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जम्मू-कश्मीर अब आतंक मुक्त राह की ओर…

भारतीय सेना
फाइल फोटो

साल 2018 अब अस्ताचल की ओर है। और कश्मीर घाटी में भी आतंक का सिमटता दायरा यह संकेत दे रहा है कि वहां दहशतगर्दों की जमीन खिसक चुकी है। हकीकत में जम्मू-कश्मीर घाटी में पूरे साल सेना, सुरक्षाबलों व राज्य की पुलिस ने जिस तरह आतंकवादियों के सफाए के लिए ऑपरेशन ऑल आउट जारी रख ढाई सौ से ज्यादा आतंकी तथा उनके एक दर्जन सरगनाओं को मौत के घाट उतारा है उससे उम्मीद की जा सकती है कि जल्द ही पूरा सूबा आतंकवाद से मुक्त हो जाएगा। साल 2018 में यहां 261 आतंकियों को ढेर किया गया। ऐसा 10 साल में पहली बार हुआ है। आतंकियों के खिलाफ की गई संयुक्त कार्रवाई के दौरान एक दर्जन टॉप कमांडरों समेत ढाई सौ से अधिक आतंकवादियों को ढेर किया जाना यह बताता है कि अगर यही रफ्तार रही राज्य में मार्च-अप्रैल में होने वाले लोकसभा व विधानसभा चुनाव से पहले आतंकवादियों का सफाया हो चुका होगा। राज्यपाल प्रशासन व केंद्र सरकार के लिए सूबे में शांतिपूर्ण चुनाव कराना अभी एक चुनौती है। आतंकियों की यह कोशिश रहती है कि वह चुनाव तथा मतदान प्रक्रिया में खलल डालें। यह अलग बात है कि सुरक्षा एजेंसियों के समन्वय व मुस्तैदी से हाल में संपन्न पंचायत व निकाय चुनाव में आतंकी ज्यादा सिर नहीं उठा पाए।





आज पूरा देश इस बात को बड़ी शिद्दत से देख सुन पा रहा है कि सुरक्षाबलों की कार्रवाई से आतंकी संगठनों की लगातार कमर टूट रही है। साल 2018 में हिजबुल मुजाहिदीन, लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, गजवा-उल-हिंद, अल-बदर जैसे आतंकी संगठनों के एक दर्जन कमांडर मारे गए। खास बात यह है कि जब कोई कमांडर और तीन-चार आतंकी एक साथ मारे जाते हैं तो उनका मनोबल टूटता है और आतंकियों के बीच भगदड़ मचती है। घाटी में ऐसा होता दिखाई भी दे रहा है। सामाजिक तौर पर अब आतंकियों को बस्ती या गांव में पनाह नहीं मिल रही। अगर किसी जानकार, रिश्तेदार या आम नागरिक के यहां घुस भी जाते हैं तो सुरक्षा एजेंसियों का मजबूत खुफिया तंत्र उन्हें घेर कर सुरक्षाबलों के हवाले कर देता है। घाटी में कड़ाके के इस ठंड में भी आतंकी और उनके सरगना जंगल, खेत, बाग, नाले या प्राकृतिक गुफा के पास शरण ले रहे हैं। सशस्त्र बलों ने हाल ही में ऐसी कई सुरंगों पर छापेमारी की जो जंगलों के निर्जन इलाकों में थी और आतंकी वहां ठहरे थे। पुलवामा में आवंतीपोरा इलाके में आतंकियों के एक ऐसे ही भूमिगत ठिकाने को ध्वस्त किया था।

यह सही है कि आतंकियों और उनके सरगनाओं के सफाए का काम बेशक अंतिम चरण में है लेकिन चुनौतियां अभी बरकरार है। सेना की 2018 की हिट लिस्ट में शामिल चार बड़े आतंकियों में सिर्फ एक आतंकी सद्दाम पाडर ही इस साल मारा गया है। आतंकी जाकिर मूसा जीनत-उल-इस्लाम और रियाज नायकू अभी जिंदा है। हालांकि सुरक्षाबलों का मिशन- 2019 बनकर तैयार है। इस मिशन के तहत मार्च से पहले शेष आतंकवादियों का सफाया किया जाना है। इस बात को सभी आतंकी संगठन भी भलीभांति जानते हैं। लेकिन इस सब के बावजूद आतंकी लगातार खूनी इरादों से सनी रणनीति पर चलते हैं और कई बार हमारे बहादुर जवान शहीद हो जाते हैं। इस साल अब तक 86 बहादुर जवान इन कार्रवाइयों के दौरान अपनी जान गवां चुके हैं। यह गौर करने वाली बात है। ऐसे माहौल में जरूरी हो जाता है कि राज और समाज जवानों के परिजनों और शहीदों के घर-परिवार की कतई अनदेखी ना करें। उनका सर्वोच्च बलिदान आखिर देश की एकता व अखण्डता के लिए है, जिसके लिए वे जी-जान की बाजी लगाकर अपने सर्वोच्च का पालन कर रहे हैं। इस पहलू को देश के हर नागरिक को समझना होगा। साथ ही हर नागरिक को यह भी समझना होगा कि आतंक की फसलें केवल सरहद या जम्मू-कश्मीर में ही नहीं उगाई जाती। तीन दिन पहले राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने दिल्ली व उत्तर प्रदेश में छापा मारकर ग्यारह संदिग्ध आतंकवादियों को पकड़कर जिस तरह एक आतंकी गुट का पर्दाफाश किया है वह बताता है कि आतंकवाद का खतरा अभी टला नहीं है। लिहाजा देख के हर नागरिक को अपने आंख-कान खोलकर सतर्क रहने और जरूरत पड़ने पर इसकी सूचना संबंधित सुरक्षा एजेंसियों तक पहुंचाने की आवश्यकता है।

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