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समर नीति: कोरोना की चपेट में अब परमाणु अड्डे

परमाणु बिजली संयंत्र
फाइल फोटो

कोरोना वायरस ने जहां पूरे विश्व में आम जनता के बीच कहर ढाया हुआ है वहीं इससे भी बडा खतरा सैन्य परमाणु अड्डों पर कोरोना का हमला करने से पैदा हो रहा है। वास्तव में अदृश्य कोरोना बड़े बड़े परमाणु अड्डों से अधिक खतरनाक लगने लगा है। कोरोना महामारी की वजह से जनजीवन पूरी तरह अस्तव्यस्त हो चुका है लेकिन बड़े ताकतवर देशों के राजनीतिक नेतृत्व को सबसे बडी चिंता सताने लगी है कि सैन्य परमाणु अड्डों को किस तरह कोरोना के हमले से बचाया जाए। चिंता है कि सैन्य परमाणु अड्डों के संचालकों को कोरोना वायरस नहीं जकड़े । जिस तरह अमेरिकी परमाणु विमानवाहक पोत रूजवेल्ट पर 200 से अधिक नौसैनिकों को कोरोना ने डस लिया था और इससे अमेरिकी सैन्य नेतृत्व में हडकम्प मचा वह यह दर्शाता है कि कोरोना कितना बडा खतरा पैदा कर सकता है। न केवल रुजवेल्ट पोत बल्कि इस आशय की रिपोर्टें भी हैं कि अमेरिका के 11 में से 04 और विमानवाहक पोतों पर कोरोना वायरस ने अपने अड्डे जमा लिये हैं। न केवल अमेरिका बल्कि फ्रांस के परमाणु विमानवाहक पोत ‘चार्ल्स द गाल’ पर भी नौसैनिकों के कोरोना से पीड़ित होने की रिपोर्ट आई तो न केवल परमाणु हथियारों का भंडार रखने वाले देशों बल्कि नागरिक परमाणु केनद्रों के संचालकों को भी चिंता सताने लगी है कि उनके उच्च कोटि के विशेषज्ञों को कोरोना यदि डस लेगा तो कौन उन परमाणु केन्द्रों का संचालन करेगा।





अमेरिका के अग्रणी परमाणु विशेषज्ञ हैंस क्रिसटेंशेंन ने हाल में अपने ट्वीट में यह बडा खुलासा किया है कि अमेरिका के एक को छोड़कर सभी परमाणु अड्डों पर कोरोना ने पांव फैला लिये हैं और उन विशेषज्ञ इंजीनियरों और तकनीशियनों को डस लिया है जो इन परमाणु अड्डों का प्रबंध कर रहे हैं। हालांकि अमेरिकी परमाणु केन्द्रों से जुड़े आला अधिकारी यह जरूर आश्वस्त कर रहे हैं कि किसी भी आपात स्थिति में उनके परमाणु अड्डे किसी भी परमाणु हमले का जवाब देने के लिये हमेशा चौकस अवस्था में हैं लेकिन सामरिक विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल कहने की बात है।

अमेरिकी विशेषज्ञों का कहना है कि यदि कोरोना से परमाणु अड्डे पंगु नहीं हुए हैं तो यह केवल वक्त की बात है। कुछ देश कोरोना खतरे के प्रति सचेत हैं औऱ अतिरिक्त सावधानी और एहतियाती कदम उठाने लगे हैं। देशों को चिंता है कि परमाणु अड्डों को कोरोना ने ग्रसित कर लिया तो इससे परमाणु असंतुलन पैदा होगा जो विश्व शांति और सुरक्षा के लिये ठीक नहीं होगा। दूसरे विश्व युद्ध के बाद बडी महाशक्तियों के बीच यह अघोषित समझ थी कि दोनों के पास इतना परमाणु संसाधन है कि किसी आपसी टकराव में दोनों एक दूसरे को तबाह कर सकते हैं। लेकिन शीतयुद्ध के बाद दोनों महाशक्तियों में अब चीन एक तीसरा आयाम जुड़ गया है और अमेरिका और रूस के सामरिक कर्णधार चीन को भी इस शक्ति समीकरण में शामिल करना चाहते हैं।

कोरोना से चीन के परमाणु अड्डे और संसाधन कितने प्रभावित हुए हैं या हो सकते हैं इसकी पुष्ट जानकारी सामरिक विशेषज्ञों को नहीं है लेकिन उनका मानना है कि जिस स्तर पर चीन में कोरोना महामारी फैली है उससे चीन के संवेदनशील परमाणु अड्डों के संचालक पूरी तरह बचे होंगे यह कहना मुश्किल होगा। चाहे वह अमेरिका या चीन या रूस हो, कहीं भी किसी भी परमाणु अड्डे को यदि कोरोना वायरस डसता है तो इससे उनके सुरक्षित प्रबंध की चिंचा पैदा होती है। यदि कोरोना पीड़ित संचालकों की वजह से दुनिया के एक भी परमाणु केन्द्र पर कोई दुर्घटना हुई तो इसका दुष्प्रभाव पूरी धरती पर फैलेगा। इसलिये जरूरी है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय एक जूट होकर न केवल कोरोना के कहर से आम लोगों को बचाने के लिये एकजुट हो बल्कि अपने परमाणु अड्डों को भी कोरोना की मार से बचाने के लिये समन्वित कदम उठाए।

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