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समर नीति: लद्दाख सीमा पर भारत के सामने भारी चुनौती

चीनी सैनिक
फाइल फोटो

लद्दाख के सीमांत इलाकों की बर्फीली चोटियों पर सैन्य  तनाव  और सैन्य तैनाती अपने चरम पर है । भारत औऱ चीन के बीच सैनिक , राजनयिक और राजनीतिक स्तर पर  अब तक जो वार्ताएं हुई हें उनके नतीजे भारत के लिये काफी निराशाजनक ही कहे जा सकते हैं। चीन ने  जिन इलाकों में भारतीय भूभाग पर अपने सैनिक बैठा दिये हैं वह अब उन इलाकों को अपना बता कर पीछे हटने से साफ इनकार करने लगा है। चीनी सैन्य और राजनयिक प्रतिनिधि पिछली वार्ताओं में सैनिकों को पीछे ले जाने की बात पर चर्चा करते थे लेकिन अब चीन ने नया पैंतरा अपना लिया है जिसकी वजह से भारतीय सेना के सामने चुनौतियां बढती जा रही हैं।





चीन के अडियल रुख का नतीजा यह निकलेगा कि लद्दाख की बर्फीली चोटियों पर आगामी सर्दियों के दिनों में भी भारत को अपने सैनिक तैनात करने होंगे ताकि चीनी सेना भारतीय इलाके में और अतिक्रमण नहीं कर ले।  हालांकि भारतीय सेना ने भी पैंगोंग झील की कुछ चोटियों पर कब्जा कर चीनी सेना पर दबाव बढाया है लेकिन  यह दबाव इतना  भारी नहीं है कि चीनी सेना झुक जाए और पीछे हटने पर सहमति दे दे। चीन ने पांच मई के बाद से लद्दाख की गलवान घाटी. गोगरा , हाट  स्प्रिंग , पैंगोंग त्सो झील इलाके में  वास्तविक नियंत्रण रेखा का उल्लंघन किया और भारतीय सेना उन्हें रोक नहीं पाई। इसके पहले देपसांग घाटी में तो चीनी सेना ने अप्रैल माह से ही भारतीय गश्ती सैनिकों  को गश्ती करने से रोक  कर बडे इलाके पर अपना प्रभुत्व जमा लिया था। इस तरह करीब एक हजार वर्ग किलोमीटर का इलाका चीन के कब्जे में है जहां से चीनी सेना को बेदखल करना काफी टेढी खीर साबित होगा।

 इस मसले पर पिछली बार 21 सितम्बर को भारत औऱ चीन के सैनिक और राजनयिक प्रतिनिधियों की संयुक्त बैठक हुई थी जिसमें केवल यही सहमति बनी है कि  दोनों सेनाएं भडकाने वाली एकतरफा सैन्य तैनाती नहीं करेंगी और एकपक्षीय तौर पर सीमा की यथास्थिति नहीं बदलेंगे।  इस बैठक में यह भी सहमति हुई थी कि जल्द की अगले दौर की वार्ताएं  होंगी ताकि सैन्य तनातनी का माहौल  खत्म किया जा सके। लेकिन कुल मिलाकर चीन की रणनीति यही लगती है कि वह भारत को बातचीत में उलझा कर अपनी सैन्य तैनाती को मजबूत करने का वक्त निकाल रहा है और इसी नजरिये से उसने पिछली छठे दौर की वार्ता में अपना रुख भी कडा किया है। चीनी सैनिकों ने भारतीय इलाकों में घुसपैठ करने के बाद वहां अपने सैनिकों को रहने के लिये पक्के ढांचागत निर्माण कर लिये हैं जिसे तोड कर चीन के लिये वापस जाना उसकी  प्रतिष्ठा पर चोट पहुंचाने के समान होगा।

 भारत ने भी कहा है कि यह मसला काफी जटिल हो चुका है ओर इसमें वक्त लगेगा । लेकिन सबसे बडा सवाल जो भारतीय रक्षा कर्णधारों के सामने गूंज रहा है वह लद्दाख की चोटियों पर अपने सैनिकों की तैनाती के लिये किये जाने वाले वृहद इंतजाम को लेकर है।  भारत के सैन्य इतिहास में पहाडी चोटियों पर इतनी बडी सैन्य तैनाती पहले कभी नहीं हुई।  उन सीमांत पर्वतीय इलाकों पर अब तक करीब 50 हजार सैनिक दोनो देशों के  तैनात हो चुके हैं जिनके लिये रसद और सैन्य साजसामान का इंतजाम एक हिमालयी चुनौती के समान है। एक ओर भारतीय राजनीतिक नेतृत्व कोविड महामारी और इससे पैदा आर्थिक संकट से जूझ रहा है और दूसरी ओर  सीमाओं पर सैन्य तनाव से निबटने की भारी चुनौती सिर पर खडी हो गई है। आगामी अक्टूबर  से जनवरी तक के महीनों में सीमांत पर्वतीय चोटियों पर चौकसी कर रहे भारतीय जवानों के लिये दैनिक सामान की सप्लाई  से लेकर चीन की सेना को आगे बढने से रोकने की सैन्य चुनौती से भारतीय सेना कैसे निबटेगी इसकी रणनीति तो तैयार हो चुकी है लेकिन इसके लिये भारत को भारी कीमत चुकानी पडेगी।

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