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सुरक्षा बलों को बनानी होगी नक्सल इलाकों में नई रणनीति

देश के 10 नक्सल प्रभावित राज्यों में हिंसा की घटनाओं में कमी आने तथा सुरक्षा बलों के जवानों को लगातार शहादत देने के बारे में गृह मंत्रालय ने जो हालिया आंकड़ें जारी किए हैं वे बहुत राहत देने वाले नहीं हैं। केंद्रीय गृह मंत्रालय के आकंड़ों के मुताबिक वर्ष 2017 में 15 अक्टूबर तक नक्सलवाद की 701 घटनाएं हुई हैं। इसमें 150 नागरिक तथा 70 सुरक्षा बल के जवान शहीद हुए। जबकि इसी अवधि में पिछले साल नक्सलवाद की 887 घटनाएं हुई थीं। इसमें 59 जवान शहीद हुए थे और 177 नागरिक मारे गए थे।





किसी सैनिक की शहादत सीमा की सुरक्षा के दौरान हो या शांति बहाली में, बेहद परेशान करने वाली होती है। कठिन प्रशिक्षण और कठोर मेहनत के साथ एक जाबांज सैनिक तैयार होता है। इसलिए जरूरी है कि नक्सल प्रभावित राज्यों के इलाकों में एक विशेष रणनीति के साथ आगे बढ़ा जाए। इन क्षेत्रों में सुरक्षा बलों के जवानों की तैनाती एक कदम है और चाक-चौबंद कुशल कार्रवाई दूसरा महत्वपूर्ण कदम। जंगलों और गांव में घुसकर कार्रवाई में अकसर होता है कि सुरक्षा बल ठोस जानकारी के अभाव में घात लगाकर बैठे नक्सलवादियों के निशाने पर आकर शहीद हो जाते हैं। इसीलिए शहादत का आंकड़ा बढ़ जाता है। इसी बात के मद्देनजर यह जरूरी है कि अर्धसैनिक बलों के सशस्त्र अभियान के दौरान सतर्कता का पूरी तरह से हर स्तर पर पालन हो। इसके लिए जरूरी है कि शीर्ष से लेकर जंगल में तैनात जवान के बीच सटीक-सुरक्षित तालमेल का ढांचा बेहतर तरीके से विकसित हो और उसकी समय-समय पर निगरानी भी हो।

यह सही है कि छत्तीसढ़ में नक्सलियों के गढ़ में घुसकर कार्रवाई करने की वजह से मौतें अधिक हुई हैं। सुरक्षा बल पहले इन क्षेत्रों में जाने से परहेज करते थे। पर अब विशेष एक्शन प्लान के तहत कार्रवाई कर रहे हैं। इसलिए इस पहलू पर भी ध्यान देने की जरूरत है कि आखिर किन कारणों से शहादत व नागरिकों की मौतों की संख्या बढ़ रही है। सैन्य उपकरण, साज-सामान, गोला-बारूद, सटीक संचार तंत्र, आपसी तालमेल अथवा जो भी कारण हों उस पर शीर्ष पदों पर बैठे लोगों को ध्यान देने की आवश्यकता है। अगर लगता है कि सुरक्षाकर्मियों की सैन्य रणनीति में बदलाव से नक्सल प्रभावित इलाकों के हाल बेहतर और सामान्य हो सकते हैं तो उस दिशा में ठोस कदम उठाने और उस पर अमल करने की लगातर जरूरत है। अति उग्रवादी अथवा उग्रवादी नक्सलियों को बातचीत के आधार पर उनसे हथियार छुड़ाने की लगातार कोशिश से स्थितियां निश्चित ही बदलती हुई नजर आएंगी। भटके हुए युवाओं को मुख्यधारा में शामिल करने तथा उन्हें विकास व रोजगार के रास्ते में चलने में मदद करने से बेहतर जमीन तैयार होगी। जरूरत केवल युवाओं को विश्वास में लेने तथा सतत पहल करने की है। रास्ता लंबा और कठिन जरूर है पर इतिहास के पन्नों में असम में उग्रवाद और पंजाब में आतंकवाद के बाद हालात सामान्य हो जाने के उदाहरण दर्ज हैं। वहां के युवा मुख्यधारा से जुड़कर आज समाज और देश का भला कर रहे हैं। आज यही कदम सुरक्षा बलों के जवानों की शहादत तथा नागरिकों की मौतों को रोकने में पूरी तरह सक्षम होंगे।

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