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जम्मू-कश्मीर में नए सूत्रों के साथ काम करने की जरूरत

Satyapal-Malik
जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक शपथ लेते हुए (सौजन्य- गूगल)

जम्मू-कश्मीर में नए राज्यपाल की तैनाती से यह स्पष्ट है कि केंद्र सरकार नए अंदाज और नए नजरिए से कश्मीर समस्या को हल करना चाहती है और आगे बढ़ना चाहती है। हालांकि इस बात का आभास लालकिले के प्राचीर से स्वतंत्रता दिवस के भाषण में प्रधानमंत्री पहले ही दे चुके हैं। उन्होंने इस ऐतिहासिक दिन राष्ट्र के नाम संबोधन में यह बात साफ-साफ कही थी कि सरकार कश्मीर की समस्या को गोली तथा गाली से नहीं बल्कि गले लगाकर हल करना चाहती है। उन्होंने यह भी कहा था कि इसके समाधान के लिए पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वायपेयी के सुझाए इंसानियत, कश्मीरियत और जम्हूरियत के सूत्रों का ही सहारा लेने की पक्षधर है। निश्चय ही यह सूत्र और रास्ता मानवीय, स्थानीय, लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने में कारगर है तथा इस रास्ते पर चलकर घाटी के मौजूदा हालात को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है।





जम्मू-कश्मीर में नया राज्यपाल के रूप में सत्यपाल मलिक की तैनाती को इसी रूप में देखने की जरूरत है। सत्यपाल मलिक जम्मू-कश्मीर सूबे में आधी सदी बाद ऐसे राज्यपाल तैनात किए गए है जिनकी पृष्ट-भूमि सेना या प्रशासन की नहीं है। इसका सीधा अर्थ है कि केंद्र सरकार घाटी में रणनीति बदलना चाहती है और अटल जी के सूत्रों को आधार बनाकर अमन-चैन कायम कर राज्य को विकास की पटरी पर लाना चाहती है।

ऐसे में एक सवाल यह उठता है कि प्रधानमंत्री के कथन और नए राज्यपाल की तैनाती को सूबे के राजनीतिक नेता, अलगाववादी नेता तथा उनके समर्थक किस रूप में लेते हैं। और कश्मीर के हालात को सामान्य बनाने में उनकी क्या रणनीति होती है। यह सही है कि लंबे समय तक राष्ट्रपति शासन या राज्यपाल की भूमिका लोकतंत्र की स्थापना में कारगर नहीं है। लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार का विकल्प राज्यपाल या राष्ट्रपति शासन नहीं हो सकता है। रास्ता यही है कि वहां हालात को जल्द सामान्य बनाने के साथ-साथ चुनाव कराए जाएं। पर यह भी बहुत आसान नहीं है प्रधानमंत्री का यह कथन प्रशंसा के योग्य है कि जम्मू-कश्मीर में लोकतांत्रिक इकाइयों को मजबूत करने के लिए लंबे समय से टल रहे पंचायत व निकाय चुनाव जल्द करा लेने की तैयारी चल रही है। शपथ के बाद सूबे की प्रशासनिक बागडोर हाथ में संभालने के बाद नए राज्यपाल ने भी संकेत दिया कि शिकायत निवारण तंत्र को और मजबूत किया जा रहा है। क्या घाटी के ये नेता नए स्थिति के बीच सूबे को तरक्की और उसे पुराना गौरव वापस लौटाने तथा सुनहरा अतीत लाने के प्रयासों पर चलेंगे?

घाटी में हिंसा बहुत हो चुकी है। कई दशक बीत गए वहां रोज ही किसी-ना-किसी का लहू बहता है। सेना विवश है कि उसे नागरिकों की रक्षा-सुरक्षा के लिए गोली चलानी पड़ती है। सुरक्षाबलों को मजबूरन सख्ती करनी पड़ती है। ऐसे में जरूरी है कि राज्य के सभी नेता शांति के लिए एकजुट हों। गुमराह युवाओं को विस्तार और तसल्ली से समझाएं। उन्हें समझाएं कि सेना और सुरक्षाबल इनकी हिफाजत के लिए हैं। इन्ही हालात के बीच नए राज्यपाल को इंसानियत, कश्मीरियत और जम्हूरियत के सूत्रों को पकड़ कर धैर्य, विवेक और साहस के साथ तेज गति से काम करने की जरूरत होगी।

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