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नवजोत सिद्धू, पाकिस्तान और भारत

इमरान खान और नवजोत सिंह सिद्धू

जब से इमरान खान ने पाकिस्तान की सत्ता संभाली है, नवजोत सिद्धू दो बार पाकिस्तान जा चुके हैं। पहली बार इमरान की ताजपोशी के वक्त, जब उन्हें पाकिस्तान सेना के प्रमुख जनरल बाजवा को गले लगाते देखा गया था। गले मिलने की इस घटना की कांग्रेस सहित सभी दलों ने निन्दा की। नवजोत सिद्धू ने अपनी इस बात का बचाव किया और दावा किया कि जनरल बाजवा ने ऐलान किया था कि पाकिस्तान करतारपुर गलियारे को खोलने पर विचार कर रहा है, जो भारतीय सरहद के डेरा बाबा नानक को करतारपुर से जोड़ देगा और इस प्रकार सिखों की लंबे समय से चली आ रही मांग पूरी हो जाएगी। पहली बार पाकिस्तान का यह फैसला सार्वजनिक चर्चा में आया।





सिद्धू की दूसरी पाक यात्रा पाक की सरहद में पड़ने वाले करतारपुर गलियारे के निर्माण के लिए नींव रखने के अवसर पर आयोजित समारोह के अवसर पर हुई। पाक में आयोजित इस समारोह से दो दिन पूर्व भारतीय सरहद में आयोजित भूमि पूजन समारोह के अवसर पर पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह, जिन्होंने पाक का आने का आमंत्रण ठुकरा दिया था, ने सख्त लफ्जों में लिखे पत्र में पाकिस्तानी सेना प्रमुख को पंजाब में आतंकी नेटवर्कों के विस्तार को लेकर कड़ी चेतावनी दी थी।

सिद्धू की यात्रा के दौरान उनके द्वारा की गई टिप्पणियों की और ज्यादा आलोचना हुई। सिद्धू ने पाक टीवी पर अपनी टिप्पणी में कहा कि दक्षिण भारत की तुलना में वह पाक में ज्यादा खुश होते हैं। एक कुख्यात खालिस्तानी समर्थक गोपाल सिंह चावला के साथ उनकी तस्वीर भी सामने आई। इस बाबत पूछे जाने पर सिद्धू ने कहा कि उन्हें नहीं पता कि चावला कौन है जबकि करतारपुर गुरुद्वारे पर उसकी कई तस्वीरें लगी हुई थीं और आजाद खालिस्तान पर एक गैर-बाध्यकारी प्रस्ताव, जनमत-संग्रह 2020 के पोस्टर अटे पड़े थे। ताज्जुब है कि सिद्धू ने आंख मूंदकर इस समारोह में भाग लिया और वहां लगे इतने सारे ऐसे पोस्टरों को नहीं देख पाए।

उन्होंने जनरल बाजवा को गले लगाने को सही ठहराया और कहा कि यह कोई राफेल सौदा नहीं है। अपने इंटरव्यू में इमरान को खुला समर्थन देने की उनकी बातों की पूरे भारत में आलोचना हुई। इमरान ने सिद्धू की तारीफ की और उस अवसर पर मौजूद केंद्र सरकार के मंत्रियों की तुलना में उन्हें ज्यादा महत्व दिया। इससे भी सिद्धू की बदनामी हुई। उनका पाक का एक वीडियो भी सामने आया जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘बातचीत की पहल‘ हमेशा पाक की तरफ से ही होती रही है।

यह भी हैरानी की बात है कि पाक के लिए उनके रवाना होने से ठीक पहले अमृतसर में एक ग्रेनेड हमला हुआ था जिसमें तीन लोगों की जानें चली गईं थीं। अलावा इसके, उनके गृह राज्य पंजाब में आईएसआई से जुड़े 80 से ज्यादा मॉड्यूल का पर्दाफाश हुआ था। जहां उन्होंने पाक की तरफ से बातचीत की पहल का समर्थन किया, वहीं उन्होंने उसी पाक सेना द्वारा जम्मू एवं कश्मीर में आतंकवाद को समर्थन दिए जाने के तथ्य को नजरअंदाज कर दिया जां अब धीरे धीरे पंजाब में भी फैलने लगा है। इसके पीछे भी वही जनरल बाजवा थे, जिसे सिद्धू ने गले लगाया था। उन्होंने कभी भी गुरुद्वारे में लगाए गए आपत्तिजनक पोस्टरों का मुद्दा भी नहीं उठाया।

अब यह समझ में नहीं आ रहा कि सिद्धू पाकिस्तान में लोकप्रिय होना चाहते हैं या परदे के पीछे किसी और कूटनीति के सदस्य बनना चाहते हैं लेकिन इतना तय है कि भारत में उनकी इन बातों की काफी आलोचना हो रही है। अपने बचाव में कही गई उनकी बातों को कोई तवज्जो नहीं दे रहा। उनकी पहले जितनी लोकप्रियता थी, उसमें काफी गिरावट आई प्रतीत हो रही है। शांति वार्ता फिर से शुरू करने की उनकी टिप्पणियों में वास्तविकता एवं स्पष्टता दोनों की ही कमी है।

दो देशों के बीच शांति केवल बातचीत के जरिये ही आ सकती है, यह जगजाहिर सी बात है। लेकिन ऐसा तभी हो सकता है जब इस नीयत के पुख्ता संकेत मिल रहे हो कि दोनों ही पक्ष बातचीत के लिए इच्छुक हैं। इमरान द्वारा केवल इसका जिक्र भर करना कि उनकी सरकार और सेना दोनों ही इसके लिए इच्छुक हैं, से भारत के सामने उनकी सही तस्वीर सामने नहीं आ जाती। यह कहने और इसी के साथ साथ कराची हमलों के लिए भारत की खुफिया एजेन्सियों को जिम्मेदार ठहराने से आपसी विश्वास मजबूत नहीं हो सकता। जब तक तकलीफ देने वाली घटनाएं बंद नहीं होतीं और यह साबित करने का ठोस प्रयास नहीं किया जाता कि पाक अमन चैन के लिए वाकई संजीदा है, केवल बातों से कोई प्रगति हासिल नहीं की जा सकती।

भारत के लिए, जब तक मुंबई हमलों के लिए जिम्मेदार लोगों को सजा नहीं दिलाई जाती और आतंकी समूहों को दी जा रही मदद में कमी नहीं लाई जाती, तब तक बातचीत के लिए जरूरी विश्वास पैदा नहीं हो सकता। करतारपुर गलियारे को खोल देना या शांति की इच्छा जताते हुए प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिख देना, वास्तविक इच्छा का परिचायक नहीं हो सकता।

सिद्धू इसी पहलू को नहीं समझ पा रहे। इमरान से अपनी निकटता का दावा करते हुए दो देशों की सरकारों के बीच सेतु संपर्क के रूप में काम करने का उनका हताशापूर्ण कदम तक तब स्वीकार्य नहीं होगा, जब तक वह वास्तविकता को स्वीकार नहीं करते, सभी जरुरी मुद्वों को नहीं उठाते और तथ्यों को सामने रख कर बात नहीं करते। उनकी बातों का समर्थन उनके करीबी लोग और पार्टी के सदस्य भी नहीं कर रहे जो इस बात का संकेत है कि अब लोग उन्हें कितना कम महत्व दे रहे हैं। अब वाकई ऐसा लगने लगा है कि पाकिस्तान के साथ संबंध सुधारने की वास्तविक इच्छा प्रदर्शित करने के बजाए सिद्धू ने अपनी टिप्पणियों और अपने कामों से कहीं ज्यादा नुकसान कर दिया है।

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ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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