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समर नीति: यूरोपीय संघ से रिश्तों में गर्माहट लाने का सुनहरा मौका

यूएन में भारत

ऐसे दौर में जब चीन को लेकर यूरोपीय देशों में संशय का माहौल गहराता जा रहा है भारत और यूरोपीय संघ के बीच गत 15 जुलाई को शिखर बैठक होना भारत के लिये  यूरोपीय देशों के साथ आपसी सामरिक और आर्थिक रिश्तों को गहरा करने का एक  सुनहरा मौका मिला है। हालांकि  27 देशो  का यूरोपीय संघ चीन को लेकर कोई एकजुट नीति नहीं अपना पा रहा है क्योंकि कुछ  कम विकसित और गरीब यूरोपीय देशों पर चीन का आर्थिक जादू काम करता दिखता है लेकिन इतना  तो तय लग रहा है कि फ्रांस, जर्मनी जैसे ताकतवर देशों में चीन के बढते आर्थिक हस्तक्षेप को लेकर नाक- भौं सिकोडी जाने लगी हैं। यूरोप में कहा जाने लगा है कि  चीन द्वारा सामरिक तौर पर अहम ढांचागत क्षेत्रों जैसे बंदरगाहों में निवेश कर उसमें बहुमत की भागीदारी हासिल करना यूरोप के सामरिक हितों के अनुकुल नहीं है। कोरोना महामारी की वजह से यूरोप की कम्पनियां बीमार होने लगी हैं जिसका फायदा उठाकर चीन उन्हें हथियाने की रणनीति पर चलने लगा है जिसे लेकर यूरोपीय देशों ने चिंता जाहिर की है।





 चीन यूरोपीय संघ का सबसे बडा आर्थिक व व्यापारिक साझेदार है औऱ यूरोपीय देशों की चीन पर काफी हद तक निर्भरता बन चुकी है। इटली, हंगरी , फिनलैंड , स्वीडेन जैसे देश इन्हीं वजहों से चीन के साथ नाता कमजोर नहीं करना चाहते हैं। ये ही देश चीन के बेल्ट एंड रोड इनीशियेटिव ( BRI ) के सबसे बडे पैरोकार बनें हैं। चीन  की फाइव-जी तकनीक वाली जिस ह्वावेई कम्पनी को लेकर यूरोपीय देशों में सुरक्षा चिंता जाहिर की जा रही है उसे लेकर भी यूरोपीय देशों में गहन बहस चल रही है।

ऐसे में यूरोपीय संघ ने चीन के साथ रिश्तों को लेकर कहा है कि मानवीय और जनतांत्रिक मूल्यों को लेकर यूरोपीय देशों और चीन के बीच मतभेद हैं।  मानवीय और जनतांत्रिक मान्यताओं की वजह से ही यूरोपीय देशों में भारत के प्रति सौहार्द का माहौल बनता है और  15 जुलाई को ताजा शिखर बैठक में यूरोपीय संघ ने इसे रेखांकित किया है।

कोरोना महामारी और चीन की आक्रामक  विदेश नीति को लेकर यूरोपीय देश असहज होने लगे हैं। ऐसे में यूरोपीय संघ द्वारा भारत के साथ सामरिक साझेदारी  के रिश्तों को गहरा करने के लिये पाचं साल का रोडमैप जारी करना काफी अहम है। एक सौ अरब यूरो के साथ यूरोपीय संघ भी भारत का अहम आर्थिक साझेदार है लेकिन अब भारत की कोशिश होनी चाहिये कि यूरोपीय संघ के साथ  भारत की सामरिक साझेदारी का रिश्ता मजबूत करने के लिये गम्भीरता से काम करे।

अपने जनतांत्रिक मुल्यों और मानवाधिकारों के आदर की वजह से भारत और यूरोपीय संघ अपने को स्वाभाविक साझेदार मानते हैं। भारत की कोशिश होनी चाहिये कि यूरोपीय कम्पनियों को भारत में  निवेश का बेहतर माहौल प्रदान करे ताकि यूरोपीय देश और कम्पनियां भारत को चीन के विकल्प के तौर पर मानने लगें और चीन छोडने की इच्छा रखने वाली यूरोपीय कम्पनियां भारत में अपना निवेश स्थानातंरित करें।

 हिंद महासागर और प्रशांत महासागर और आतंकवाद को लेकर  सामरिक मसलों में भारत और यूरोपीय संघ के बीच जिस तरह के साझा हित विकसित हुए हैं और दोनों इन मसलों पर एक राय रखते हैं उसका लाभ दोनों देशों के बीच आर्थिक रिश्तों में गहराई लाने में  उठाया जाना चाहिये।  सामरिक मसलों पर आम राय की वजह से ही भारत और यूरोपीय संघ ने परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण इस्तेमाल को लेकर एक अहम संधि की है। समुद्री सुरक्षा को लेकर आपसी सहयोग बनाने के इरादे से सागरीय सुरक्षा वार्ता शुरु करने का प्रस्ताव स्वीकार हुआ है।   समान सामरिक हितों और समान विचारों के बावजुद भारत और यूरोपीय संघ के बीच सामरिक सहयोग  के रिश्तों में जो गहराई देखी जानी चाहिये उसे अब साकार करने का वक्त आ गया है।

 

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