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केरल की जल त्रासदी और सेना के ‘देवदूत’

केरल के 'देवदूत'

भारतीय सेना के जोश, जज्बे और प्रतिबद्धता को सलाम करना होगा कि केरल में आई इस सदी की विनाशकारी जल प्रलय का सामना कर रहे नागरिकों को बचाने में वह रात-दिन जुटी हुई है। राहत और बचाव कार्य में थल सेना, नौसेना, वायु सेना, भारतीय तट रक्षक बल और राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF) समेत तमाम सुरक्षा एजेंसियां जिस निष्ठा, सतर्कता, मुस्तैदी से अपना कर्तव्य कर रही हैं वह प्रशंसनीय है। देश के राज्यों के लोक निर्माण विभागों खासतौर से वहां के इंजीनियरों को सेना की ऐसी कार्य शैली अपनाने की जरूरत है। यूं तो सेनाएं और सुरक्षा बल प्रशंसा के भूखे नहीं होते लेकिन जब उन्हें यथोचित सम्मान मिलता है तो उनका सीना चौड़ा हो जाता है तथा वे दोगुने उत्साह से अपने काम में लग जाते हैं और काम को सफलतापूर्वक अंजाम देकर अपनी छावनियों, बैरकों और अड्डों में वापस चले जाते हैं।





पिछले दस दिनों में केरल की जल त्रासदी ने वहां का पूरा जनजीवन भयावह और दुरुह बना दिया है। बारिश और बाढ़ ने शहरों की गलियों-सड़कों को झीलों में बदल दिया है। गांव-देहात जलमग्न हैं। लोगों के पास खाना-पानी नहीं है। करीब चार सौ लोगों की मौत हो चुकी है। हजारों हेक्टयेर में बोई गई फसलें बर्बाद हो गई हैं। बुनियादी ढांचे को जबरदस्त नुकसान हुआ है। तकरीबन 8000 करोड़ रुपये के नुकसान का अनुमान है। हजारों लोगों लापता और घायल हैं। ढाई लाख लोगों से अपना घर छिन चुका है। इस तबाही तथा मौसम की प्रतिकूलताओं के बीच वहां थल सेना, वायुसेना, नौसेना के जवान किसी देवदूत की तरह अपनी भूमिका निभा रहे हैं। उनकी ऐसी जाबांज कार्यशैली की प्रशंसा स्थानीय नागरिकों, विदेशी पर्यटकों और राज्य प्रशासन द्वारा करना स्वाभाविक है।

दरअसल युद्ध के मैदान और सरहद की हिफाजत ही नहीं, बाढ़, भूकंप, दंगा अथवा कैसी भी प्राकृतिक आपदा में राहत तथा बचाव करने का विश्वास सिर्फ फौज पर ही किया जाता है। क्योंकि इतिहास के पन्नों में विपरीत परिस्थितियों में चौकसी तथा मुस्तैदी के साथ काम करने का भरोसा सेना के ही खाते में दर्ज है। ऐसे में सेना पर गर्व करना लाजिमी है। खास बात यह है कि केरल में दस दिन के भीतर सेना ने राहत तथा बचाव कार्य के अलावा ऐसे कार्य भी किए हैं जो उसके सैनिकों को सच में फरिश्ता बनाते हैं। नौसेना के हेलिकॉप्टर ने बाढ़ में फंसी एक गर्भवती महिला को एयरलिफ्ट कर नौसेना के अस्पताल भेजा जहां उसने एक बच्चे को जन्म दिया। जच्चा और बच्चा दोनों सुरक्षित हैं। क्या आपको नहीं लगता कि इस मिशन को पूरा करने वाले कमांडर विजय वर्मा किसी साक्षात देवदूत से कम नहीं हैं? शौर्य चक्र विजेता कैप्टन पी कुमार ने शुक्रवार को जिस तरह बेहद जटिल हालात में 26 लोगों को एयरलिफ्ट कर उन्हें बचाया वह उनके शौर्य और पराक्रम को बताता है। ऐसे ही और तमाम किस्से सेना की विश्वसनीयता और प्रतिबद्धता को बढ़ाते हैं।

बाढ़ प्रभावित केरल में सेना द्वारा चलाया जा रहा ‘ऑपेरशन मदद’ युद्धस्तर पर काम कर रहा है। सेना औऱ सुरक्षा बलों ने जरूरी अमला और उपकरण तैनात कर दिए हैं। थलसेना की दस बाढ़ राहत टुकड़ियां, दस इंजीनियरिंग टास्क फोर्स, 60 नौकाएं, एयरफोर्स तथा नेवी के 38 हेलिकॉप्टर, 20 परिवहन विमान तथा कोस्ट गार्ड तथा एनडीआरएफ की समुचित संसाधनों भरी टीमों की तैनाती इस बात की ओर इंगित करती है कि सैन्य बलों के लिए सरहद की सुरक्षा और नागरिकों की सुरक्षा दोनों बराबर हैं। सेना राज्य में खाने-पीने का सामान मुहैया कराने के साथ-साथ अस्थायी पुलों, बांधों तथा वैकल्पिक रास्तों का निर्माण कर दूर-दराज के गांवों में संपर्क बहाली दिन-रात काम कर रही है। सेना की ऐसी निष्ठा को नागरिकों को भी सीखना चाहिए। विषम परिस्थितियों में काम करने की ऐसी ट्रेनिंग राज्य सरकारों को हर नागरिक को देनी चाहिए ताकि आपात हालात में कई परेशानियों से वह स्वयं भी निपट सकें। केरल में हालात सामान्य करने में जी-जान से जुटी सेनाएं व सुरक्षा एजेंसियां अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा तथा बहादुरी की पर्याय हैं।

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