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समर नीति: अफगान समझौते ने पाक की अहमियत बढ़ाई

अफगानिस्तान में आतंकी

अफगानिस्तान और अमेरिका के बीच गत 29 फरवरी को हुए शांति समझौते की स्याही सूखी भी नहीं थी कि  तालिबान ने अपने चरित्र के अनुरूप अपनी शर्तें थोपनी शुरू  कर दी। इसका नतीजा यह निकला कि तालिबान ने अमेरिकी सैनिकों पर हमले कर दिये जिससे कई अमेरिकी सैनिक शहीद हो गए। जवाब में अमेरिकी सेना ने भी तालिबान के ठिकानों पर जवाबी हमले किये। इसके पहले तालिबान ने मांग की थी कि अफगानिस्तान की अशरफ गनी की अगुवाई वाली जनतांत्रिक सरकार   अफगानी जेलों से तालिबान के पांच हजार  कैदियों को रिहा कर दे। अफगानिस्तान सरकार ने वाजिब शर्त लगाई कि चूंकि अफगान सरकार के प्रतिनिधियों और तालिबान के बीच दस मार्च को वार्ता शुरु होनी है इसलिये इस बातचीत की प्रगति के बाद ही तालिबानी जेहादियों को अफगानी जेलों से रिहा किया जा सकता है।





अमेरिकी प्रशासन और तालिबान के बीच समझौता करवाने में पाकिस्तान की अहम भूमिका रही थी क्योंकि तालिबानी लोग पाकिस्तानी धरती पर ही पहाड़ी गुफाओं में पाकिस्तानी संरक्षण में रह रहे थे।  पाकिस्तानी टुकड़ों पर पल रहे ये तालिबानी आतंकवादी पाकिस्तान की शह पर ही अफगान सैनिकों से ल़ड़ रहे हैं।  ये वही तालिबानी जेहादी हैं जिनकी तलाश अमेरिका को 2001 से थी। न्यूयार्क और वाशिगंटन की इमारतों पर 9-11 के आतंकी हमलो के बाद जब अमेरिका ने इन तालिबानियों को मिसाइली हमलों से  अफगानी धरती से खदेड भगाया तो उन्हें पाकिस्तानी सेना ने ही शरण दी। अमेरिका ने पाकिस्तान पर दबाव बनाया कि इन तालिबानियों को अमेरिकी फौज को सौंप दे लेकिन पाकिस्तान ने ऐसा नहीं किया और अफगानिस्तान के ग्रेट गेम में जब पाकिस्तान का पलडा भारी पड़ने लगा तो पाकिस्तानी  खुफिया एजेंसी आईएसआई ने इन तालिबानियों को तुरुप  के पत्ते की तरह अमेरिका से वार्ता की मेज पर पेश कर दिया।

पाकिस्तान इस तरह अफगानी समर क्षेत्र में अपना पलड़ा एक बार फिर भारी कर चुका है। पाकिस्तान की चतुर कूटनीति ने अमेरिका को मजबूर किया है कि  19 साल की लड़ाई के बाद वह अफगानिस्तान छोड़ कर चला जाए। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भी अफगानिस्तान  से  अपना बोरिया बिस्तर समेटना चाहते हैं इसलिये उन्होंने  बिचौलिये की  भूमिका में पाकिस्तान को आगे किया । बदले में अमेरिका ने आतंकवाद को लेकर अपना रुख नरम कर दिया है। राष्ट्रपति ट्रम्प ने भारत दौरे में ही पाकिस्तान को अच्छा मित्र बताकर उसके चरित्र का प्रमाण पत्र दे दिया।  इसके साथ ही अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाने वाले भारत को भी अमेरिका ने किनारे कर दिया क्योंकि पाकिस्तान नही चाहता कि भारत  अफगानिस्तान  में कोई   भूमिका निभाए।

अफगानिस्तान में पाकिस्तान की अहमियत बढने के साथ ही आतंकवाद के खिलाफ भारत और विश्व समुदाय की लड़ाई कमजोर पड़ती दिखने लगी है। पाकिस्तान की कोशिश है कि उसके चेहरे पर आतंकवाद की जो कालिख लगी है उसे वह किसी तरह धो दे। इसमें अमेरिका और उसके साथी देश एक बार फिर मदद करते नजर आ रहे हैं। इसका नतीजा यह होगा कि पाकिस्तान की धरती से तहरीक-ए- तालिबान पाकिस्तान( टीटीपी) , इस्लामी स्टेट( आईसिल-के)  जैसे  केवल उन्हीं आतंकवादी गुटों के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई हो जो पाकिस्तान के हितों को चोट पहुंचा रहे हैं। दूसरी ओर   लश्कर ऐ तैयबा , जैश ए मुहम्मद  जैसे आतंकवादी संगठनों के नाम संयुक्त राष्ट्र के बयानों और रिपोर्टों से गायब होते नजर आ रहे हैं। साफ  है कि अफगानिस्तान में पाकिस्तान की  ताकत के आगे अमेरिकी प्रशासन ने घुटने टेक दिये हैं। इसका साफ असर पाकिस्तान की धरती से संचालित भारत विरोधी आतंकवाद कार्रवाई  पर हम आने वाले दिनों में देख सकते हैं। अगली बार जब पाकिस्तान की धऱती से कोई बडा आतंकवादी हमला भारतीय ठिकानों पर होगा तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय भारत के साथ ताकत के साथ खड़ा नहीं दिखेगा।

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