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रक्षा निर्माण इकाइयों में बदलाव से मिलेगी नई दिशा

आयुध फैक्ट्री
फाइल फोटो

ऐसी घोषणा की गई थी कि रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र इकाइयों (पीएसयू) को रक्षा मंत्रालय से हटा कर भारी उद्योग में डाला जा रहा है। इस कदम पर विचार नीति आयोग एवं राष्ट्रीय सुरक्षा परामर्शी बोर्ड द्वारा दिए गए सुझावों के आधार पर किया जा रहा है। एक प्रकार से  सेना मुख्यालय इस विचार के पीछे हो सकता है क्योंकि उनके स्थायी ग्राहकों के रूप में वे रक्षा मंत्रालय के तहत बच रहे पीएसयू द्वारा प्रभावित थे।





रक्षा मंत्रालय के तहत आठ पीएसयू हैं। ये हैं- हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल), भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल), भारत अर्थ मूवर्स लिमिटेड (बीईएमएल), मझगांव डॉक लिमिटेड (एमडीएल), गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स लिमिटेड (जीआरएसई), गोवा शिपयार्ड लिमिटेड (जीएसएल), भारत डायनामिक्स लिमिटेड (बीडीएल) और मिश्रधातु निगम लिमिटेड (मिधानी)। ये उपक्रम रक्षा क्षेत्र की जरूरतों की पूर्ति के अतिरिक्त सिविल क्षेत्र की कुछ मांगों की भी पूर्ति करते हैं। आठ रक्षा पीएसयू में से पांच पीएसयू एचएएल, एमडीएल, जीआरएसई, बीडीएल एवं मिधानी पूरी तरह भारत सरकार के स्वामित्व के अधीन हैं।

रक्षा पीएसयू की स्थापना आजादी के बाद की गई थी  जब भारत का प्रौद्योगिकीय आधार निम्न था। बढ़ते आईटी क्षेत्र और रक्षा विनिर्माण में निजी क्षेत्र के उद्भव के साथ ये पीएसयू अब अपना महत्व खो रहे हैं। लगातार कम होते रक्षा बजट से भी उनकी यह स्थिति हुई  और अधिकांश गैर-लाभकारी उद्योग थे। जो लाभ, उन्होंने प्रदर्शित किया  वह इसलिए कि उनका एक स्थायी ग्राहक  सशस्त्र बल था, जो उनसे उनके उत्पाद खरीदता था। एचएएल से विमान सहित कई मामलों में वे मूल विनिर्माता से खरीदे जाने की तुलना में अधिक महंगे थे।

रक्षा मंत्रालय के तहत वे रक्षा उत्पादन विभाग के तहत कार्य करते हैं। उन्हें अनुचित महत्व दिए जाने एवं सरकार के ‘मेक इन इंडिया‘ कार्यक्रम के तहत एक रोड़ा बनने की शिकायतें बढ़ रही हैं। इसके अतिरिक्त  रक्षा मंत्रालय घाटे में रहने वाली पीएसयू के विनिवेश का कभी फैसला नहीं ले सकी। पिछले कई वर्षों से रक्षा मंत्रालय का एक हिस्सा होने के कारण  उन्हें ऑर्डर, विलंबों, भुगतान समयों और गुणवत्ता में वरीयता दी जाती रही है।

अब शायद सुधार का समय शुरू हो चुका है जिसकी सशस्त्र बल प्रतीक्षा कर रहे थे। सुधारों का अगला चरण  जो संभवतः आरंभ हो चुका है, ऑर्डनेंस फैक्टरियों के इसके संग्रह के साथ ऑर्डनेंस फैक्टरी बोर्ड (ओएफबी) का पुनर्गठन है। ये भी लगभग निष्क्रिय उद्योग हैं जिनके उत्पादन की गुणवत्ता बेहद निम्न है और विनर्माण की वस्तुएं स्थानीय बाजार में बहुतायत से उपलब्ध है। उनमें और निवेश किए जाने पर विचार नहीं किया गया क्योंकि उनकी कार्य संस्कृति उसकी गुणवत्ता के साथ-साथ और भी निम्न होती गई। अगर उन्हें जारी रखना है तो उनका निवेशों के साथ जीर्णोद्धार किए जाने की जरूरत होगी और उन्हें वैसी वस्तुओं के विनिर्माण में तब्दील करना होगा जो बलों की विशिष्ट जरूरतों की पूर्ति करती हैं।

अपने नवीनतम कदम में  जो सेना प्रमुख के दिमाग की उपज है, सेना मुख्यालय ने सरकार को भरोसा दिलाया कि ऑर्डनेंस फैक्टरियों की स्थिति अच्छी नहीं है और सेना द्वारा इसका अधिग्रहण कर लिया जाना चाहिए। सरकार ने इस पर सहमति जता दी है और एक परीक्षण परियोजना आरंभ कर दी गई है।

वर्तमान में सेवारत सेना के एक अधिकारी की नियुक्ति अमेठी (उत्तर प्रदेश) में एके 203 विनिर्माण ऑर्डनेंस फैक्टरी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में की गई है। नियुक्त किया गया अधिकारी पैदल सेना का है और सीईओ के रूप में उसका कार्यकाल चार वर्षों का होगा। उनकी सहायता ऑर्डनेंस फैक्टरी के कुछ कार्यरत अधिकारी केवल कुछ ही सीमित समय के लिए करेंगे। उन्हें पर्याप्त वित्तीय और निर्णय लेने का अधिकार प्रदान किया गया है।

श्रम बल का एक बड़ा हिस्सा क्षेत्र के सेवानिवृत्त सैनिकों से निर्मित्त होगा। प्रदायगी (डिलीवरी) सारणी, गुणवत्ता नियंत्रण एवं विश्वसनीयता में इस परियोजना की सफलता भविष्य के लिए ऑर्डनेंस फैक्टरियों के नियंत्रण एवं कार्यप्रणाली के माहौल को बदल देगी। फिर यह सेना द्वारा अधिग्रहीत की जाने वाली ऑर्डनेंस फैक्टरियों के लिए एक मॉडल बन जाएगा जिनका रक्षा की विशिष्ट जरूरतों के उत्पादन के लिए जीर्णोद्धार किया जा सकता है।

बहरहाल  इसकी राह में कई रोड़े होंगे। ऐसे कई निहित स्वार्थी तत्व होंगे जो इस परियोजना को बाधित करने की कोशिश करेंगे। वे इससे राष्ट्र को होने वाले लाभों पर विचार नहीं करेंगे बल्कि सेना को उसकी सफलता को प्रदर्शित करने से वंचित करने का प्रयास करेंगे। इसमें वैसे लोग भी शामिल होंगे जो दीर्घकालिक रूप से ऐसी फैक्टरियों का नियंत्रण खो बैठेंगे, चाहे वे ओएफबी स्तर पर हों या रक्षा मंत्रालय के स्तर पर। अलावा इसके, ऐसी सफलता अपनी विशिष्ट आवश्यकताओं को प्रबंधित करने तथा वर्तमान प्रणाली की अक्षमताओं से उबरने में सेना की प्रभावोत्पादकता को भी इंगित करेगी।

सेना को इस परियोजना की सफलता को बाधित करने की किसी भी कोशिश का जवाब देने के लिए तैयार रहना चाहिए। जैसे वह अन्य कार्रवाई करती है वैसे ही सेना को इसकी सफलता सुनिश्चित करने में आने वाली बाधाओं से भी अवश्य निपटना चाहिए। यह एक दूरदर्शिता भरा दृष्टिकोण है  जो न केवल अपनी रक्षा जरूरतों की पूर्ति में गुणवत्ता सुनिश्चित करेगा बल्कि यह उन स्थानीय पूर्व सैनिकों की आकांक्षाओं को भी पूरा करेगा जिन्हें अब एक दूसरा कैरियर प्राप्त होगा।

अगला कदम जिस पर रक्षा मंत्री को निश्चित रूप से विचार करना चाहिए , वह है डीआरडीओं को विभाजित करना। इसके दो घटक होने चाहिए  डेवेलपिंग यूनिट और मैन्यूफैक्चरिंग यूनिट। वर्तमान में दोनों का आपस में विलय है। आदर्श स्थिति यह है कि डेवेलपिंग यूनिट को रक्षा मंत्रालय के अधीन बने रहना चाहिए जबकि मैन्यूफैक्चरिंग यूनिट को पीएसयू के समकक्ष समझा जाना चाहिए। क्या इसकी भी संभावना बन सकती है?

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है। ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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