vishesh

मणिपुर फैसला और उसके बाद..

इम्फाल

सर्वोच्च न्यायालय पिछले कुछ वर्षों से मणिपुर में कथित न्यायेतर (गैर कानूनी) हत्याओं पर पीड़ित परिवारों की Extra-Judicial Execution of Victim Families Association (EEVFAM) द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई करता रहा है। यह मामला मौतों की संभावित 1528 घटनाओं से संबंधित हैं। पिछले वर्ष अप्रैल में EEVFAM ने इस 655 मामलों को सामने रखा जिनमें से अदालत 265 मामलों की सुनवाई कर रही है।





मणिपुर में अस्सी के दशक के आरंभ से ही भीषण अराजकता का दौर शुरु हो गया था जो अभी हाल तक जारी रहा। वहां अफस्पा लगा दिया गया था और असम राइफल्स तथा मणिपुर पुलिस और कमांडोज समेत अन्य सुरक्षा बल एवं सेना तैनात कर दी गई थी। वर्तमान में, इम्फाल शहरी क्षेत्र को छोड़ कर पूरे राज्य में अफस्पा लगा हुआ है।

जुलाई के आखिर में, सर्वोच्च न्यायालय ने सीबीआई के निदेशक जो 62 मामलों की जांच कर रहे थे, को बुलाया था और उनसे जांच में तेजी लाने को कहा था। अदालत ने लागू अफस्पा को नजरअंदाज करते हुए सीबीआई को चार्जशीट दाखिल करने और आरोपियों के खिलाफ जांच आगे बढ़ाने को कहा।

मणिपुर में ऑपरेशनों के दौरान, सुरक्षा बलों ने अपने 1900 से अधिक जवानों को खोया है और 3100 से अधिक घायल हुए हैं। जवाबी कार्रवाई में उन्होंने 4900 विद्रोहियों को मौत के घाट उतार दिया और 5100 ने आत्मसमर्पण कर दिया। इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि हत्याओं के कुछ न्यायेतर मामले जरुर रहे होंगे, लेकिन इसमें जनसंहार या प्रतिशोध या जवानों के लिए व्यक्तिगत लाभ का कभी भी कोई मामला नहीं रहा। और न ही सुरक्षा बलों ने नरसंहार के लिए किसी भारी हथियार का इस्तेमाल किया।

जब कश्मीर के साथ इसकी तुलना की जाती है तो मणिपुर में बगावत थी, जिसका अर्थ यह हुआ कि उसे स्थानीय आबादी के विद्रोहियों से पूरा समर्थन प्राप्त था। दूसरी तरफ, कश्मीर पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित छद्म युद्ध है जिसमें इस आंदोलन की अगुवाई करने वाले अधिकांश आतंकवादी पाकिस्तानी नागरिक हैं। इसलिए, विद्रोह के रूप में मणिपुर के विद्रोही आसानी से स्थानीय आबादी में घुल-मिल जाते थे जिससे उनकी खोज करना बहुत मुश्किल हो जाता था। इनमें मारे गए कई विद्रोहियों को भी मासूम करार दिया गया।

इसके अतिरिक्त किसी भी क्षेत्र में, जहां सरकार का नियंत्रण खत्म हो जाने के बाद अमन चैन बहाल करने के लिए सेना तैनात की जाती है, उसका कभी भी स्वागत नहीं किया जाता। इसे एक जबरन कब्जे वाले बल के रूप में देखा जाता है क्योंकि इसे बाहर से लाया जाता है और उसका दायित्व महज अपने फर्ज को अंजाम देना है। उसकी कार्रवाइयों पर हमेशा ही सवाल उठाए जाते हैं और उसके हौसले और कामकाज को सदैव बाधित करने की कोशिश की जाती है। पहले यह नागालैंड में और मणिपुर में हुआ और अब कश्मीर में हो रहा है।

विद्रोह से निपटना हमेशा मुश्किल होता है। जब भी कोई जवान अपनी छावनी से रवाना होता है तो उसे बिल्कुल पता नहीं होता कि वह लौट कर आ भी पाएगा या नहीं। बारूदी सुरंग, सड़क दुर्घटना एवं छुप कर चलाई गई गोलियां कब उसका काम तमाम कर देंगी, कहना मुश्किल है। 2015 में सेना के एक काफिले को निशाना बनाया गया जिसमें 18 जवान शहीद हो गए थे।

वर्तमान उप मुख्यमंत्री एवं मणिपुर पुलिस के पूर्व प्रमुख श्री वाई जे सिंह कहते हैं, ‘ न्यायेतर हत्याओं के कुछ मामले हो भी सकते हैं, लेकिन मुझे नहीं लगता कि जो संख्या बताई जा रही है, वह इतनी अधिक है। अगर 1500 व्यक्तियों को अवैध तरीके से मार दिया गया होता तो राज्य में प्रचंड विरोध हुआ होता। अमन चैन के बहाल हो जाने के बाद पोस्ट मार्टम करना और सुरक्षा बलों पर तोहमत लगाना आसान है, क्योंकि उन्हें राज्य में कभी भी स्वीकार नहीं किया गया और कभी भी स्वीकार नहीं किया जाएगा। आरोप पत्र दाखिल करना और उन्हें दंडित करना राष्ट्रीय हित के खिलाफ होगा क्योंकि इससे उन्हें अपना कामकाज सावधानीपूर्वक करना होगा और यह विद्रोहियों तथा आतंकवादियों की स्थिति मजबूत बना देगी। कई मामलों के गवाह स्थानीय निवासी हैं और और जांच करने वाली एजेंसी चाहे कोई भी क्यों न हो, उनके खिलाफ पूर्वाग्रह तो होगा ही।

सरकारी कानूनों, जो उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं, का सम्मान किया जाना चाहिए। इससे सैनिकों में इस विश्वास का संचार होता है कि वे हिफाजत से हैं क्योंकि वे अपना दायित्व निभा रहे हैं। इसे नजरअंदाज करना और उन्हें निशाना बनाना दीर्घकालिक रूप से देश के लिए नुकसानदायक साबित होगा क्येंकि सेना ही शक्ति का अंतिम स्रोत बनी रहेगी। इससे जरूर गलती होती होगी, जिसे दुरुस्त किया जा सकता है, लेकिन उनके खिलाफ प्रतिशोध से उनका कामकाज प्रभावित होगा और देश को कभी भी ऐसी गलती नहीं करनी चाहिए। यह देश केवल इसीलिए सुरक्षित है क्योंकि सेना ने सभी राष्ट्र विरोधी ताकतों के खिलाफ लड़ाई लड़ी है जिससे कई स्थानों पर शांति बहाल हुई है और यह सुनिश्चित किया है कि कुछ मामलों में प्रतिकूल स्थितियां कुछ ही जगहों पर सीमित हो जाएं। उन्हें समर्थन की जरुरत है, न कि जान बूझ कर उन्हें तंग करने की।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है।

ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

Comments

Most Popular

To Top