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आतंकियों को उनकी ही शैली में जवाब देने की जरूरत

सीमा पर भारतीय सेना के जवान

जम्मू-कश्मीर घाटी में आतंकवादियों का यह दुस्साहस ही है कि वे यहां के उन स्थानीय बाशिंदों को बंदूक का निशाना बना रहे हैं जो देश तथा सूबे की हिफाजत के लिए सेना, सुरक्षा बलों तथा पुलिस में नौकरी करते हैं। सिलेसिलेवार की जा रही ये हत्याएं चिंताजनक हैं। नीति नियंताओं को इस गंभीर मुद्दे पर एक सटीक रणनीति बनाने तथा उस पर तत्काल काम करने की जरूरत है। यह रणनीति अल्पकालिक और दीर्घकालिक दोनों ही रूपों में हो सकती है तथा इसमें घाटी के नागरिकों को विशेष रूप से विश्वास में लेने की जरूरत है। आतंकवादी कर्तव्यनिष्ठ व देश प्रेमी सैनिकों को गोली का निशाना बनाकर आम नागरिकों और खासकर युवाओं में दहशत व खौफ का माहौल बनाना चाहते हैं। पिछले दिनों आतंकवादियों ने एक फरमान जारी किया था-नौकरी छोड़ दो, अगर नौकरी नहीं छोड़ोगे तो हत्या कर दी जाएगी। इसका असर क्या रहा यह तो नहीं समझा जा सकता पर उनकी यह धमकी कार्यरूप में जरूर परिणति हो रही है। वे आये दिन मौका मिलते ही न केवल हत्या कर रहे हैं बल्कि घर में घुसकर हत्या कर रहे हैं। आतंकवादियो के यह बेखौफ कार्यशैली गंभीर रूप से परेशान करने वाली है।





बीते महीनों में घाटी में ऐसी ही कई वारदातें सामने आई हैं जिसमें अमन के दुश्मनों ने वहशीपन के साथ पुलिस बलों और सेना में नौकरी करने वाले जवानों को निशाना बनाया है। बीते रविवार (29 जुलाई) को पुलवामा जिले के नाइरा में आतंकवादियों ने नसीर अहमद की घर में घुसकर हत्या कर दी। हत्या इसलिए कर दी कि नसीर केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) में नौकरी करते थे। वह छुट्टियों में घर आए हुए थे। इस घटना के दो दिन पहले पुलवामा के त्राल इलाके से स्पेशल पुलिस अफसर (SPO) मुदासिर अहमद को अगवा कर लिया था। इस बीच मुदासिर अहमद की मां का एक वीडियो सामने आया जिसमें वह अपने बेटे को छोड़ने की गुहार लगा रही थी। आतंकियों ने मुदासिर को इस शर्त पर छोड़ा कि वह पुलिस की नौकरी छोड़ देंगे। इससे पहले 14 जून को सेना के जवान और राइफलमैन कहे जाने वाले औरंगजेब की हत्या बेहद परेशान करने वाली थी। उन्हें आतंकियों ने अगवा कर लिया था। वह छुट्टी लेकर ईद मनाने जा रहे थे। पुलवामा में उसी रात गोलियों से छलनी उनका शव मिला था। आतंकवादियों ने जवानों को निशाना बनाने का यह सिलसिला पिछले वर्ष शुरू किया था। मई 2017 में लेफ्टिनेंट फैयाज को आतंकवादियों ने कुलगाम जिले में अगवा कर लिया था और बाद में उनकी हत्या कर दी थी। उन्हें 2016 में पोस्टिंग मिली थी और वह छुट्टियों में घर आए हुए थे।

सवाल यह उठता है कि फोर्स में कार्यरत जवानों की सिलसिलेवार हो रही हत्याएं घाटी के युवाओं का सेना या पुलिस में काम करने या देश व सूबे की सुरक्षा करने के लिए मनोबल तोड़ेंगी? इन परिस्थितियों में पंजाब का नब्बे का दशक याद आता है जब वहां खालिस्तानी आतंकवादी पंजाब पुलिस को निशाना बना रहे थे। आईपीएस अफसरों तथा उनके बच्चों की हत्याएं कर खौफ फैला रहे थे। इसके बाद धीरे-धीरे पंजाब पुलिस ने निर्णायक ढंग से लड़ना शुरू किया। देखते ही देखते चार-पांच साल में सूबे में शांति कायम हो गई। आज वही बात घाटी में लागू होती दिखाई दे रही है। 14 जून को सेना के जवान औरंगजेब की हत्या के बाद हुई शोकसभा तथा बाद में औरंगजेब के पिता ने खुद अपने बेटे की मौत का बदला लेने की बात कही थी। आज तकरीबन दो महीने बाद शहीद औरंगजेब के गांव सलानी में उनके करीब 50 दोस्त खाड़ी देशों की अच्छी-खासी पगार वाली नौकरी छोड़कर एकजुट हो गये हैं। उनकी एक ही मंशा है सेना व पुलिस में भर्ती होकर आतंकवादियों से अपने दोस्त की मौत का बदला लेना। और घाटी से उनका सफाया करना। देखा जाये तो ये हत्याएं सीधे तौर पर स्थानीय क्षति होती हैं। जीता-जागता देश के लिए नौकरी करता एक जवान क्रूरता तथा बेरहमी का शिकार हो जाता है। ऐसे में घर-परिवार, गांव-मुहल्ले या इलाके के निवासियों का खून गर्म होना स्वाभाविक है। निश्चय ही यह घटनाएं आतंकवादियों के खिलाफ स्थानीय नागरिकों में लड़ने की इच्छाशक्ति जगाएंगी, बढ़ाएंगी। इन परिस्थितियों के बीच केन्द्र व राज्य सरकार तथा संबंधित एजेंसियों को सधे कदमों से काम करने की जरूरत है। स्थानीय जनता की भावनाओं व संवेदनाओं को समझकर ही घाटी में अमन चैन का रास्ता बनाया जा सकता है। इसमें कोई दो राय नहीं।

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