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चुनाव आते ही शुरू हुआ रक्षा सौदों पर छींटाकशी का दौर

डिफेंस डील

जब भी चुनाव के दिन नजदीक आने लगते हैं, राजनीतिक दल भ्रष्टाचार के पुराने मामलों को उठाने के जरिये एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने की जुगत में लग जाते हैं। चुनाव नतीजों की घोषणा के साथ ही ये मामले फिर से अलमारी में बंद हो जाते हैं ताकि अगले चुनावों के वक्त उन्हें फिर से धो-पोंछ कर बाहर निकाला जा सके। हाल के दिनों में, रक्षा सौदे लगातार नजरों में बने हुए हैं। कुछ वर्ष पहले तक बोफोर्स की खबरें सुर्खियों में रहती थीं, जिन्हें कांग्रेस के खिलाफ लगातार इस्तेमाल किया जाता रहा। अभी भी जब इसे उठाया जाता है तो यह मुद्दा कांग्रेस को बुरी तरह सताता है।





कांग्रेस के लिए राफेल विमान खरीद के विवरणों के खुलासे से संबंधित खंड एक वरदान की तरह सामने आए और वह इसका भरपूर फायदा उठाने की कोशिश कर रही है। इस तथ्य से कि पिछली सरकारों ने रक्षा से संबंधित किसी भी सौदे को अंजाम नहीं दिया, किसी को कोई लेना-देना नहीं है। महत्वपूर्ण बात यह है कि गोपनीयता के खंड से बंधे होने के कारण सरकार खामोश है, और इसी वजह से कांग्रेस ने लगातार हमलावार रुख अपना रखा है। दूसरा बहाना OFFSET CLAUSE (ऑफसेट क्लॉज) का है। रणनीतिक समुदाय सच्चाई से वाकिफ है लेकिन आम मतदाता को यह भी किसी घोटाले की तरह नजर आता है, जिससे कहा जा सकता है कि भाजपा की साफ छवि धूमिल हो रही है।

दूसरी तरफ, भाजपा इसी तरह AGUSTA WESTLAND सौदे को भुनाती रही है। इस मसले ने सबसे पहले मई 2016 में अपना सिर उठाया था जब पुड्डुचेरी, पश्चिम बंगाल, असम एवं तमिलनाडु में चुनाव का समय नजदीक आ रहा था। पूरी चुनाव प्रक्रिया के दौरान भाजपा इस घोटाले को लेकर विभिन्न रैलियों में कांग्रेस पर प्रहार करती रही और कांग्रेस को बचाव का रुख अपनाने को मजबूर करती रही। चुनाव संपन्न होते, घोटाले का यह मुद्दा भी रडार से गायब हो गया जबकि सीबीआई ने कदाचित गहराई से इसकी जांच की और नियमित रूप से त्यागी बंधुओं से पूछताछ करती रही।

दिसंबर, 2016 में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड एवं मणिपुर के चुनावों की घोषणा होते ही यह मुद्दा फिर से सामने आ गया। सीबीआई एक बार फिर से सक्रिय हो गई और एयर चीफ मार्शल त्यागी को एक बार फिर से बुलाया गया एवं उन्हें गिरफ्तार भी कर लिया गया। इस घोटाले का दोहन जारी रहा, जिससे कांग्रेस की इज्जत और मिट्टी पलीद होती रही। अब जब 2019 के आम चुनाव नजदीक आ रहे हैं तो ऐसा लगता है कि यह मुद्दा फिर से उभर रहा है और इसकी वजह राफेल को लेकर जवाबी हमला करना ज्यादा है बजाए अंतिम रूप से इस पर कोई फैसला करने के।

इस घोटाले के मुख्य गुनहगारों से अब भी पूछताछ की जानी बाकी है, जबकि त्यागी बलि का बकरा बनते प्रतीत हो रहे हैं। असल में जांच उससे आगे बढ़ी ही नहीं है। त्यागी पर कीमत की अधिकतम सीमा को कम करने का आरोप लगाया गया है जिससे AGUSTA को बोली की प्रक्रिया में शामिल होने की इजाजत मिली। यह भी एक स्थापित तथ्य है कि भला कोई एक व्यक्ति खुद से कोई आमूल चूल परिवर्तन नहीं ला सकता। पूरी प्रक्रिया का दस्तावेजीकरण होता है और फाइल पर इसकी कार्यवाही आगे बढ़ती है, इसलिए अगर इस मामले में गंभीरता बरती जाती है तो जांच को त्यागी बंधुओं से आगे बढ़ जाना चाहिए।

चूंकि हेलिकॉप्टर का उद्देश्य अति महत्वपूर्ण व्यक्तियों का परिवहन था, इसलिए दूसरे मंत्रालय भी इसमें संलिप्त हो सकते हैं। आज की तारीख तक इसमें संलिप्त किसी भी व्यक्ति से कोई पूछताछ या जांच नहीं की गई है। भारत में खरीद प्रक्रियाएं बहुत लंबी चलती हैं और एक सेना प्रमुख के कार्यकाल के दौरान आज तक कोई भी सौदा पूरा नहीं हो पाया है। बातचीत एवं ऑर्डर देने से संबंधित महत्वपूर्ण हिस्सों में सेना मुख्यालय को नजरअंदाज किया जाता है। इसलिए, हो सकता है कि इस सौदे में और भी कई लोग संलिप्त हो सकते हैं जो अब तक नजरों से दूर हैं।

अब जब आम चुनाव का समय नजदीक आता जा रहा है, जांच आगे की ओर बढ़ेगी, कुछ छोटे मोहरों को बुलाया भी जा सकता है। हो सकता है कि कुछ लोगों के खिलाफ चार्जशीट भी दायर कर दी जाए। फिर नियमित रूप से सुनवाई होगी। यह मामला एक बार फिर से सुर्खियों में आ जाएगा। जब कांग्रेस राफेल का मुद्दा उठाएगी तो इसके जवाब में AGUSTA WESTLAND का मुद्दा उछाला जाएगा। हो सकता है कुछ गिरफ्तारियां भी की जाएं।

मुख्य आरोपी क्रिश्चियन माइकल को या तो वापस भेजने के लिए कहा जाएगा या उसे जांच में शामिल होने के लिए कहा जाएगा जिसमें कुछ भी सफल नहीं हो पाएगा। मई, 2019 के बाद सीबीआई इससे जुड़ी फाइलों को एक बाद फिर से बंद अलमारियों के हवाले कर देगी और उन्हें एक बार फिर से तब खंगाला जाएगा जब अगला चुनाव सिर पर आ जाएगा।

यह प्रक्रिया सिस्टम का उतना भला नहीं करती जितना बुरा करती है। जांच से विश्वास और भरोसा उठने लगता है और जांच एजेन्सियों के कामकाज में सरकारी हस्तक्षेप अधिक उजागर होने लगता है। सरकार भी रक्षा सौदों को अंजाम देने से हिचकिचाती है। अंततः  न्याय व्यवस्था को धता बता देती है।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है।

ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

 

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