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समर नीति: चीन का नया पैंतरा

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग
फाइल फोटो

गत पांच महीनों से पूर्वी लद्दाख के सीमांत इलाकों में भारत और चीन की सेनाओं के बीच चल रही सैन्य तनातनी के बीच चीन ने तनाव दूर करने के लिये नया पैंतरा अपनाया है। उसने मौजूदा सैन्य तनातनी पर से ध्यान हटाने के लिये ही विवाद को भू-भागीय विवाद का रूप दे दिया है। चीनी विदेश मंत्रालय ने 29 सितम्बर को अपने नवीनतम बयान में कहा है कि भारत और चीन 1959 के नवम्बर में चीन के प्रधानमंत्री चओ अन लाई द्वारा रखे गए उस प्रस्ताव को मान लें जिसमें उन्होंने कहा था कि पूर्व में मैकमोहन रेखा को चीन स्वीकार कर लेगा जिसके बदले में पश्चिम में भारत अक्साई चिन के इलाके को चीन के हिस्से के तौर पर मान्यता दे दे। साथ ही उसने यह भी कहा था कि 1959 में लद्दाख के इलाके में जिस देश के सैनिक जहां हैं और जिस सीमा तक जिस देश का जहां तक नियंत्रण है वह उस देश के पास रहेगा।





तब 1959 में प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने इसे नामंजूर कर दिया था और यही वजह है कि 1962 का युद्ध हुआ। सवाल यह उठता है कि जब भारत ने तब चीन के प्रस्ताव को नहीं माना तो अब कैसे मानेगा। इस बीच चीन की यांग्चे और भारत की गंगा नदियों में काफी पानी बह चुका है। आज का भारत 1962 का भारत नहीं है जो चीन की बंदरघुड़कियों के आगे झुक जाए। चीन यदि वास्तव में भारत के साथ सीमा और भूभाग के विवाद को हल करना चाहता है तो उसे भारत को यथार्थपरक प्रस्ताव रखने होंगे। पूर्व में अरुणाचल प्रदेश का इलाका भारत का रहा है और भारत इसे किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ सकता। पश्चिम में जहां तक अक्साई चिन के इलाके का सवाल है उस पर अब चीन का कब्जा हो चुका है जहां से होकर चीन ने पचास के दशक में ही काराकोरम राजमार्ग बना लिया था।

चीन भी इस इलाके को किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ने वाला। चीन यदि इस इलाके को अपने पास रखना चाहता है तो उसे भारत के सामने मान्य प्रस्ताव रखने होंगे। भले ही भारत को अक्साई चिन का इलाका चीन को देने को तैयार होना पडे लेकिन लद्दाख के इलाकों में मानसरोवर से लेकर अन्य प्रभाव वाले इलाके भारत को देने होंगे। पूर्वी लद्दाख के जिन इलाकों में चीन ने कब्जा किया हुआ है उसे वह छोड़ने को तैयार हो जाए।

1962 के युद्ध के बाद चीन भारत के साथ विवादों को लेकर मौन रहा लेकिन अस्सी के दशक में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी चीन गए तो चीनी नेताओं ने कहा कि दोनों देशों के बीच भूभागीय और प्रादेशिक विवाद इतिहास की विरासत हैं जिसे आपसी बातचीत से सुलझा लिया जाएगा। तब तक भारत और चीन आर्थिक सहित अन्य क्षेत्रों में आपसी रिश्ते मजबूत करें। भारत ने चीन की बात मान ली। लेकिन इस दौरान चीन ने पाकिस्तान के कब्जे वाले गिलगिट बालटिस्तान इलाके में चीन पाक आर्थिक गलियारा बना कर भारत की सम्प्रभुता पर आंच डाली।

अब बदले हुए हालात में भारत को यह सोचना होगा कि क्या भारत चीन से अक्साई चिन का इलाका खाली करवा सकता है। हालांकि भारतीय संसद में सरकारें कहती रही हैं कि अक्साई चिन का इलाका भारत का है और इसे वापस लेकर रहेंगे लेकिन ऐसा करने के लिये भारत को चीन के साथ युद्ध छेडना होगा। भारत को सोचना होगा कि क्या भारत औऱ चीन के बीच जो मौजूदा वास्तविक नियंत्रण रेखा है उसके कमोबेश कोई सहमति चीन के साथ बना लें। इससे भारत को यह फायदा होगा कि चीन के साथ लगने वाली सीमा पर सेना की तैनाती पर होने वाला सालाना हजारों करोडं रुपये के खर्च से बचा जा सकेगा।

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