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ऐसे हो सकती है पूर्व सैनिकों और उनके परिवारजनों की देखभाल

भारतीय जवान
फाइल फोटो

करगिल दिवस पर एक अखबार में रिपोर्ट छपी कि करगिल का एक युद्ध नायक सतपाल सिंह  जिन्हें बहादुरी के लिए वीरचक्र से सम्मानित किया गया था, की नियुक्ति पंजाब के संगरुर जिले के एक छोटे से शहर भवानीगढ़ में ट्रैफिक पुलिस के एक जवान में रूप में की गई थी। वह सेवानिवृत्ति के बाद पंजाब पुलिस में तैनात हुए थे और उन्हें एक अलंकृत युद्ध नायक होने का कोई अतिरिक्त लाभ नहीं प्राप्त हुआ। उनका मामला कोई अकेला मामला नहीं है। इस तरह और बहुत से युद्ध नायकों की नियुक्ति हुई होगी और वे किसी नौकरी के लिए संघर्ष कर रहे होंगे क्योंकि उनके ऊपर परिवार चलाने की जिम्मेदारियां होती हैं और आजीविका चलाने के नाम पर उनके पास केवल पेंशन होती है।





इसी तरह कई युद्ध नायकों की विधवाएं होंगी जिन्हें केवल पेंशन प्राप्त हो रही होगी लेकिन उन पर अपने बच्चों की पढ़ाई या उनकी नौकरी से संबंधित और कई कठिन जिम्मेदारियां होंगी क्योंकि वे मिलने वाले भत्तों और उनके कल्याण के लिए उपलब्ध अन्य हकदारियों से वाकिफ नहीं होंगी।

जहां सतपाल सिंह के मामले में  पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिन्दर सिंह ने तुरंत कार्रवाई की और इस युद्ध नायक को पदोन्नत कर सहायक सब इंस्पेक्टर बना दिया, लेकिन ऐसे मामले जब तक सामने न लाया जाए अन्य लोगों के समक्ष इस प्रकार की समस्याएं बनी ही रहेंगी। ये जवान जिस यूनिट से संबंधित होते हैं, वे अपने हिससे का दायित्व तो निभाते ही हैं लेकिन कुल मिला कर जिम्मेदारी उनके स्तर से ऊपर की बात होती है।

सशस्त्र बलों के पूर्व सैनिकों की विधवाओं, जो अभियान के दौरान हताहत नहीं हुए हैं, को यूनिट की भागीदारी के बावजूद अधिक उपेक्षा और उदासीनता का सामना करना पड़ता है। उनके कल्याण के लिए कई प्रकोष्ठों की स्थापना की गई है लेकिन दूर दराज के क्षेत्र में रहने वाले परिवार उनके अनजान ही बने रहते हैं।

इसी पृष्ठभूमि में सेना ने 2019 को ‘सैन्य परिजनों का वर्ष (एनओके)’ के रूप में समर्पित किया है।

सेना के सामने आने वाली सबसे बड़ी बाधा पुराने सेवानिवृत्त सैनिकों से संबंधित आंकड़े का अभाव है। वर्ष 2000 के बाद  आंकड़े पूरे सटीक तरीके से उपलब्ध हैं क्योंकि डिजिटल रिकॉर्ड उपलब्ध हैं। लेकिन इससे पहले के वर्षों को लेकर जैसे जैसे पिछले वर्ष के मामले आते जाते हैं, अस्पष्टता बढ़ती जाती है। जहां यूनिटें पूर्व सैनिकों के संपर्क में बनी रहती हैं, उनके निधन के बाद एनओके के साथ उनका संपर्क खत्म हो जाता है जिससे उनके साथ परस्पर बातचीत अधिक मुश्किल हो जाती है।

एनओके की आवश्यकताएं भी अलग अलग होती हैं। कुछ लोगों के लिए उनके बच्चों की शिक्षा की आवश्यकता होती है जिसके लिए कई योजनाएं हैं और उनका उपयोग किया जा सकता है जबकि कुछ लोगों के लिए नौकरी की आवश्यकता होती है जिसके लिए कौशल विकास के जरिये प्रेरित करने जैसी सीमित सहायता ही दी जा सकती है। बहरहाल परिवारों के विस्तार को देखते हुए इस सूचना को साझा करना कठीन हो जाता है। कई परिवारों को इसकी जानकारी भी नहीं होती कि सहायता के लिए किससे संपर्क किया जाए।

सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत ने कंपनियों को उनके कंपनी सामाजिक उत्तरादायित्व (सीएसआर) के तहत फंडों को साझा करने के लिए प्रोत्साहित किया है जिससे पूर्व सैनिकों के परिवार कल्याण के लिए एक उपयुक्त फंड सृजित हो गया है। इस वर्ष को एनओके को समर्पित करने के जरिये, उन्होंने उनके जीवन में उत्थान लाने का प्रयास किया है। विन्यासों को ऐसे मामलों का विवरण प्राप्त करने का निर्देश दिया गया है जिन्हें सहायता की आवश्यकता है, जिन्हें बाद में विविध एजेन्सियों द्वारा प्रबंध किया जा सकता है।

एनओके के वर्ष के कई उद्देश्य हैं। इसमें परिवारों के बीच उनकी वित्तीय हकदारियों, कल्याणकारी योजनाओं एवं पेंशन से संबंधित प्रश्नों का समाधान शामिल है। इसमें वैसे परिवारों की पहचान शामिल है जिन्हें वित्तीय सहायता की आवश्यकता है और वे इसे उपलब्ध कराते हैं।

सैनिक बोर्डों, बैंकों, नेपाल दूतावास, कल्याणकारी एजेन्सियों तथा ईसीएच सहित विभिन्न संगठनों, जो भारतीय सेना पूर्व सैनिक निदेशालय के तहत मिल जुल कर प्रचार प्रसार तथा कामकाज करते हैं, को शामिल करने के द्वारा सेना आम जवानों तक पहुंचने की उम्मीद करती है। भले ही वह सभी पूर्व सैनिकों तक पहुंचने में समर्थ न हो सके, उसे उम्मीद है कि इसका संदेश जरुर पहुंचेगा और जरूरतमंद लोग सामने आएंगे। वह राज्य स्तर पर सरकारी मशीनरी पर निर्भर नहीं कर सकता क्योंकि यह उनकी अपनी पहल है।

रक्षा मंत्रालय में पूर्व सैनिक कल्याण निदेशालय इससे जुड़ा रहेगा और इसमें तभी दखल देगा जब राज्य सरकारों के दखल की आवश्यकता होगी। ऐसा इसलिए है क्योंकि यह पहल सेना की है न कि रक्षा मंत्रालय की।

यह तभी सफल होगा जब आम भारतीय, जिन्होंने भारतीय सेना के प्रति अपना प्रेम प्रदर्शित किया है, इस संदेश को पूरे भारत में फैलाएंगे। एनआके को अवश्य अवगत कराया जाना चाहिए कि सेना उनके लिए क्या कर सकती है क्योंकि ये उनके अपने प्रिय व्यक्ति ही थे जो राष्ट्र की सुरक्षा के लिए खड़े थे।

जिस किसी व्यक्ति को पूर्व सैनिकों के परिवारों के बारे में ऐसी कोई जानकारी हो कि उन्हें किसी भी प्रकार की वित्तीय, पेंशन संबंधी या किसी अन्य प्रकार की सहायता की आवश्यकता है और वे सेना के अधिकारियों के साथ संपर्क करने में असमर्थ हैं, वे इसकी सूचना देश भर में फैले स्थानीय पूर्व सैनिक प्रकोष्ठों या दिल्ली में भूतपूर्व सैनिक निदेशालय को दे सकते हैं। इसके हेल्पलाइन नंबर हैं-1800116644, 011-25674762, 011-25674764 और 011-25674067

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है। ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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