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धर्म और सेना

सेना में हर धर्म के लोग

संजवां हमले के बाद, एक बार फिर से देश के भीतर एकमात्र धर्म निरपेक्ष और अराजनीतिक बल, भारतीय सेना को विभाजित करने के लिए धर्म कार्ड खेला जा रहा है। अखिल भारतीय मजलिस-ए-अत्तेहादुल मुसलमीन के अध्यक्ष असादुद्दीन ओवैसी ने कहा है कि हमले में मारे गए सात में से पांच शहीद मुसलमान थे। वह उन लोगों का जवाब देने की कोशिश कर रहे थे जो नियमित रूप से मुसलमानों से उनकी देशभक्ति साबित करने को उकसाते रहते हैं। उन्होंने टिप्पणी की कि ‘ मुसलमान देश के लिए जान गवां रहे हैं लेकिन उन्हें पाकिस्तानी कहा जाता है। आतंकवादी उनमें फर्क नहीं कर रहे हैं लेकिन तब भी मुसलमानों से उनकी देशभक्ति साबित करने को कहा जाता है।‘





टीवी चैनलों पर बहस भी इसी धारा में मुड़ गई जिसमें मजहब बेशकीमती जानों पर हावी होता हुआ दिखा। एक दिन बाद, कश्मीर घाटी में शहीद जवानों की अंत्येष्टि के दौरान स्थानीय लोग विशाल संख्या में उमड़े। यह पहले की तुलना में स्पष्ट बदलाव था जब भीड़ केवल आतंकियों के जनाजे में शामिल होने के लिए ही जमा होती थी, जबकि सुरक्षा कर्मियों की अंत्येष्टि के दौरान बमुश्किल लोग जुटते थे।

जो लोग मजहब के आधार पर सेना को बांटने की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें सही तथ्यों से वाकिफ होने की जरुरत है। जहां अधिकतर पैदल सेना का निर्माण रेजिमेंट ब्रिटिश के समय हुआ है और उनका एक विविधता भरा इतिहास रहा है, जाति, पंथ या धर्म के आधार पर कभी भी किसी भी नई रेजिमेंट का निर्माण नहीं किया गया है। किसी भी व्यक्ति विशेष के दस्तावेज में जाति या पंथ का कोई दखल नहीं है। धर्म का प्रवेश धार्मिक रीति रिवाजों के अनुसार केवल अंत्येष्टि के समय देखने में आता है। इसलिए, जब सेना में मुसलमानों के विवरण को लेकर जब एक आरटीआई दाखिल की गई तो इसका जवाब केवल एक सरल वाक्य में दिया गया, ‘ सेना में कोई हिन्दू या मुसलमान नहीं होता, केवल सैनिक होता है।‘

एक सैन्य यूनिट के भीतर, टुकडि़यों के मिश्रण के बावजूद, केवल एक ही समान धार्मिक संस्थान होता है। इसे ‘सर्व धर्म स्थल‘ कहा जाता है जिसका अर्थ है, सभी धर्मों के लिए एक आवास स्थान। यह एक अनोखा संस्थान है जो एक छत के नीचे विभिन्न धर्मों को एकजुट बनाता है। इसी स्थान पर ईद, ईस्टर, गुरुपर्व एवं जन्माष्टमी का उत्सव मनाया जाता है। इसलिए, यह सहिष्णुता, भाईचारे एवं विविधता में एकता का प्रतीक माना जाता है।

सेना के इसी अधार्मिक रुख ने इसे देश के भीतर सर्वाधिक सम्मानित बल बना दिया है। धार्मिक दंगों के दौरान, जहां दूसरे पुलिस बल हिचकिचाहट प्रदर्शित करते हैं, या उनके इरादों पर सवाल उठाए जाते हैं, सेना के प्रति हमेशा सम्मान प्रकट किया जाता है और उसकी उपस्थिति मात्र भरोसे और कानून व्यवस्था को बहाल कर देती है। इसने अपने दायित्वों में कभी भी देश को नीचा नहीं दिखाया है। प्राकृतिक आपदाओं के दौरान, जब नागरिकों की मदद करने के लिए सेना की तैनाती की जाती है, सेना किस मजहब के लोगों की सेवा कर रही है, इसका कभी कोई मसला नहीं होता। 2014 की बाढ़ के दौरान, कश्मीर में सेना ने उनकी मदद की जो एक दिन पहले तक पत्थरों से उन्हें चोट पहुंचा रहे थे और जो ठीक अगले दिन भी ऐसा ही करते। फिर भी वे भारतीय थे, कोई हिन्दू या मुसलमान नहीं, जिनकी उन्होंने मदद की। सेना इस तथ्य को नजरअंदाज करते हुए उनकी मदद के लिए दौड़ पड़ी कि उसके अपने शिविर जलमग्न हो गए थे और उनके खुद के परिवार जीवित रहने की मशक्कत कर रहे थे।

हममें से ज्यादातर ने, जिन्होंने सेना की वर्दी पहनी है, हमेशा ही एकल ‘सर्व धर्म स्थल‘ में लोगों के साथ प्रत्येक धार्मिक समारोह का जश्न मनाया है। सैनिकों के लिए धर्म महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उन्हें, बेहद चुनौतीपूर्ण माहौल में भी अपने मिशन और दायित्व को पूरा करने का साहस और भरोसा दिलाता है। बहरहाल, अपने साथियों के साथ उसका जुड़ाव, अपनी बटालियन और उसके नेतृत्व के प्रति भावना, भरोसा और दृढ़ विश्वास है जो उसे अंतिम कुर्बानी देने के लिए प्रेरित करती है। धर्म कभी भी मुख्य कारक नहीं रहा है।

सेना के अधार्मिक रुख एवं चरित्र ने इसे देश का सबसे सम्मानित संस्थान बना दिया है। यह सभी धर्मों का समान रूप से सम्मान करता है और जवान धार्मिक मान्यताओं के अलग एक दूसरे का सहयोग करते हैं। इस प्रकार, जो राजनेता अपने तुच्छ लाभों के लिए सेना को विभाजित करना चाहते हैं, वे कभी भी इसके ताने-बाने को नुकसान नहीं पहुंचा पाएंगे, लेकिन वे देश के भीतर ही विभाजन को जरूर बढ़ाएंगे। ऐसे राजनेता देश के वास्तविक दुश्मन हैं और उनके अनर्गल प्रलापों को नजदअंदाज कर देने की जरुरत है। टेलीविजन चैनलों पर कुछ मिनट की सुर्खियां बटोरने की उनकी कुत्सित इच्छाओं का चैनलों द्वारा विरोध किया जाना चाहिए।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है।

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