केवल दक्षिण चीन सागर बल्कि चीन ने उन सभी इलाकों जैसे तिब्बत, थाइवान आदि में  अपनी फौज और हथियार तैनाती में उल्लेखनीय इजाफा करना शुरू कर दिया है। चूंकि चीन की इस सैन्य तैनाती का सीधा असर भारत पर पड़ता है इसलिये भारत ने भी तिब्बत से लगे इलाके में  मिसाइलों, लड़ाकू विमानों आदि की तैनाती बढ़ानी शुरू कर दी है।

चीन द्वारा  अपने इर्दगिर्द हथियारों की तैनाती बढाते जाने से अमेरिका चौकस हो गया है औऱ इसलिये उसने  क्षेत्र के देशों को अत्याधुनिक  शस्त्र प्रणालियों की सप्लाई बढ़ा दी है। अमेरिका की शिकायत है कि आज के दौर में हथियार संधियों को इसलिये व्यवहार में नहीं लाया जा सकता कि  चीन  शस्त्र परिसीमन वार्ता में शामिल होने को तैयार नहीं। आज भले ही शीतयुद्ध का दौर नहीं है लेकिन जिस तरह अमेरिका-चीन, चीन-भारत, चीन-जापान  और खाड़ी में इजराइल- ईरान व सऊदी अरब आदि के बीच जो होड़ चल रही है उससे सभी देश एक दूसरे को शंका की निगाह से देखने लगे हैं। ऐसे माहौल में  हथियारों की तैनाती औऱ विकास की होड़ का तेज होना स्वाभाविक लेकिन दुखद है।

Comments

Most Popular

To Top