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समर नीति: अमेरिका के साथ रिश्तों का नया दौर

अमेरिका के होने वाले नए राष्ट्रपति
फोटो सौजन्य- गूगल

अमेरिका में राष्ट्रपति जोसेफ बाइडन के लिये ह्वाइट हाउस में प्रवेश के दरवाजे निवर्तमान राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प हालांकि खोलने को तैयार हो गए हैं लेकिन वह हार मानने को तैयार नहीं। एक कहावत है कि रस्सी जल जाती है लेकिन ऐंठन नहीं जाती। डोनाल्ड ट्रम्प कुछ इसी तरह का व्यवहार कर रहे हैं। भारत के लिये यह राहत की बात होगी। डोनाल्ड ट्रम्प हालांकि चीन और पाकिस्तान के मोर्चे पर भारत के लिये काफी मददगार साबित हुए लेकिन ईरान, अफगानिस्तान, रूस और आर्थिक मोर्चों पर भारत के लिये काफी परेशानी खड़ी करते रहे। लेकिन चीन और पाकिस्तान भारत के लिये सबसे कमजोर नसें थी इसलिये इनकी खातिर भारत ने डोनाल्ड ट्रम्प की भारतीय हितों को प्रभावित करने वाली दूसरी नीतियों को बर्दाश्त किया।





अब अमेरिका के भावी राष्ट्पति जोसेफ बाइडन ने साफ कर दिया है कि वह अमेरिका को फिर उसकी प्रतिष्ठा वापस दिलाएंगे और इसके लिये अमेरिका को विश्व रंगमंच पर फिर नेतृत्वकारी भूमिका निभाने के लिये तैयार करेंगे। डोनाल्ड ट्रम्प ने अमेरिका के हाथ विश्व स्वास्थ्य संगठन से खींच लिये, पेरिस क्लाइमेट समझौते से अलग होने का फैसला किया. ईरान के साथ छह देशों के समझौते से बाहर हो गए, अफगानिस्तान में तालिबान के साथ शर्मनाक समझौता करने को तत्पर दिखे और रूस के साथ भारत के रक्षा रिश्तों में अड़चन डालने वाले कानून पारित कर दिये।

लेकिन जोसेफ बाइडन ने अमेरिका की विदेश नीति को फिर पटरी पर लाने वाले जो इरादे और संकल्प जाहिर किये हैं उनसे यह उम्मीद बंधती है कि भारत और अमेरिका के बीच सामरिक साझेदारी के रिश्ते और गहरे रंग लाएंगे। चीन और पाकिस्तान के मोर्चे पर भारत निश्चिंत महसूस कर सकेगा और इसके साथ ही ईरान और अफगानिस्तान को लेकर जोसेफ बाइडन की बदली हुई परिपक्व नीतियों की वजह से भारत की मध्य एशिया नीति को जमीन पर उतारने में आसानी होगी।

भारत की सबसे अधिक रुचि इस बात में होगी कि जोसेफ बाइडन हिंद प्रशांत को लेकर डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन की नीतियोंको कितनी गहराई देते हैं। बाइडन ने पहले ही हिंद प्रशांत नीति को जारी रखने के बारे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से टेलीफोन वार्ता के दौरान चर्चा की है। जोसेफ बाइडन चीन की विस्तारवादी नीतियों से काफी नाराज लगते हैं, शायद इसीलिये उन्होंने चीन के राष्ट्रपति शी चिन फिंग को ठग कहा था। यही वजह है कि चीन बाइडन से काफी चिढ़ा हुआ है।

हिंद प्रशांत के इलाके को लेकर भारत और अमेरिका के साझा हित और एक समान चिंताएं हैं। दक्षिण चीन सागर के जिस इलाके पर चीन अपना प्रभुत्व जमाना चाहता है वह दुनिया का एक प्रमुख व्यापारिक मार्ग है और भारत का आधा से अधिक समुद्री व्यापार इसी समुद्री रास्ते होता है। अमेरिका के भी आर्थिक हित इस समुद्री इलाके से गहरे जुडे हैं। इस समुद्री इलाके के तटीय देशों की भी यही चिंता है कि दक्षिण चीन सागर पर चीन अपना प्रभुत्वत स्थापित करने में कामयाब होगा तो उन दक्षिण पूर्व एशियाई देशों की सम्प्रभुता पर आंच आएगी। इस समुद्री इलाके में चीन ने कृत्रिम द्वीप बना कर अपने समुद्री इलाके के विस्तार की चतुर रणनीति अपनाई है जो विश्व समुदाय के लिये चिंता की बात है जिसके खिलाफ अमेरिकी अगुवाई में इसके साथी देश एकजुट हो रहे हैं। इसी इरादे से भारत, अमेरिका, आस्ट्रेलिया और जापान का चर्तुपक्षीय गुट भी सक्रिय हो चुका है और इन चारों देशों की नौसेनओं ने नवम्बर माह में साझा मालाबार अभ्यास किये है। जोसेफ बाइडन के प्रशासन पर दुनिया के सामरिक पर्यवेक्षकों की नजर रहेगी कि किस तरह चार देशों के इस मालाबार समूह का इस्तेमाल चीन को यह आगाह करने के लिये किया जाएगा कि वह दक्षिण चीन सागर में अपनी विस्तारवादी नीतियों का त्याग करे और एक जिम्मेदार देश की तरह बर्ताव करे।

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