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करगिल विजय दिवस: …जरा याद करो कुर्बानी

करगिल युद्ध के दौरान बिहार रेजिमेंट
फाइल फोटो

20 साल पहले भारत ने पाकिस्तान के नॉदर्न लाइट इन्फैन्ट्री के घुसपैठियों, जिन्हें उनके विशेष बलों का समर्थन प्राप्त था, को करगिल की ऊंचाई से पीछे जाने को मजबूर कर दिया था। उन शिखरों पर हुई लड़ाई में शामिल भारतीय जवानों की वीरता जगजाहिर है। हताहतों के बाद भी सैन्य अधिकारियों ने शानदार नेतृत्व किया। जवान उनके साथ आगे बढ़ते गए और एक एक करके प्रत्येक चोटी पर फिर से कब्जा कर लिया गया। सेना को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी और 500 से अधिक जवानों से हाथ धोना पड़ा तथा 1,100 घायल हो गए।





ये ऐसे अभियान थे जो केवल भारतीय जवानों की वीरता, दृढ़ निश्चय और आत्म बलिदान से ही सफल हो सके। उनकी वीरता की कहानियां अब लोक कथाओं का रूप ले चुकी हैं। तोपखाने और वायुसेना की गोलीबारी द्वारा उनकी सहायता लगातार जारी रही और उससे विजय सुनिश्चित हुई। दुनिया में कहीं भी किसी भी लड़ाई में और इतने कम समय में तोपखाने ने इतने अधिक राउंड की गोलियां नहीं चलाई होंगी। यह पहला यु़द्ध था जिसका देश भर में घरों में लाइव टेलीकास्ट देखा गया।

मुशर्रफ के इस दुस्साहस, जहां उसने अपने खुद के नेतृत्व को भी आरंभिक चरण में अंधेरे में रखा, को विफल तो होना ही था। जैसे जैसे भारतीय सैन्य अभियान सफल होता गया, पाकिस्तान के भीतर खौफ और अनिश्चिय बढ़ने लगा। यह स्पष्ट हो गया कि भारत को चौंकाने और उसे कारगिल, लद्दाख और सियाचिन से अलग कर देने की पाक की योजना विफल हो चुकी है और उसके जवान लगातार मारे जा रहे हैं। बाद में उसने किसी तरह जान बचा कर भागने की कोशिश की और लगातार प्रयास करता रहा कि उसकी अपनी आबादी को उसके वास्तविक नुकसान का पता न चले। इज्जत बचाने का मौका उसे अमेरिका द्वारा मिला। इसके बाद पाक के डीप स्टेट (प्रशासन, सेना और राजनेताओं का प्रभावी समूह) ने अपनी इतिहास की किताबों को बदल दिया और धीरे धीरे कारगिल को विजय के रूप में प्रदर्शित करने का प्रयास करने लगे जबकि यह उनकी एक बड़ी पराजय थी।

मुशर्रफ अकेला उन हजारों पाक सैनिकों की मौत का जिम्मेदार था जिनकी वह इसलिए अनदेखी कर सकता था क्योंकि वे मुख्य रूप से उत्तरी क्षेत्रों के शिया थे, जिनमें से कई करगिल की ऊंची बर्फीली चोटियों में दब कर रह गए। उसके कदमों ने अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में पाक के सम्मान को भी ठेस पहुंचाया। एक व्यक्ति विशेष के रूप में यह हार भी उसके लिए जीत ही थी क्योंकि कारगिल युद्ध के तुरंत बाद उसने सियासी नेतृत्व को उखाड़ फेंका और तानाशाह बन गया। इतिहास में कभी भी कोई विफल सैन्य नेता पहले तानाशाह और बाद में राष्ट्रपति नहीं बना। यह केवल ‘पाकिस्तान में ही हो सकता‘ है। अभी भी पाकिस्तान मुशर्रफ के नेतृत्व पर पश्चाताप करता है, क्योंकि उसने अपने पहले के अन्य सभी सैन्य तानाशाहों की तरह देश को लगभग दिवालियापन की कगार पर पहुंचा दिया।

भारतीय सेना इस वर्ष ऐतिहासिक कारगिल युद्ध की 20वीं वर्षगांठ मना रही है और जहां मुख्य लड़ाई हुई थी  उस स्थल समेत देश भर में कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है। दिल्ली से एक विजय ज्योति रैली आरंभ की जा चुकी है जिसकी परिणति करगिल में होगी  जहां देश अपने शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करेगा।

हम सभी के लिए, यह उन्हें स्मरण करने का अवसर है जिन्होंने देश के लिए लड़ाई लड़ी, अपने प्राण गंवाएं और उनके लिए भी जो इस युद्ध में घायल हो गए और जिनके अंगभंग हो गए। देश को उस दुर्गम घाटी, उस कठिन परिस्थितियों को याद करने की जरूरत है जहां ये लड़ाईयां भारतीय सेना के शौर्य और संकल्प के साथ लड़ी गईं।

अपने सहयोगियों और करीबी संबंधियों जिन्होंने अपने प्राणों का बलिदान कर दिया, को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए युद्ध में शामिल रहे कई जवान और प्रतिभागी, शहीद परिवारों के परिवारजनों के साथ उस जगह की ट्रेकिंग कर रहे हैं, जहां वास्तविक लड़ाईयां हुईं। उन बर्फीली चोटियों पर अभी भी युद्ध के अवशेष पाये जाते हैं।

भारत के राष्ट्रपति कारगिल में श्रद्धांजलि अर्पित करने में देश की अगुवाई करेंगे जहां अन्य राजनीतिक दलों के नेता पूरे देश भर में इसी भावना के साथ सशस्त्र बलों के साथ जुड़ेंगे। यह राष्ट्रीय नेतृत्व द्वारा हमारे वीर जवानों को श्रद्धांजलि अर्पित करने का एक उचित तरीका है।

यह एक ऐसा अवसर भी होना चाहिए जब एक राष्ट्र के रूप में हम हमारे शहीद जवानों के परिवारों की स्थिति का आकलन करें, उनके साथ परस्पर घुलें-मिलें और उनका कल्याण सुनिश्चित करने का संकल्प लें। हालांकि जिन यूनिटों में वे काम करते थे वे उनके कल्याण के लिए पर्याप्त प्रयास करेंगे ही, एक राष्ट्र के रूप में हमे भी इसमें सहयोग देना चाहिए। इस संबंध में राज्य सरकारों की एक प्रमुख भूमिका है।

अगर सेना के दृढ़ संकल्प और बलिदान के संदेश को देश भर में फैलाया जाना है तो सरकार को निश्चित रूप से सभी शैक्षणिक संस्थानों एवं कंपनियों को इस विषय पर परिचर्चा आयोजित करने और 26 जुलाई के करगिल दिवस पर देश के लिए अपनी जान न्यौछावर कर देने वालों के प्रति एक मिनट का मौन रखने का निर्देश देना चाहिए। स्मृतियों को पूरे देश में मनाया जाना चाहिए, न कि सेना तथा कुछ राजनीतिक नेताओं द्वारा केवल युद्ध स्मारकों में, क्योंकि जिन्होंने अपने जान न्यौछावर किए, उन्होंने देश के लिए ऐसा किया और वे आम नागरिक थे जिन्होंने सेना की वर्दी धारण की थी। यह राष्ट्रीय भावना का निर्माण करने के लिए एक मंच का काम भी करेगा।

कई दशक से भारतीय सशस्त्र बलों ने कभी भी राष्ट्र का सिर नीचे नहीं झुकने दिया है। वे हमेशा मोर्चे पर आगे रहने के इच्छुक रहे हैं, चाहे कोई भी अवसर क्यों न रहा हो। करगिल सभी बाधाओं के बावजूद घुसपैठ की गई जमीन को वापस लेने के लिए एक साधारण जवान के बलिदान का उदाहरण है। हमारे ये नायक अपने बलिदान और वीरता के कारण अमर हो गए हैं। एक राष्ट्र के रूप में हमारी भूमिका उनके परिवारों की देखभाल करने और इन जवानों की वीरता को कभी भी विस्मृत न होने देने की होनी चाहिए।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है। ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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