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समर नीति: चीन का फैलता दायरा

चीनी युद्धपोत
फाइल फोटो

पाकिस्तान के कराची बंदरगाह तक अपने पांव पसारने के बाद चीन अब म्यांमार के रास्ते बंगाल की खाड़ी तक अपनी सीधी पहुंच बनाने की योजना को अंजाम देने में जुट गया है। इस इरादे से चीन के राष्ट्रपति शी चिन फिंग ने 17 और 18 जनवरी को म्यांमार का दौरा किया है और म्यांमार के साथ बेल्ट एंड रोड इनीशियेटिव ( बी आर आई) के तहत वहां अपने यूननान प्रदेश से होकर म्यांमार की बंगाल की खाडी से लगने वाले  बंदरगाह शहरों  तक राजमार्ग बनाने की नई पहल की है। इसके कुछ महीनों पहले चीनी राष्ट्रपति ने नेपाल का दौरा किया था और वहां भी चीन और नेपाल को जोडने वाली रेलवे लाइन और सड़क मार्ग बनाने का ऐलान कर लौटे हैं। हालांकि नेपाल और म्यांमार दोनों में चीन की इस ढांचागत परियोजना को स्वीकार करने को लेकर बहस चल रही है लेकिन चीन की यह पेशकश इतनी लुभावनी है कि दोनों देशों की सरकारें इसे मना नहीं कर पा रही हैं।





चीनी राष्ट्रपति ने वैसे तो  म्यांमार और चीन के बीच राजनयिक रिश्तों की स्थापना की 70 वीं सालगिरह के बहाने म्यांमार की राजधानी नेपीताव का दौरा किया है लेकिन उनका म्यांमार जैसे छोटे देश के लिये इतना वक्त निकालना चीन की नजर में म्यांमार की सामरिक अहमियत ही दर्शाता है।

रोचक  बात  यह है कि  म्यांमार के सत्तारुढ़ नेताओं का भरोसा जीतने के बाद राष्ट्रपति शी ने म्यांमार का दौरा किया है। रोहिंग्या मुसलमानों को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों  पर जिस तरह म्यांमार की फजीहत हुई है उससे उबारने में चीन ने काफी मदद दी है।

दो साल पहले म्यांमार के शासकों को रोहिंग्या मसले पर चीन ने चतुर रणनीति के तहत   अपने को म्यांमार के हितचिंतक के तौर पर पेश होने में कामयाबी पाई थी। इसके पहले म्यांमार और चीन के रिश्तों में खटास आ गई थी क्योंकि  म्यांमार में जनतांत्रिक चुनावों के बाद अधिनायकवादी चीन के खिलाफ हवा बनने लगी थी।

लेकिन चीन  ने अपनी ओर से रिश्तों पर कोई आंच नहीं आने दी क्योंकि उसकी नजर म्यांमार के शासकों की मदद से अपने दीर्घकालिक सामरिक हितों को आगे बढाने पर  थी।  अब  म्यांमार में चीन के पक्ष में एक बार फिर  हवा बहने लगी है क्योंकि म्यांमार के लोग रोहिंग्या मसले पर चीन का अंतरराष्ट्रीय समर्थन पाकर काफी राहत महसूस कर रहे हैं।  चीन ने पाकिस्तान में चाइना-पाक इकोनामिक कोरिडोर( सीपीईसी) को अपने शिनच्यांग प्रदेश के काशगर से पाकिस्तान के कराची  बंदरगाह तक पहुंचाया और अब पाकिस्तान के भीतर उसने गहरी पैठ बना ली है।

 इसी तरह चीन ने श्रीलंका में भी नई सरकार के साथ अपने रिश्ते पहले की तरह बहाल कर लिये हैं और वहां महत्वाकांक्षी ढांचागत परियोजनाओं को वह पहले ही अंजाम दे चुका है। भारत के इर्दगिर्द सभी पडोसी देशों को ढांचागत विकास क् मायाजाल में फांसने की रणनीति लागू कर रहा है।

भारत के लिये यह चिंता की बात है जिससे प्रभावी तौर पर निबटने के लिये भारत को पडोसी देशों के साथ परस्पर विश्वास और भरोसा का रिश्ता बनाना होगा। भारत के रणनीतिकारों को सोचना होगा कि किस तरह घरेलू राजनीति की आंच आए बिना अपनी पडोसी कूटनीति को अंजाम दें।  हाल में हमने देखा है कि घरेलू राजनीति की वजह से पडोसी देशों के साथ रिश्तों पर आंच आई है। यह भारत के सामरिक हितों के संवर्द्धन के नजरिये से ठीक नहीं होगा कि  एक- एक कर भारत के सभी पडोसी चीन की गोद में बैठते जाएं। भारत को एक महाशक्ति बनना है तो पहले क्षेत्रीय  ताकत का दर्जा हासिल करना होगा और यह तभी मुमकिन हो सकता है जब भारत के क्षेत्रीय देशों के साथ मजबूत सामरिक रिश्ते बनें।

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