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क्या भारत-पाक संबंधों में कोई बीच का रास्ता भी है?

भारत-पाकिस्तान फ्लैग
प्रतीकात्मक फोटो

हाल के दिनों में पाकिस्तान से कई संकेत लगातार प्राप्त हो रहे हैं। न्यूयार्क में  संयुक्त राष्ट्र आम सभा के दौरान विदेश मंत्रियों के बीच बातचीत करने से संबंधित इमरान खान का पत्र आरंभिक बिन्दु था। इसके बाद इस प्रकार के बयान आए कि पाकिस्तान की सेना और सरकार की भारत से संबंध सुधारने से संबंधित एक ही राय है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि पाकिस्तान शांति के विविध संदेश भेजने के हताशापूर्ण उपाय कर रहा है।





करतारपुर कॉरिडोर को खोलने की भारत की चिर प्रतीक्षित मांग को लेकर सहमत होना पहला संदेश था। दोनों देशों द्वारा लगभग एक साथ घोषणा से इस कूटनीति की सफलता का संदेश मिलता है। 26 नवंबर के अपराधियों को सजा दिलाने की कार्रवाई करने की इमरान द्वारा की गई घोषणा और आखिर में उनके विदेश मंत्री का बयान कि अफगानिस्तान में अमन लाने के लिए भारत का सहयोग अनिवार्य है, सबसे हालिया संकेत है।

इसके साथ साथ पाकिस्तान खासकर पुलवामा घटना के बाद घाटी में आंदोलन कर रहे अलगाववादियों को भी शह देने का प्रयास करता रहा है। घाटी से छन कर आने वाली खबरों के अनुसार वहां अब केवल 50 विदेशी आतंकी हैं, अधिकांश स्थानीय आतंकी हैं। पिछले कुछ समय के दौरान घाटी में मौजूद विदेशी आतंकियों की संभवतः यह सबसे कम संख्या है।

केंद्र की कोई भी सरकार पाकिस्तान की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाने को लेकर सशंकित रहती है क्योंकि पहले के अनुभव काफी कड़वे रहे हैं। मुंबई, कारगिल एवं पठानकोट की घटनाएं बातचीत आगे बढ़ाने की कोशिशों के तुरंत बाद ही घटित हुई हैं। संभवतः पाक के इतिहास में पहली बार सत्तारुढ़ सरकार सेना के हाथों की कठपुतली है और इसीलिए कई रणनीतिकारों  ने बयान दिया है कि यही आदर्श मौका हो सकता है। हो सकता है कि इसके साथ साथ अंतरराष्ट्रीय दबाव, अलग थलग पड़ने और ध्वस्त होती अर्थव्यवस्था ने भी उनकी सेना को अमन की कोशिशों के लिए मजबूर किया हो।

भारत द्वारा सार्क सम्मेलन में भाग लेने से भी मना किए जाने से यह संगठन निष्क्रिय ही बन गया है। पाक इस संगठन को पुनर्जीवित करने के लिए बेचैन है क्योंकि इस सम्मेलन के आयोजन से उसे उपमहाद्वीप में थोड़ी वैधता मिलेगी। बांग्ला देश, अफगानिस्तान एवं भूटान भारत का समर्थन करते रहे हैं। मालदीव में सरकार में परिवर्तन के बाद अब वह भी भारत का सर्थन करेगा। अगर पाकिस्तान बातचीत करने के प्रति कुछ गंभीर संकेत देता है तो भारत उसे स्वीकार कर सकता है और सैद्धांतिक रूप से सार्क में भाग ले सकता है।

भारत ने पाक के प्रस्तावों को मामूली तवज्जो दी है। उसने या तो खामोशी अख्यियार की है और कई मौकों पर पाक के प्रस्तावों को खारित कर दिया है। ऐसे माहौल में क्या कोई बीच का रास्ता हो सकता है जिसमें दोनों ही पक्ष बातचीत पर विचार कर सकते हैं और क्या इसकी संभावना है कि संबंधों में गतिरोध जारी रहे और यह जारी रहे, जैसाकि वर्तमान में यह है अर्थात ‘ न युद्ध, न शांति‘ की स्थिति।

भारत इस मामले में पाकिस्तान से हमेशा धोखा खाता रहा है, इसलिए उससे भविष्य में बातचीत आरंभ करने पर गंभीरता से विचार करने से पूर्व वह पाक से ठोस आश्वासन चाहता है। ये केवल शांति और वार्ता के लिए आने वाले संदेशों से संभव नहीं है, क्योंकि पाक लगातार कश्मीर में अराजकता को समर्थन दे रही रहा है। बातचीत ठोस कार्रवाई के बगैर निर्रथक हैं इसलिए एक सकारात्मक संदेश अनिवार्य है। भारत के लिए मुंबई के गुनाहगारों के खिलाफ कार्रवाई करना और सरहद के निकट के क्षेत्रों में आतंकी लांचिंग पैडों की मौजूदगी में कमी लाना सकारात्मक संकेत होंगे। इस प्रकार पहली गंभीरता तब दिखी जब इमरान ने अपनी सरकार से मुंबई घटना के विवरणों की मांग की।

भारत इससे वाकिफ है कि जिस गहराई से पाक सेना में भारत-विरोधी नफरत के बीज बोए गए हैं, उनसे तुरंत उबर पाना मुश्किल होगा। पाक को आतंकियों एवं देश के भीतर के राष्ट्र विरोधी तत्वों से कहीं ज्यादा खतरा है लेकिन वह इसे मानना नहीं चाहता। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अपनी हर बातचीत में पाकिस्तान के डीजी आईएसपीआर (डायरेक्टर जनरल इंटर सर्विसेज पब्लिक रिलेशंस) आतंकियों से लड़ने में सेना द्वारा दी गई कुर्बानी की बात करते हैं, इसमें शायद ही कभी भारतीय सरहद की गोलीबारी का जिक्र होता है। भारतीय सेनाध्यक्ष ने बिल्कुल सही सुझाव दिया कि पाकिस्तान के रुख में अब भारत को अपना मुख्य दुश्मन मानने की जगह आतंकवाद को असली दुश्मन मानने के प्रति बदलाव देखा जा रहा है।

वास्तविक रूप से भारतीय नेतृत्व के पास मई 2019 तक पाक के साथ बात करने के मसले पर विचार करने का भी कोई वक्त नहीं है। इससे पाक के पास पर्याप्त समय है कि वह भारत को सही संकेत भेज सके। भारत हमेशा से ही बातचीत का पक्षधर रही है लेकिन उसकी प्रत्येक कोशिश किसी न किसी आतंकी घटना की शिकार बनती रही है जिससे पाक के इरादों को लेकर संदेह पैदा किया है। अगर संकेत सकारात्मक हैं तो बातचीत के लिए पर्याप्त बीच का रास्ता निकल सकता है या गुंजाइश बन सकती है लेकिन अगर संकेत नकारात्मक बने रहते हैं तो कोई भी संभावना नहीं है।

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ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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