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समर नीति: लद्दाख में भारत-चीन तनातनी के 6 महीने

गलवान घाटी पर पीछे हटी चीनी सेना
फाइल फोटो

पूर्वी लद्दाख के चीन से लगे सीमांत इलाकों में सैन्य तनातनी के छह महीने से भी अधिक हो गए हैं लेकिन चीन का रुख अडियल बना हुआ है जिससे यही आभास होता है कि नवम्बर से मार्च तक के बर्फीले मौसम में भारतीय सैनिकों को वहां तैनात रहना होगा। गत 05 मई को चीनी सेना ने पहली बार पूर्वी लद्दाख की वास्तविक नियंत्रण रेखा से लगे इलाकों में घुसपैठ की और वहां भारतीय सैनिकों को गश्ती करने से रोका। भारतीय सेना सकते में आ गई लेकिन चीनी सैन्य घुसपैठ को चुनौती देने के लिये अपने दृढ़ संकल्प का परिचय दिया जिसका नतीजा है कि चीनी सैन्य तैनाती का मुंहतोड जवाब देने के लिये वहां भारतीय सेना ने भी तोपों और टैंकों के साथ 50 हजार से अधिक सैनिकों को तैनात कर दिया है।





वास्तव में चीन भारतीय सेना के संकल्प की परीक्षा ले रहा है। लेकिन चीन ऐसा गलत सोच रहा है कि बर्फीली चोटियों पर रहने के भय से भारतीय सेना चीनी सेना के समक्ष दबाव में आ जाएगी और चीनी सेना की शर्तें मान लेंगी। भारतीय सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व ने बार बार सार्वजनिक तौर पर यह दुहराया है कि भारत एक इंच जमीन का समझौता नहीं करेगा और चीनी सेना को पांच मई से पूर्व की स्थिति पर लौटना होगा। गत छह नवम्बर को भारत के चुशुल इलाके में हुई सैन्य कमाडरों की आठवें दौर की बातचीत को साझा बयान में भारत और चीन ने रचनात्मक और सकारात्मक बताकर उम्मीदें पैदा की थी और इस आशय की भारतीय मीडिया में जब रिपोर्टें प्रकाशित हुई तो चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के मुख पत्र ग्लोबल टाइम्स ने इसका विस्तार से खंडन किया और कहा कि चीन अपने कथित भू-भाग पर दावा नहीं छोड़ेगा।

चीन भारत पर दबाव डाल रहा है कि वह बीच के रास्ते पर कोई समझौता कर ले। यानी चीन चाहता है कि जिन इलाकों में भारतीय सेना गश्ती करती रही है वहां भारतीय सेना अपनी गश्ती बंद कर दे। चीन इसे असैन्य क्षेत्र या बफर जोन बताकर यह छिपा उद्देश्य हासिल करना चाहता है कि भविष्य में वह कभी इन बिना गश्ती वाले इलाकों पर फिर अपने कदम बढा ले। चीन यह साबित करना चाहता है कि वह शांति चाहता है लेकिन भारतीय सेना ही अपनी जिद पर अड़ी है। भारतीय सेना के पीछे भारतीय राजनीतिक नेतृत्व और भारतीय जनमत है जो उन्हें बर्फीली चोटियों पर तैनात रहने के लिये मनोबल प्रदान कर रहा है। भारतीय सेना को सियाचिन जैसे शून्य से 40 डिग्री नीचे तापमान में रहने का दुनिया में अनोखा अनुभव है। दूसरी ओर चीन के सैनिक ही वहां की सर्दियों में रहने के भय से कांप रहे हैं और चीन की ओर से ही यह जल्दी दिखाई जानी चाहिये कि वह पांच मई से पूर्व की तैनाती की स्थिति पर लौट जाए और भारत और चीन के बीच रिश्तों को फिर पटरी पर ले आए।

लेकिन चीनी नेतृत्व सोच रहा है कि चीन किसी तरह झुका हुआ नहीं दिखे। आखिर पिछले छह महीने के दौरान चीन ने भारतीय भू-भाग पर कब्जा करने के लिये जो कदम उठाए हैं वे सब वह यूं नहीं बेकार जाने देना चाहता है। चीन के लिये अब भारतीय सेना के साथ कोई सम्मानजनक समझौता करना उसकी नाक का सवाल बन गया है। लेकिन चीन यदि इसी सोच पर अडा रहा तो भारत के साथ तनाव कभी भी खत्म नहीं होगा औऱ यदि अचानक यह खुले युद्ध में तब्दील हो जाए तो विश्व समुदाय को हैरानी नहीं होगी। भारत औऱ चीन के बीच युद्ध की स्थिति दुनिया में अस्थिरता पैदा करने वाली होगी जैसा कि यहां रूसी राजनयिक ने कहा है। इसका विश्व राजनीति और अर्थव्यवस्था पर गम्भीर असर पड़ेगा और यह युद्ध कैसे हालात पैदा करेगा उसकी कल्पना नहीं की जा सकती।

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