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पाक भारत से नहीं, अपनी गरीबी से लड़े

करीब 67 बरस पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बहस का जवाब देते हुए (3 फरवरी 1950) पाकिस्तान पर टिप्पणी की थी-‘कुछ माननीय सदस्यों ने यह कहा है कि पाकिस्तान गलत तरीके इस्तेमाल करता है और एक सीधी नीति पर नहीं चलता। मैं इससे सहमत हूं। क्या भारतीय सदस्य सरकार को यह सुझाना चाहेंगे कि यह सरकार भी पाकिस्तान के साथ सीधी नीति पर न चले। मैं चाहता हूं कि इस सवाल का विचार करके जवाब दिया जाये, क्योंकि मैं अपने मन में पूरी तरह आश्वस्त हूं कि पाकिस्तान चाहे जैसी नीति अपनाए, हमें कुटिलता की नीति पर नहीं चलना चाहिए। मैं ऐसा केवल ऊंचे आदर्शों की दुहाई देकर नहीं कहता बल्कि शुद्ध अवसरवादिता की दृष्टि से भी कहता हूं… कुटिलता की नीति अंत मं चलकर फायदेमंद नहीं होती। हो सकता है कि अस्थायी तौर पर इससे कुछ फायदा हो जाए।’





इतना लंबा समय बीत जाने के बाद भी पाकिस्तान के हुक्मरानों की मानसिकता जस की तस है। उसमें रत्ती भर भी अंतर नहीं आया है। कदम दर कदम, साल दर साल उसकी भारत के प्रति कुटिलता और गलत तरीकों के इस्तेमाल का सिलसिला जगजाहिर है। कश्मीर में अमरनाथ यात्रियों पर घात लगाकर हमला, सीजफायर का उल्लंघन, भारतीय सैनिकों के प्रति बर्बरता, आतंकवादियों की घुसपैठ, अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर दोषारोपण यह बताता है कि करीब सात दशक पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री की टिप्पणी आज भी मौजूं है। खास बात यह है कि पाक की कुटिलता से भारत ने सबक लिया है। सशक्त रणनीति बनाई है। पाकिस्तान को ये नहीं भूलना चाहिए कि करगिल और 1971 की हार उसके खाते में दर्ज है। इतिहास हमें एक बेहतर सबक सिखाता है बशर्ते कि हम पूरे मन से इसके लिए तैयार हों। पाकिस्तान को भी विवेक व वुद्धि का प्रयोग करते हुए सबक लेना चाहिए।

पाकिस्तान की इस कुटिल भावना से भारत सरकार, भारत की सेना और भारतीय जनमानस भली-भांति परिचित है। इसीलिए केन्द्र सरकार हाल के महीनों में सर्जिकल स्ट्राइक जैसे कदम उठा चुकी है और भारत की रक्षा सेनाएं शौर्य व पराक्रम के साथ पाक और पाक समर्थित आतंकवादियों को करारा जवाब दे रही हैं। अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भी पाकिस्तान बगलें झांकता हुआ दुनिया से अलग-थलग होता दिख रहा है। साथ-साथ आजादी मिलने के बाद करीब तीन पीढ़ियों का वक्त गुजर गया। भारत विकास के रास्ते पर चल कर महाशक्ति बनने की ओर बढ़ गया और पाकिस्तान विकास करने की मानसिकता तक नहीं बना पाया। पाकिस्तान को अब भारत से नहीं अपने देश की गरीबी, बदहाली, बदमिजाजी से लड़ने का रूख करना चाहिए।

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