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भारत की सॉफ्ट पावर से चिंतित चीन

रंजीत कुमार

रंजीत कुमार (वरिष्ठ पत्रकार)

भारत से कहीं अधिक सैनिक ताकत रखने वाला चीन इन दिनों भारत की सॉफ्ट पावर से चिंतित है।  सैन्य ताकत यानी हार्ड पावर रख कर ताकतवर देश दुनिया पर अपनी दादागिरी दिखाते रहे हैं लेकिन अब यदि किसी देश को विरासत में सॉफ्ट पावर भी मिली हो तो उसकी  समग्र राष्ट्रीय ताकत में भारी इजाफा हो जाता है। डोकलाम विवाद के दौरान चीन की सैनिक ताकत यानी हार्ड पावर केवल धौंस दिखाने के काम आई लेकिन भारत की सॉफ्ट पावर यानी कोमल ताकत जो किसी देश की सांस्कृतिक धरोहर, परम्पराओं, कला, फिल्मों आदि और आर्थिक ताकत से बनती है चीन को चिंता में डाल रही है।





भारत का योग चीन के कोने-कोने में जिस तरह लहर की तरह फैल रहा है उसने चीनी लोगों में भारत के प्रति नया सम्मान पैदा किया है लेकिन अब भारतीय फिल्मों ने भी चीनी सरकार पर कहर ढाना शुरू किया है क्योंकि भारतीय फिल्में खूब लोकप्रियता हासिल कर रही हैं। चीनी युवा भारतीय एक्टरों के दीवाने होते जा रहे हैं। चीनी दीवारों  पर लगे भारतीय फिल्मों के पोस्टरों  और होर्डिंग्स के आगे चीनी युवक-युवतियों द्वारा सेल्फी खींचते देखना आम बात है।
हालांकि चीनी सरकारी मीडिया ने भारत की सॉफ्ट पावर यानी लोकतंत्र को अराजक बताकर खूब बदनाम करने की कोशिश की ताकि चीनी युवा भारतीय जनतंत्र से प्रभावित हो कर चीन में भी इसे अपनाने की मांग नहीं करने लगें। लेकिन चीनी सोशल मीडिया फिल्मों से लेकर भारतीय योग के पीछे जिस कदर भाग रहा है वह चीन सरकार के माथे पर शिकन डाल रहा है।  हालांकि भारतीय फिल्में अस्सी के दशक से ही चीन में लहर पैदा कर रही हैं लेकिन हाल में आमिर खान की फिल्म दंगल को जो लोकप्रियता मिली वह अभूतपूर्व थी । इसी तरह कई और भारतीय फिल्में लोकप्रिय होने की वजह से चीनी सिनेमा उद्योग हालीवुड से मूंह मोड़ कर बालीवुड की ओर करने लगा है। चीनी शासक वर्ग भारतीय संस्कृति के प्रति बढ़ते मोह से इसलिये चिंतित है कि कहीं वह भारतीय जनतंत्र को ही पसंद नहीं करने लगे।  यदि ऐसा हुआ तो चीन में राजनीतिक उथल-पुथल का नया दौर आएगा।
हार्ड पावर से किसी देश को डरा कर धौंस तो जमाई जा सकती है लेकिन सॉफ्ट पावर की बदौलत किसी देश के जनमानस पर हावी हो कर वहां की राष्ट्रीय सोच को बदला जा  सकता है। चीन को पता है कि  अस्सी के दशक में शीतयुद्ध जब अपने चरम पर था तब अमरीका और सोवियत संघ अपने हार्ड पावर के बल पर एक दूसरे को डरा रहे थे लेकिन सोवियत संघ को सबसे अधिक डर अमरीका की सॉफ्ट पावर यानी जनतंत्र, फिल्में या खुला समाज की संस्कृति से लग रहा था। अंतत: सोयिवत संघ को अमरीका की सॉफ्ट पावर के आगे झुकना पड़ा और सोवियत संघ में पश्चिमी संस्कृति और जनतांत्रिक  व्यवस्था का प्रवेश हुआ। आज के चीनी शासकों को भी वही डर सता रहा है। भारत की तरह चीनी सभ्यता और संस्कृति भी हजारों साल पुरानी है लेकिन जिस तरह पिछली सदी में चीन पर तानाशाही कम्युनिस्ट व्यवस्था हावी हुई चीन को पश्चिमी समाज और व्यवस्था से पूरी तरह अलग-थलग कर दिया गया। आज भी कोशिश है कि चीन में पश्चिमी संस्कृति व प्रथाएं हावी न होने पाएं इसीलिए चीन में  विदेशी टीवी चैनलों, जी-मेल. ट्वीटर, फेसबुक जैसी साइटों पर प्रतिबंध लगा हुआ है ताकि चीनी युवा समाज का बाहरी दुनिया से सीधा सम्पर्क नहीं बने।  लेकिन चीन कब तक भारत की सॉफ्ट पावर के आगे डटा रहेगा कहना मुश्किल है।

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